सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 435, कुल 872 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ चिकित्सास्थानम्
प्रथमोऽध्यायः
अथातो द्विब्रणीयं चिकित्सतं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥
अब इसके बाद द्विब्रणीय चिकित्सा का व्याख्यान करेंगे— जैसा भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ।
वि० मन्तव्य—दो प्रकार के ब्रणों को ध्यान में रखकर लिखी चिकित्सा अर्थात् व्याधि प्रतिकार ॥ १, २ ॥
द्वौ ब्रणौ भवतः—शारीरः आगन्तुश्च । तयोः शारीरः पवनपित्तकफशोणितसन्निपातनिमित्तः, आगन्तुरपि पुरुष-पशुपक्षिग्यालसरोस्त्रपप्रतनपीडनप्रहाराग्निक्षारविषघती-क्षोणषशकलकपालशृङ्गचक्रेषु परशुशक्तिकुन्ताद्यायुधाभि-जातनिमित्तः । तेन तुल्ये ब्रणसामान्ये द्विकारणोत्थानप्रयोजनसामर्थ्याद् 'द्विब्रणीयं' इत्युच्यते ॥ ३ ॥
दो प्रकार के ब्रण होते हैं—शारीर और आगन्तुक । इनमें शारीरिक ब्रण—वायु, पित्त, कफ, रक्त, सन्निपातजन्य हैं, आगन्तुक ब्रण भी—पुरुष, पक्षि, हिंसकपशु, सर्प आदि के गिरने से, पीडन-प्रहार अग्नि-क्षार विष-तीक्ष्णोषध-काष्ठ आदि के टुकड़ों, कपाल, सौग, चक्र, बाण, परशु, शक्ति, कुन्त, आदि शस्त्रों के अभिघात से उत्पन्न होते हैं । इन दोनों में ब्रणत्व सामान्य होने से, दो कारणों के कारण उत्पन्न होने के उद्देश्य से इस अध्याय को द्विब्रणीय कहते हैं । जैसा कि चरक में भी इस अध्याय का नाम "द्विब्रणीय" रक्खा है । यथा—'यो ब्रणो पूर्वमुद्दिष्टो निजश्रान्तुरेव च । श्रूयतां विधिवत्सौम्यं तयोर्लिङ्गं सपेक्षम्' चरक ॥ ३ ॥
सर्वसिन्धेवागन्तुब्रणे तत्कालमेव क्षतोऽमणः प्रसूतस्योपशमार्थं पित्तवच्छीतक्रियावचारणविधिविशेषसन्धानार्थं च मधुघृतप्रयोग इत्येतद्द्विकारणोत्थानप्रयोजनम्, उत्तरकालं तु दोषोपलब्धविशेषाच्छारीरवत् प्रतीकारः ॥ ४ ॥
सभी प्रकार के आगन्तुक ब्रणों में उसी समय क्षत की उणिमा को आगे न फैलने देने के लिये, पित्त की भाँति शीतल किया को करने तथा ब्रण को मिलाने के लिये मधु और घृत का उपयोग करना, ये दो कारणों के उत्पन्न होने के उद्देश्य हैं । पीछे से दोषों के कोप होने पर शरीरजन्य ब्रणों की भाँति चिकित्सा है ।
वक्तव्य—दो उद्देश्य होने से इसे द्विब्रणीय कहा है । आगन्तुक ब्रण पीछे दोषों से मिल जाता है, यथा—आगन्तुर-वैति निजं विकारं, निजस्तथागन्तुमपि प्रबुद्धः । तत्रानुबन्धं
प्रकृतिं च सम्यक्, ज्ञात्वा ततः कर्म समादिशेत् ॥ इल्लुण ने उत्तरकाल से सात दिन पीछे का समय माना है । सात दिन के पीछे आगन्तुक ब्रणों में दोष की अधिकता से शारीरिक ब्रणों की भाँति चिकित्सा करे ।
वि० मन्तव्य—आगन्तुक ब्रण में तत्काल उक्त उपचार करने से पाक आदि का प्रारम्भ नहीं होता, परन्तु यदि हो ही जाय तो शारीर ब्रण के समान शोचन रोपण आदि उपचार करे । जब तक—पाकादि का प्रारम्भ नहीं होता तब तक ब्रण को आगन्तु समझा जाता है और उक्त उपचार किया जाता है, सन्धान के लिए—मधु १ तोला, गो घृत २ तोला मिला फेंटकर लेप करे और आवश्यकता हो तो सोवन कर्म करे । तदर्थ देखिये सू० अ० २५ के श्लोक १६ से २६ । यही विशिष्ट कर्म का उपदेश करने के लिए ब्रण को दो प्रकार का कहा—लिखा गया है । क्योंकि उसके पश्चात् दोषों का प्रवेश हो जाने पर—पाक आदि का प्रारम्भ हो जाने पर तो आगन्तु तथा शारीर दोनों ब्रण समान ही होते हैं अर्थात् उनके लक्षण एवं चिकित्सा दोनों समान होते हैं ॥ ४ ॥
दोषोपलब्धविशेषः पुनः समासतः पञ्चदशप्रकारः प्रसरणसामर्थ्यात्, यथोक्तो ब्रणप्रभाधिकारे, शुद्धत्वात्षोडशप्रकार इत्येके ॥ ५ ॥
दोषों का उपलब्ध भेद संक्षेप में पन्द्रह प्रकार का है, यह भेद इन दोषों के फैलने के अनुसार है, इसको ब्रण प्रश्नाधिकार में कह चुके हैं । एक भेद शुद्ध ब्रण होने से ब्रण साल्ह प्रकार का है ऐसा कई मानते हैं ।
वक्तव्य—दोष से बात, पित्त, कफ और रक्त चारों ही का यहाँ ग्रहण है, इसी से कहा है, "नत्तं देहः कफादस्ति, न पित्तान्नं च मास्तात् । शोणितादपि वा नित्यं देह एतेस्तु धार्यते ॥" ॥ ५ ॥
तस्य लक्षणं द्विविधं—सामान्यं वैशेषिकं च । तत्र सामान्यं रक्त । 'ब्रणं' गात्रविचूर्णने, ब्रणयतीति ब्रणः । विशेषलक्षणं पुनर्वार्तादिलिङ्गविशेषः ॥ ६ ॥
ब्रण के लक्षण दो प्रकार के हैं, सामान्य और वैशेषिक (विशिष्टता के सूचक) । इनमें सामान्य लक्षण दर्द होना है । ब्रण-गात्रविचूर्णने इस धातु से ब्रण शब्द बनता है, जिसका अर्थ शरीर में विचूर्णता करना है । विशेष-लक्षण—वातादि दोषों से लक्षणों की भिन्नता है ।