सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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चिकित्सास्थानम्
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(जैसा ठीक हो) पूर्व कही हुई औषधियों को बरते। इसी से कहा है—
तस्माद् बुद्धिमतामृहापोहवितर्कः। मन्दबुद्धेस्तु यथोक्तानुग- मनमेव श्रेयः। (२) यद्यच्चानुक्तमपि योगिकं वा मन्येत, तद् विदध्यात्। चरक० वि० अ० ८ ॥७६॥
आधे द्वे पञ्चमूल्यौ तु गणो यश्चाग्निलापहः ॥७७॥
स वातदुष्टैर्दत्तव्यः कषायादिषु समस्तु।
न्यग्रोधादिर्गणो यस्तु काकोल्यादिषु यः स्मृतः ॥७८॥
तौ पित्तदुष्टे दातव्यौ कषायादिषु समस्तु।
आरुच्यधादिस्तु गणो यश्चोष्णः परिकीर्तितः ॥७९॥
तौ देयौ कफदुष्टे तु, संस्मृष्टे संयुता गणान्।
वृहस्पंचमूल, लघुपंचमूल और भद्रवाम्बादि वात नाशक गण को वायु से दूषित व्रण में—कषाय, वस्ति आदि रूपों में बरते। न्यग्रोधादि और काकोल्यादि गण को पित्त से दूषित व्रण में—कषाय आदि सात रूपों में बरते। आरुच्यधादि, एवं उष्ण गण (युष्ककादि और सुरसादि गण) को कफ से दूषित व्रणों में बरते। दोषों के संसर्ग होने पर-गणों को दोषों के अनु- सार मिलाकर बरते। इसी से कहा है—‘वर्गमपि वर्गणोपसंयुजेत्’ चरक०।
वि० मन्तव्य—इसके लिये देखिये सू० स्था० अ० ३८ ॥
वातात्मकानुग्रहजान् साक्षावानपि च व्रणान् ॥८०॥
सक्षोमयवसपिभिर्धूपनाङ्गैश्च धूपयेत्।
वात दोषवाले, तीव्र वेदना युक्त खाव जिन में बढ़ता हो ऐसे व्रणों में अलसी, जो धी और धूपन द्रव्यों (श्रीवेध के सर्ज- रस से सू० अ० ३७ में कहे) से धूप देना चाहिये ॥८०॥
परिशुष्कालयमांसांसां गन्धोराणान् तथैव च ॥८१॥
कुर्यादुत्सादनीयानि सर्पाध्यालेपनानि च।
मांसाशिनां च मांसानि भक्ष्येद्विधिवन्नरः ॥८२॥
विमुद्भ्रमनसस्तस्य मांसं मांसेन वर्धते।
जो व्रण सूख गये हों, थोड़े मांसवाले हों, गहरे हों, उनमें अपामार्ग-अश्वगन्धा आदि उत्सादन द्रव्यों से बनाया घी और आलेप बरते। मनुष्य विधिपूर्वक मांस खानेवाले प्राणियों के मांसों को विधिपूर्वक पकाकर खाये। मन की प्रसन्नता होने पर मांस-मांस खाने से बढ़ता है। इसी से कहा है— बरीर्बृहणे नान्यत् खाद्यं मांसाद् विशिष्यते। चरक०।
वि० मन्तव्य—व्रणों पर जो लेप आदि उपचार किये जाते हैं उनसे विस्तृतः व्रणों या व्रणभूमि का सड़ना-गलना रुकता है और रोपण तो भीतरी पोषण से ही होता है। अतः व्रणस्थान की पूरति के लिये मांस खाने का विधान किया है, मांस खाने से मांस की बुद्धि शीघ्र होती है, फलतः व्रण शीघ्र भर जाता है।
जो मांस नहीं खाते उनको अन्य हलुवा आदि पुष्टि कारक आहार देना चाहिये ॥८१,८२॥
उत्सन्नमृदुमांसांसां व्रणानामवसादनम् ॥८३॥
कुर्याद् द्रव्यैर्यथोद्दिष्टैश्चूर्णितैर्मधुना सह।
जिन व्रणों में कोमल मांस ऊपर की बढ़ आया हो, उनमें अवसादन (नीचे करना) करना चाहिये इसके लिये कासीस आदि कहे हुए द्रव्यों के चूर्ण को मधु के साथ लगाये।
वि० मन्तव्य—कभी २ व्रण में मांस ऊँचा उठ आता है, तल से भी ऊँचा हो जाता है, तब उसे समतल करने के लिये “अवसादन” किया जाता है, यह भी लेखन का ही एक प्रकार है, मधु से लेखन होता है ॥८३॥
कठिनानाममांसांसां दुष्टानां मातरिश्वन ॥८४॥
मृद्वी क्रिया विधातव्या शोणितं चापि माक्षयेत्।
वातश्चैषधसंयुक्तान् स्नेहान् सेकांश्च कारयेत् ॥८५॥
मृदुत्वमाशुरोहं च गाढो बन्धं करोति हि।
कठिन और थोड़े मांसवाले, वायु से दूषित व्रणों में मधुर, स्निग्ध, कोष्ण-लवण आदि से बाह्य एवं अन्तः रूप में कोमल उपचार करना चाहिये। रक्तानुगत वायु में रक्त मोक्षण करे। कफ का योग वायु के साथ होने पर भद्रवाम्बादि बातनाशक औषधियों से मिले स्नेह और सेक करे। कसकर बांधी हुई पट्टी भी कोमलता और शीघ्र रोहण को उत्पन्न करती है।
वि० मन्तव्य—यह मृदु कर्म नामक उपक्रम है। मृदुकर्म से व्रण की अनुचित दारुणता नष्ट की जाती है ॥८५॥
व्रणेषु मृदुमांसेषु दारुणीकरणं हितम्।
धवप्रियङ्गवशोकानां रोहिण्याश्च त्वचस्तथा ॥८६॥
त्रिफलाधातकीपुष्परोधसज्जरसान् समान्।
कृत्वा सूक्ष्माणि चूर्णानि व्रणं तैरवचूणयेत् ॥८७॥
कोमल मांसवाले व्रणों को कठिन बनाना चाहिये। इसके लिये धव, प्रियंगु, अशोक, रोहिणी (कुटकी, इलहण के मत से कायफल) की छाल, त्रिफला, धाय के फूल, लीध, राल, इनको समान भाग लेकर इनका सूक्ष्म चूर्ण करके इसे व्रण पर बुरके।
वि० मन्तव्य—यह दारुण कर्म नामक उपक्रम है। अव- चूर्णन सूखा चूर्ण बुरकने से व्रण की अनुचित मृदुता नष्ट की जाती है ॥८६,८७॥
उत्सन्नमांसां कठिनान् कण्डुकुत्काश्रिरोस्थितान्।
तथैव खलु दुःशोध्यान् शोधयेत् क्षारकमणा ॥८८॥
जिन व्रणों में मांस ऊपर आया हो, कठिन कण्डुकुत्का
१ रोहिणीत्वच—से हरड की छाल लेना ठीक है, रोहिणी, हरड का एक मोद है। इलहण ने स्वयं ६४ वें श्लोक की व्याख्या में इसे माना है।