सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० १ ]
और देर से चलते हुए, एवं कठिनाई से शोधन होनेवाले व्रणों का स्वार किया से शोधन करे ॥८८॥
स्वतंत्रोऽस्मभवान्मूत्रं ये चान्ये रक्तवाहिनः ।
निःशेषच्छिन्नसन्ध्यांश्च साधयेदग्निकर्मणा ॥८९॥
अश्मरीजन्य जिन व्रणों से मूत्र बहता हो तथा जिन व्रणों से रक्त बहता हो, जो सन्धियां सपूर्ण रूप में काटी गई हों, इनमें अग्निकर्म करे ।
वत्सव्य—अश्मरीजन्य मूत्रस्वी व्रण को सात दिन के उपरान्त दाह करे, संध्याव्रण में दाह न करे ।
वि० मन्तव्य—अग्निकर्म के लिये देखिये सू० अ० १२॥८९॥
दुरुदत्वात्तु शुक्लानां कृष्णकर्म हितं भवेत् ।
भक्ष्यातकान् वासयेत्तु क्षीरे प्राङ्मूत्रभावितान् ।
ततो द्विधा च्छेदयित्वा लोहे कुम्भे निधापयेत् ॥९०॥
कुम्भेऽन्यस्मिन् निखाते तु तं कुम्भमथ योजयेत् ।
मुखं मुखेन सन्धाय गोमयैर्द्वहि्येततः ॥९१॥
यः स्नेहश्च्यवते तस्माद् ग्राहयेत्तं शनैषिषक ।
प्राग्धानपृश्ठफान् दग्ध्वा सूक्ष्मचूर्णाणि कारयेत् ॥९२॥
तैलनानेन संस्पर्द्ध शुक्लमालेपयेद् व्रणम् ।
भक्ष्यातकविधानेन सारस्नेहास्तु कारयेत् ॥९३॥
ये च केचित् फलस्नेहा विधानं तेषु पूर्ववत् ।
ठीक प्रकार रोहण होने से शुक्ल हुए व्रणों में कृष्ण कर्म (काला करना) उत्तम है । इसके लिये गोमूत्र में भावना दिये मिलावों को सात दिन गाय के दूध में रखें । फिर इनके दो ढकड़े करके लोहे के घड़े में रख देवे । फिर भूमि में गड़े हुए एक दूसरे लोहे के घड़े पर—मुखको मुख से मिलाकर रखें । दोनों क मुखों को कपड़ मिट्टी से मिला देवे । फिर ऊपर के घड़े के चारों ओर छाने लगाकर आग लगा दे । इस प्रकार करने से जो स्नेह निचले घड़े में आता है, उसको धीरे से बैध निकाल ले । इस तैल में—ग्राम्यपशु (गाय आदि), आनूप पशु (भैंसे आदि) के खुरों को जलाकर इनका सूक्ष्म चूर्ण मिला दे । इस तैल से शुक्लव्रण पर लेप करे । मिलावे की विधि से सारादिगण (साल आदिक) से स्नेह बनाये । बहेड़ा, आदि स्नेह फलवाले जो हैं, उनमें भी यही मिलावे की विधि बरते । तैल में ग्राम्य-आनूप पशुओं के खुरों की राख अवश्य मिलाये ।
वि० मन्तव्य—कभी व्रण का रोपण पूर्णरूप से हो जाने पर—व्रणस्थान पर क्षिप्र का सा श्वेत दाग हो जाता है । उसे मिटाने के लिये यह विधि बतलाई गई है, इसका नाम “कृष्ण-कर्म” या “कृष्णीकरण” है । अग्निरुध व्रण का श्वेत दाग असाध्य होता है देखिये सू० नि० अ० ५ का सू० १७ । मिलावा
वाले घड़ा के मुख में लोह की पतली तारों का-जाल लगा देना चाहिये । अन्यथा मिलावे निचले घड़े में गिर जाते हैं । इस तैल निकालने की क्रिया को “पाताल यन्त्र” कहते हैं । इस क्रिया में एक प्रकार का काला द्रव निकलता है उसीको तैल कह देते हैं । सारस्नेहान् तु कारयेत् अर्थात् शाल, चन्दन एवं शीशम आदि के सारकाष्ठ का बुरादा लेकर अथवा बहेड़ा, बदाम, ठारी आदि की मज्जा (मार्गी-गिरी) लेकर भी उक्त प्रकार से काला द्रव प्राप्त किया जाता है, यह द्रव चर्मदल आदि पर भी लगाया जाता है, यह द्रव एक प्रकार की दुर्गन्ध से युक्त होता है ॥९०-९३॥
दुरुदत्वात्तु कृष्णानां पाण्डुकर्म हितं भवेत् ॥९४॥
समरात्रं स्थितं क्षीरे छागलं रोहिणीफलम् ।
तेनैव पिष्टं सुशुद्धं सर्वणंकरणं हितम् ॥९५॥
नवं कपालिकाचूर्णं वैदुर्ल सर्वज्ञनाम च ।
कासीसं मधुकं चैव क्षौद्रयुक्तं प्रलेपयेत् ॥९६॥
कपिस्थमुद्भूते गांसे मूत्रेणाजेन पूरयेत् ।
कासीसं राचनां तुर्ध्व हरितालं मनःशिलाम् ॥९७॥
वेणुनिलंखनं चापि प्रपुत्राडरसाञ्जनम् ।
अधस्तादजुनस्यैतन्मासं भूमौ निधापयेत् ॥९८॥
मासाद्दूर्ध्वं तत्तस्तेन कृष्णमालेपयेद् व्रणम् ।
व्रण के ठीक प्रकार रोहण न होने से काले हुए व्रणों में पाण्डुकर्म (श्वेत करना) करना हितकारी होता है । रोहिणी फल (हरड की छाल) को सात दिन बकरी के दूध में रखकर—उसी दूध के साथ बारोंक पीस ले । यह खच्चा के समान रंग करने में उत्तम है । नये ठीकरे का चूर्ण, बेंत का मूल, राख, कासीस, मुलेहटी, इनके चूर्ण को मधु के साथ लेप करे । कैथ के अन्दर से गूदा निकालकर उसमें बंकरे का मूत्र भर देवे । इसी मूत्र में कासीस, गोरौचन, तुस्थ, हरताल, मेनसिल, वांस के छिलके की बुरकी, पनवाड़, रसौत, भी मिला दे । फिर इस कैथ को एक मास तक अर्जुन वृक्ष की जड़ में गाड़ देवे । एक मास के पीछे इससे कृष्ण भाग पर लेप करे । (नवं कपालिका चूर्णम्—से कई एक भिन्न-तुरन्त मरे मनुष्य की खोपड़ी की भस्म लेते हैं) ।
वि० मन्तव्य—कभी-कभी व्रण भूमि पर काला दाग हो जाता है उसको मिटाने के लिये पाण्डुकर्म किया जाता है इसे “पाण्डुकरण” या “सर्वणंकरण” कहते हैं । इससे शरीर के सद्दश वर्ण हो जाता है । इन दोनों उपक्रमों का उद्देश्य है व्रण स्थान का शरीर के सद्दश वर्ण बना देना । गहरे व्रणों का चिह्न तो रह ही जाता है जीवन भर के लिये ॥९४-९८॥