भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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४. १ | । 9 % बुटाण्ड ८ कपाखानि कतक मधुक समम्‌ ॥९६॥ तथा समुद्रमण्ड्‌की मणिचूण च दापयेत्‌ । गुटिका मूत्रपिष्टास्ता ब्रणानां प्रतिसारणम्‌ ॥१००॥।

गं के अण्डे के क्िके, कतक ( जक ोधनफक नि्म॑ली-

गुलठी, समुद्रमण्टरकी ( जल शुक्तियां सुक्ताशुक्ति );

अर मणिचणं, इनमें प्रत्येक को समान भाग छेकर गोमूत्र से पल )

कर गोलियां बना ले । इनसे व्रणो पर प्रतिसारण करे | वि मन्तव्य-- प्रतिसखारण--घषण का नाम है, जव कभी

य॒ म सांणोज्नति अथवा मांखकन्दी हो जाती है तव उक्त

प्रतिहारण क्रिया जाता है, इस कमं को छेदनं अथवा ठेखन

कह वकते है, देखिये सू० अ० २५ के सू० ४ तथा६। ओर उ्तयोग मे सत्र द्रव्य ठेखन हँ भी ॥ ६६१०० ॥। हस्तिदन्तमसीं कृस्वा सुख्यं चेव रसाञ्जनम्‌ । `

रोमाण्यतेन जायन्ते टेपास्ाणितटेष्वपि ॥१०१॥ चतुष्पदानां त्वम्रोमयुरश्ङ्गास्थिमस्मना । तेटाक्ता चूणिता भूमिभवेद्रोमवती पुनः ॥ १०२॥

कासीसं नक्तमाटस्य पल्छवांश्वेव संहरेत्‌ ।

कृपित्थरस पिष्टानि रोमसंजननं परम्‌ ॥१०३॥ हाथी दन्त की राख करके इनमें श्रेष्ठ रसौँत को मिलाकर (ककरी के दूष के साथ) ल्गाने से हथेली मे भी बाल डउग अते हः व्रण मतो उग ही आर्थेगे। पशुओं कौ खाक, रोम, दुर खग, अस्थि, इनकी भस्म को चूण करछे । पदे स्थान १ तेल र्गाकर इनका चूण उख पर बुरक देवे । इससे पुनः षह उग आते हं | कासीख, करज्ञ के कोमल पत्ते इनको कैथ रस॒ मृ पीषकर कगावे | इससे बार उत्पन्न होते हे | मि मन्तन्य-जण भूमि पर येम उगाने का यह उपाय १। हे -लोमसञ्जनन”” उपक्रम -कंहते है ॥१०१-१० २॥ रोमाकोर्णो वरणो यस्तु न सम्यगुपरेहति। शरकतरिसन्दशोस्तस्य रोमाणि निहेरेत्‌ ॥१०४॥ शखचृणस्य भागो द्वौ. हरिताढं च भागिकम्‌ । रन सह्‌ पिष्टानि ओमञातनमुत्तमम्‌ ॥१०५॥ ख भल्ञातक्याथ स्नुहीक्षीरं तथेव च । दृह्य मतिमान्‌ रोमशातनसुत्तमम्‌ ॥१०६॥ रदीदीवघन्ताभ्यां मस्मारं क्बणं मी । _ वन शोतादपिष्टवा रोमशातनमाचरेत्‌॥१०॥ पणारगोधिकापुच्छं रम्भाऽऽङं बीजवेडकदम्‌। रना द्धस्तंम्बु सू्ेपववं कचान्तकृत्‌ ॥१०८। | मलौ कार रोगः नही होता उसमे अधिक रोम उनक्रो कचौ या मोचने से निकाल देवे। ( शंख ह. भ धुण दो मागः न हरतारु ~ को ~~ ` सि22 एक माग-इनको शुक्त ( क 2 . ७ र्‌ रुगाये। इससे वा गिर जते द ) । भिखावे \ साथपौ

चिकित्सास्थानम्‌ .- का तेल ओर थोर का दूष इनको एकत्र मिलाकर टगाथे, यह बारे को नष्ट करता है। केा, श्योनाक की राख, हरताल, < धवख्वृणः शमीवीज, इनको शीतल जल से पीसकर खगाय, यह वार्लो को नष्ट करता हे । छिपकली की वै, केरा, हरताल, इङुदी के बीज, इनको जलाकर इनकी भस्म ते अर पानी श मिलाकर, धूप मेँ गरम करके लगाये, यह बाढ नाशक है । ` विण मन्तव्य--कमी २ व्रण स्थान पर मोटे २ वाल उग आते है, उनको हटाने के ये सब उपाय ह । इसे लोमापहरण नामक उपक्रम कहा गया है । उक्त योगों से अन्यत्र के रोम भी हटाए जाते ह । शंखनचूणं का अथं दै, शंख का चूना अर्थात्‌ भस्म । शंखचूणं एवं हरिताल का योग ही आज का भ्बैरि- युमसटफायड़” हे, जो बार उड़ाने का प्रसिद्ध पाउडर सर्वत्र मिर्ता है । हरिताठ की भस्म नदीं की जाती, वेस ही मिला दी जाती है । पाठक आश्चयं से देखें कि सुश्रुत के समयमे भी साब्न--वार उड़ाने का साबुन बनाया जाता था, यथा-मस्म अथात्‌ क्षार, तैल एवं जल को मिलाकर धूप में उष्ण करने पर

जो पदाथ तैयार होता है, बही माज का “साबुन” ३ ॥१०८॥

वातदुष्टो ्रणो यस्तु रूक्षश्चाव्यथेवेदनः।

अधःकाये विशेषेण तत्र बस्तिर्विधीयते ॥१०९॥

जो व्रण वायु से दूषित हो, रुक्च हो, अतिशय वेदना करता

हो, विशेषकर नामि से नीचे हो,. उसमें वस्ति देनी चाहिये ॥ मूत्राघाते मूत्रदोषे शुक्रदोषेऽरमरीन्रणे । | तथेवातवदोषे च बस्तरप्युत्तरो हितः ॥११०॥ मूत्राघात, मू्रदोष, शुक्रदोष, अश्मरीजन्य रण मे, आत्त

दोष मे उतत्तरस्ति उत्तमदे॥ ११० ॥_ _ |

यरमाच्छुध्य ति बन्धेन व्रणो याति च मादेवम्‌ | रोहव्यपि च निःशङ्कस्तस्मा्रन्धो विधीयते ॥१११॥

पट्टी बोधने से वरण का शाधन होता है, कोमल बनता है; भिना किरी बाधा के भरता दै, इखि त्णपर पटी बचत द| स्थिराणामल्पमांसानां रोच्यादनुपरोहतम्‌। पत्रदानं भवेत्‌ कायं यथादोषं यथतुं च ॥(१२॥ एरण्डभूजपतीकदस्द्रणां तु बातजि। =. `

पत्रमाशबर यच्च काश्मरापन्नमेव च ॥१९३॥ ` पत्राणि क्षीस्र्चाणामौदकानि तथेव च। दूषिते रक्तपित्ताभ्यां व्रणे दचाद्िचक्षणः । ९९४ पाठामूगुडचीनां काकमाचीहरिद्रयोः ! पत्रं च श॒कनासाया योजयेत्‌ कजे तरणे ।।१९५॥

अककंशमविच्छिन्नमजीण सुङमारक्म्‌। = अजन्तुजग्धं खदु च पतरं गुणवदुच्यते ॥११६॥ = ` स्नेदमौषधसारं र र च पटः ङ्प स्योप्‌ अ ९-नः रि "चन्‌ १ + [4 न श ~

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