भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० १ ]

व्रण में बदल जाने पर भी इनका उपयोग हो सकता है। शेष उपक्रम प्रधानतः व्रण की चिकित्सा में काम आते हैं।

वि० मन्तव्य—छ प्रकार का शोथ या शोफ सू० अ० १७ में देखिये। इनमें कुछ उपक्रम शोथ (कोड़ा) को दबाने—बैठाने के लिये किये जाते हैं और कुछ पकाने के लिये। यथा अपतर्पण-उपवास से शोथ को बढ़ने के लिये बल नहीं मिलता, वमन विरेचन से शारीरिक दोषों का मूलेच्छेद ही हो जाता है, अतः भी वह नहीं बढ़ता आलेप से विष्ठापन पर्यन्त उपक्रमों से शोथ में सन्नित दोषों का विलयन हो जाता है और विस्वावण से स्थानीय रक्त दोषों को साथ लेकर निकल जाता है। यदि इन्.सब उपक्रमों से शोथ नहीं बैठता तो उपनाह एवं पाचन लेगों से वह सरलता से और शीघ्र पक जाता है, यद्यपि स्वयं भी व्रणशोथ पक जाते हैं, परन्तु उनका पकना हानिकारक होता है। पकने पर जब वह फूट जाता है अथवा छेदन एवं दारण आदि अद्यविध सख्कर्म द्वारा चौर दिया या फोड़ दिया जाता है, तब वह 'व्रण' कहलाता है। इस दशा में भी आवश्यकतानुसार अपतर्पण से विरेचन पर्यन्त कर्मों का प्रयोग किया जाता है। और अवशिष्ट सब उपक्रम आवश्यकतानुसार समय समय पर किये जाते हैं। उन सब उपक्रमों के उपयोग के हेतु तथा फल आगे विस्तार के साथ कहे गये हैं। उनका परिश्रम पूर्वक अध्ययन कीजिये ॥१०॥

अपतर्पणमाद्य उपक्रमः, एष सर्वशोफानां सामान्यः प्रधानतमश्च ॥११॥

अपतर्पण ही सबसे पहला उपक्रम है। यह अपतर्पण सब प्रकार के शोथों में सामान्य-तुल्य है और सबसे मुख्य है ॥११॥

भवन्ति चान्न—

दोषोच्छ्रायोपशान्त्यर्थं दोषान्द्रक्ष्य देहितः।

अवेक्ष्य दोषं प्राणं च कार्यं स्यादपतर्पणम् ॥१२॥

इस विषय में श्लोक भी हैं—मनुष्य में दोष की प्रधानता देखकर-कुपित दोष की शान्ति के लिये दोष का तथा प्राण (यक्ति बल) का विचार करके, अपतर्पण—लंघन कराना चाहिये ॥१२॥

ऊर्ध्वमास्तुरष्णात्तुमुखशोषश्रमान्वितः।

न कार्यं गर्भिणीवृद्धवालदुर्वलभीरुभिः ॥१३॥

ऊर्ध्ववात, प्यास, मूत्र, मुखशोष, श्रम से पीड़ित तथा गर्भवती, बालक, बूढ़, दुर्बल और डरपोक को उपवास लंघन न कराये। ऊर्ध्ववात का लक्षण—मुक्तऽमुक्ते तथा सुस्ते यशोद्वगारं भूयं भवेत्। ऊर्ध्ववातं तं विद्यात्, उदानव्यानसंभवम् ॥१३॥

शोफेष्वेत्यतमात्रेषु वृणोषूरुस्तेषु च।

यथास्वैरौषधैर्लपं प्रत्येकस्येन कारयेत् ॥१४॥

शोफ के तुरन्त उत्पन्न होते ही, तीव्र वेदनावाले व्रणों में

दोषों के अनुसार प्रत्येक दोष की दृष्टि से—औषधियों का लेप करे।

वि० मन्तव्य—व्रणशोथ पर-उसे बैठाने एवं पकाने के लिये और व्रणभाव को प्राप्त हो जाने पर शोधन रोपण के लिये लेप लगाये जाते हैं। बैठाने एवं पकाने के लेप तो लेप ही कहलाते हैं और शोधन रोपण के लेप 'मलहूर' या 'मलहम' कहलाते हैं ॥

यथा प्रववलिते वेश्मन्यम्भस्मा परिपेचनम्।

क्षिप्रं प्रशमयत्यग्नितमेवमालेपनं रुजः ॥१५॥

प्रह्लादने शोधने च शोफस्य हरणे तथा।

उत्सादने रोपणे च लेपः स्यात्तु तदर्थकृन् ॥१६॥

जिस प्रकार जलते हुए घर पर शीतल पानों को डालते हैं, इसी प्रकार लेप जलन और वेदना को तुरन्त शान्त कर देता है। व्रण की वेदना को हटाने के कारण सुख देने में, शोधन में, (शोफ को नाश करने में) और रोपण में लेप इन कार्यों को करता है। (अवसादन-नीचे करना भी कार्य लेप से होता है उत्सादन से ही इसे गिनना) ॥१५, १६॥

वातशोफे तु वेदनोपशमार्थं सर्पिस्तैलधान्यान्ममांस-रसवातहरोषधनिष्कवाथैरशोतैः परिपेकान् कुर्वीत, पिस्-रक्तभिधातविषनिमित्तेषु क्षीरघृतसमधुशर्करोदकेरुसमधु-रौषधक्षीरवृक्षनिष्कवाथैरनुष्णः परिपेकान् कुर्वीत, रूक्षम-शोफे तु तैलमूत्रक्षारोदकसुराशुक्तफकफनीषधनिष्कवाथैर-शोतैः परिपेकान् कुर्वीत ॥१७॥

यथाऽम्बुभिः सिन्धुमानः शान्तिमग्नितिनियच्छति।

दोषाग्निरैवं सहसा परिपेकेण शम्यति ॥१८॥

वातजन्य शोफ में वेदना की शान्ति के लिये घी, तैल कांजी, मांखरस, भद्रदाह आदि वातहर औषधियों के क्वाथ को कोसा करके परिपेक करे। पिस्-रक्तविष और चोट जन्म व्रणों में—दूध, घी, मधु, शर्करा का शर्बत, इन्तुरस, मधुरौषध (काको-ल्पादि), वरगद आदि क्षीर वृक्षों के शीतल क्वाथों से परिपेक करे। कफजन्य शोफ में—तैल, मूत्र, क्षारोदक, सुरा, शुक्त और कफन् औषधियों के उष्ण क्वाथों से परिपेक करे। जिस प्रकार पानी के छिड़काव से अग्नि शान्त हो जाती है, इसी प्रकार दोषों की अग्नि परिपेक से तुरन्त शान्त होती है।

वि० मन्तव्य—परितः सिन्धुते अनेन इति परिपेचनं-परिपेकः अर्थात् जिस द्रव से व्रणशोथ अथवा व्रण का सेवन किया जाता है उसका नाम परिपेचन या परिपेक है। इसे 'टर्कोर' कहते हैं, इससे धुल भी जाता है और वेदना एवं शोथ की शान्ति भी होती है ॥१७, १८॥

अभ्यङ्गस्तु दोषमालोक्योपयुक्तो दोषोपशमं मृदुतां च करोति ॥१९॥