भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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अ० १ ]

चिकित्सास्थानम्

३८१

वक्तव्य—चुमचुमायमान-सरसों का लेप करने पर या धूप में गरमी में बैठने पर जैसे किडियाँ सी लड़ती हैं। चरक में—स्तन्धः कठिनसंस्पर्शो मन्दस्वावोऽतितीव्रः। उद्यते स्फुरति श्यावो व्रणो मांसुत्संभवः॥ तुष्णा-मोहज्वरस्वेददाहदुष्टव्यदारणैः। व्रणं पित्तकृतं विद्यात् गन्ध-लावैश्च पूतिकैः॥ बहुपिचो गुरुः स्निग्धः स्तिमितो मन्दवेदनः। पाण्डुवर्णोऽल्पसंकलेदः चिरकारी कफव्रणः॥ चरक० चि० अ० ॥१५-११॥

वि० मन्तव्य—दोष भेद से व्रणों के ये १५ प्रकार हैं और शुद्ध व्रण भी व्रण तो है ही, मले ही उसमें किसी दोष के व्यक्त लक्षण नहीं रहते, परन्तु रोपण कर्म करना ही होता है और साथ २ रक्षाविधान आदि भी। अतः उसको साथ में गिनने से व्रणों की संख्या १६ हो जाती है ॥७॥

तस्य वृणस्य पट्टिरुपक्रममा भवन्ति। तद्यथा—अपत-र्पणमालेपः परिपेकोऽभ्यङ्गः स्वेदो विम्लापनमुपनाहः पाचनं विस्वावणं स्नेहो वमनं विरेचनं छेदनं दारणं लेखनमेषण-माहरणं व्यधनं सीवनं सन्धानं पीडनं शोणितार्थापनं निर्वा-पणसुकारिका कषायो वर्तिः कल्कः सर्पितैलं रसक्रियाऽ-वर्चुर्णं व्रणधूपनमुत्सादनमप्रसादनं मृदुकर्म दारुणकर्म क्षारकर्मोत्तर्कर्म कृष्णकर्म पाण्डुकर्म प्रतिसारणं रोमस-ञ्जनं लोमापहरणं वस्तिकर्मात्तरवस्तिकर्म वन्धः पत्रदानं क्रमिन्नं बृंहणं विषघ्नं शिरोविरेचनं नस्यं कवलधारणं धूमो मधुसर्पिर्नन्त्रमाहारो रक्षाविधानमिति ॥८॥

व्रण के उपक्रम साठ हैं, यथा—अपतर्पण, आलेप, परिपेक, अभ्यंग, स्वेद, विम्लापन, उपनाह, पाचन, विस्वावण, स्नेह, वमन, विरेचन, छेदन, भेदन, दारण, लेखन, एषण, आहरण, व्यधन, विस्वावण, सीवन, सन्धान, पीडन, शोणितार्थापन, निर्वापण, उत्कारिका, कषाय, वर्त्ति, कल्क, सर्पि, तैल, रसक्रिया, अवर्चुर्ण, वृण धूपन, उत्सादन, अवसादन, मृदुकर्म, दारुण-कर्म, क्षारकर्म, अग्निनिकर्म, कृष्णकर्म, पाण्डुकर्म, प्रतिसा-रण, रोमसञ्जन, लोमापहरण, वस्तिकर्म, उत्तरवस्तिकर्म, वन्ध, पत्रदान, क्रमिन्न, बृंहण, विषघ्न, शिरोविरेचन, नस्य, कवल-धारण, धूम, मधुसर्पि, यंत्र, आहार, और रक्षाविधान। (मधु-सर्पि एक गिनना चाहिये)।

वक्तव्य—डल्हन ने लिखा है कि इसमें प्रतिधारण को नहीं गिने, तब साठ उपक्रम पूरे होते हैं। परन्तु इस पाठ में 'वर्त्ति' दो बार आता है। इसे एक स्थान पर गिनकर प्रति-धारण को गिनने से साठ हो जायेंगे।

चरक में छत्तीस उपक्रम कहे हैं, यथा— शोफन् पड्विर्ध चैव, शस्त्रकर्मविपीडनम्। निर्वापिणं ससन्धानं स्वेदः शमनमेषणा ॥

शोधनौ रोपणीयो च कषायौ सप्रलेपनौ। ह्यौ स्नेहौ तदुगुणौ पत्रच्छेदने द्वे च वन्धने ॥ भोज्यमुत्सादनं दाहौ द्विविधः सावसादनः। काठिन्यमादवकरे धूपने लेपने शुभे ॥ वर्णाविचूर्णनं व्रण्यं रोपणं लोमरोहणम्। इति षट् त्रिशदुद्दिष्टाव्रणानां समुपक्रमाः ॥ (पाटनं व्यधनं चैव छेदनं लेपनं तथा। प्रोञ्छनं सीवनं चैव पड्विर्ध शस्त्रकर्म तत्) वि० मन्व्यव—व्रण के ये ६० उपक्रम-उपचार हैं। इनका समय २ पर अथच आवश्यकता अनुसार प्रयोग किया जाता है। तेषु कषायो वर्त्तिः कल्कः सर्पितैलं रसक्रियाऽवर्चुर्ण-मिति शोधनरोपणानि, तेष्वष्टौ शस्त्रकृत्याः, शोणितार्था-पनं क्षारोऽग्निर्नन्त्रमाहारो रक्षाविधानं वन्धविधानं चो-क्तानि, स्नेहस्वेदनवमनविरेचनवस्त्युत्तरवस्तिशिरोविरेच-नस्य धूमकवलधारणान्यन्यत्र वक्ष्यामः। यदन्यदवशिष्ट-मुपक्रमजातं तद्विह वक्ष्यते ॥९॥

इनमें कषाय, वर्त्ति, कल्क, सर्पि, तैल, रसक्रिया, अवर्चुर्ण ये कम शोधन और रोपण दोनों को करते हैं। इनमें आठ शस्त्र कर्म हैं। शोणितार्थापन, क्षार, अग्नि, यंत्र, आहार, रक्षाविधान, वन्धविधान पहले कह चुके हैं। स्नेह, स्वेदन, वमन, विरेचन, वस्ति, उत्तरवस्ति शिरोविरेचन, नस्य, धूम, कवलधारण, इनको अन्यत्र कहेंगे। इनसे जो उपक्रम शेष रह गये हैं, उनको यहाँ पर कहेंगे।

वि० मन्तव्य—इनमें ८ उपक्रम-शस्त्रद्वारा किये जाते हैं, यथा—१-छेदन, २-भेदन या दारण, ३-लेखन, ४-एषण, ५-आहरण, ६-व्यधन, ७-विस्वावण तथा ८-सीवन। शोणितार्थापन—रक्तप्रवाह को रोकने का उपाय सू० स्था० अ० १५ में, क्षार कर्म सू० अ० ११ में, अग्निनिकर्म सू० अ० १२ में, यन्त्रण सू० अ० ७ में, आहार सू० स्था० १६ तथा २० में, रक्षाविधान सू० स्था० १६ तथा अ० ५ में, वन्धविधान—सू० स्था० अ० १६ तथा १८ में देखिये। स्नेहन—चि० स्था० अ० ३१, स्वेदन—चि० स्था० अ० ३२, वमन अ० ३३, विरेचन अ० ३३, वस्तिकर्म अ० ३५, उत्तरवस्ति अ० ३६, शिरोविरेचन—धूम, नस्य, कवलग्रह अ० ४० में देखिये ॥९॥

षड्विधः प्रागुपदिष्टः शोफः, तस्यैकादशोपक्रमामभव-न्यपतर्पणादयो विरेचनान्ताः, ते च विषेशेण शोधप्रती-कारे वर्तन्ते, वृणभावमापन्नस्य च न विरुध्यन्ते, शेषान्तु प्रायेण व्रणप्रतीकारहेतव एव ॥१०॥

पहले कहा है कि शोफ छे प्रकार का है, इस शोफ के अपतर्पण से लेकर विरेचन तक ग्यारह उपक्रम होते हैं। ये उपक्रम मुख्यतः शोध की चिकित्सा में बरते जाते हैं। शोध के