सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० १ ]
वक्तव्य—वृणोति यस्माद् रुठेऽपि व्रणवस्तु न नश्यति । आदेहधारणात्सत्मात् व्रण इत्युच्यते बुधेः ॥ सु० सू० अ० २१ । शरीर जव तक रहता है, तब तक विवर्णता रहती है ।
वि० मन्तव्य—व्रण में रुजा—वेदना होना सामान्य लक्षण है अर्थात् रुजा सब व्रणों में होती है । व्रण गात्रविचूर्णन धातु है—व्रणयति गात्रं विचूर्णयति इति व्रणः—अर्थात् जो गात्र को चूर्न २ कर देता है वह व्रण कहलाता है । जितने स्थान में व्रण होता है उतना स्थान चूर्न २ हो जाता है । देखिये सू० स्था० अ० २१-२२ तथा भगन्दर आदि के प्रकरण । व्रण का नाम है घाव । वह आगन्तु व्रण छः प्रकार का होता है—“छिन्नं मिन्नं तथा विद्वं क्षतं पिचितमेव च । घुष्टं आहुः तथा षष्ठं” और शारीर व्रण—वह है जो प्रथम शीथ उत्पन्न होता है और फिर उसके पककर फटने पर घाव बनता है । इन सब में गात्र का विचूर्णन होता है, अतः “व्रण” कहलाता है ॥ ६ ॥
तत्र श्यावारुणाभस्तमुः शीतः पिच्छिलोऽल्पस्त्रावी रुक्षरुचटचटायनशीलः स्फुरणायामतोदभेदवेदनावहुलो निमांसश्चेति वातात् , क्षिप्रजः पीतनीलाभः किमुकोदकाभोणस्त्रावी दाहपाकरागविकारकारी पीतपिडकाजुष्टश्चेति पिप्सात् , प्रततचण्डकण्डुबहुलः स्थूलौष्टः सत्व्यसिरास्तायुजालावततः कठिनः पाण्डुवृषभासो मन्दवेदनः शुक्लशीत-सान्द्रपिच्छिलास्त्रावी गुरुश्चेति कफात् , प्रवालदलनिचयप्रकाशः कृष्णस्फोटपिडकाजालोपचितस्तुरङ्गस्थानगन्धिः सवेदो धूमायनशीलो रक्तस्त्रावी पिचलिलङ्गश्चेति रक्तात् , तोददाहधूमायनप्रायः पीतारुणाभस्तद्वर्णस्त्रावी चेति वातपिप्ताभ्यां, कण्डुयनशीलः सनिस्तोदो रुक्षो गुरुदर्शणो सुदुर्मुदः शीतपिच्छिलालपस्त्रावी चेति वातरुलेष्मभ्यां, गुरुः सदाह उष्णः शीतपाण्डुस्त्रावी चेति पिचरुलेष्मभ्यां, रुक्षस्तनुस्तोदबहुलः सुप्त इव च रक्तारुणाभस्तद्वर्णस्त्रावी चेति वातशोणिताभ्यां, घृतमप्लाभो मीनधावनतोयगन्धिमुदु-विसर्प्युष्णकृष्णस्त्रावी चेति पिचशोणिताभ्यां, रक्तो गुरुः स्निग्धः पिच्छिलः कण्डुप्रायः स्थिरो सरक्तपाण्डुस्त्रावी चेति रुलेष्मशोणिताभ्यां, स्फुरणतोददाहधूमायनप्रायः पीततनुरक्तस्त्रावी चेति वातपित्तशोणितेभ्यः, कण्डुस्फुरण-चुमचुमायमानप्रायः पाण्डुधनुरक्तस्त्रावी चेति वातरुलेष्मशोणितेभ्यः, दाहपाकरागकण्डुप्रायः पाण्डुधनस्त्रावी चेति वातरुलेष्मशोणितेभ्यः, त्रिविधवर्णवेदनास्त्रावविशेषोपेतः पवनपित्तकफेभ्यः, निर्दहननिर्मथनस्फुरणतोददाहपाकरागकण्डुस्वापबहुलो नानावर्णवेदनास्त्रावविशेषोपेतः पवनपित्तकफशोणितेभ्यः, जिह्वातलाभो भुदुः स्निग्धः रक्तर्णो विगतवेदनः सुव्यवस्थितो निरास्त्रावश्चेति शुद्धो व्रण इति ॥ ७ ॥
वातजन्य व्रण—श्याव या अरुण वर्ण, पतला, या शीतल, पिच्छिल, थोड़े खाववाला, रुक्ष, चटचट करनेवाला ( फटने-चिरने के स्वभाव का ), स्फुरण ( फड़कन ), खिचाव, तोद, भेद की अधिक वेदनावाला और मांस रहित ( कम मांस का ) होता है । पित्तजन्य व्रण-जल्दी उत्पन्न होता है, पीली झाँकेवाला, ढाक के फूल के पानी के समान, उष्ण खाव युक्त दाह पाक सुखी एवं विकारकारी, पीली पिडकाओं से भरा होता है । कफजन्य व्रण—निरन्तर भयानक, कण्डु बहुल, मोटे किनारों का, सिंरा स्तायु के जालों से भरा, कठिन, पाण्डु ( श्वेत ) वर्ण की झाँके का, मन्द वेदना युक्त, श्वेत, शीतल, सान्द्र, पिच्छिल खाव युक्त और गुरु होता है । रक्तजन्य व्रण—मूंगे की शाखा के समान कान्तिवाला, काले छाले, एवं पिडिकाओं के जाल से भरा, घुड़साल के समान तीक्ष्ण गन्धवाला, वेदना युक्त अतिशय धूमोद्गार करने जैसा, रक्त का खाव करनेवाला और पिच वर्ण के लक्षणोंवाला होता है । वात-पित्तजन्य व्रण-तोद, दाह, धूमोद्गार की प्रधानतावाला, पीली या लाल झाँके का, वात-पित्त के व्रण के समान वर्ण एवं खाव युक्त होता है । वात-कफजन्य व्रण—कण्डु युक्त, चुमने की दर्द, रुक्ष, भारी, कठोर, बार-बार शीतल-पिच्छिल और थोड़ा खाव करनेवाला होता है । पित्त रक्त के कारण व्रण गुरु, दाहयुक्त, उष्ण, पीला और पाण्डुव्रण का खाववाला होता है । वातरक्तजन्य वर्ण-रुक्ष, पतला, तोद ( चुमने की दर्द ) की अधिकता का, सोया हुआ सा, लाल—धरुण झाँके का, वात-रक्त के समान वर्ण एवं खाव युक्त होता है । पिच रक्त के कारण—धी के मण्ड ( उपरिभाग ) के समान कान्ति का, मछली के घोंये हुए पानी के समान गन्ध का, कोमल, फैलनेवाला, उष्ण एवं काला खाव करनेवाला होता है । कफ रक्तजन्य व्रण—लाल, गुरु, स्निग्ध, पिच्छिल, कण्डु बहुल, स्थिर, रक्त ( लाल ) एवं पाण्डु वर्ण का खाव करता है । वात-पित्त-रक्तजन्य व्रण—स्फुरण, तोद, दाह, धूमोद्गमन बहुल, पीला-पतला रक्त खाव करनेवाला होता है । वात कफ-रक्तजन्य-कण्डु, स्फुरण, चुमचुमायमान, तथा-पाण्डुषट्ट रक्त खाववाला होता है । पित्तकफ रक्त-जन्य व्रण-दाह-सुखी-पाक-कण्डुबहुल, पाण्डु षट्ट रक्त खाववाला होता है । वात पित्त-कफ के कारण व्रण तीनों दोषों के वर्ण, खाव, वेदना के लक्षणों से युक्त होता है । वायु-पित्त, कफ और रक्त के कारण व्रण—जलाने की भांति, मथने की भांति, स्फुरण, तोद, दाह, पाक, सुखी, कण्डु, सुन्नता बहुल, नाना प्रकार की वेदना, वर्ण, खाव से युक्त होता है । शुद्ध व्रण—जिह्वा तल के समान ( दोनों से भरा-लाल ) कोमल, स्निग्ध, चिकना, वेदना रहित, भली प्रकार स्थित, बिना खाव का होता है ।