सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 446, कुल 872 में से
संदर्भ में पढ़ें१६०
सुश्रुतसंहिता
[ अ० १ ]
शैत्योष्णयजननार्थाय स्नेहसंग्रहणाय च । दत्तोषधेषु दातव्यं पत्रं वैद्येन जानता ॥११८॥
स्थिर, अल्प मांसवाले एवं रूक्षता के कारण न भरनेवाले ब्रणों में दोष और श्रुतु के अनुसार पत्रदान (पत्ते का रखना) करना चाहिए१। वातजन्य ब्रणों में एरण्ड, भोजपत्र, कख, और हल्दी के पत्ते रखें। रक्त-पित्त से दूषित ब्रणों में बुद्धिमान वैद्य अश्ववला (पोई), गम्भारी के पत्ते, बरगद आदि क्षीर-वृक्षों के पत्ते, कमल आदि जलीय पत्रों को रखें। कफजन्य ब्रण में—पाठा, मूत्रा, गिलोय, मकोय, हल्दी, और शुक्रनाख के पत्र बरते। जो पत्ता खरदरा न हो, फटा न हो, पुराना न हो, कीड़ों से न खाया हो, कोमल हो, वह गुणशाली होता है। पत्रों के बीच में आने से वक्ष स्नेह और औषधसार (वीर्य) को नहीं ले लेता। इसलिये ब्रणपर लेप करके, उसपर पत्र रखें (फिर पत्ते पर गोज-कबलिा, रूई रखकर पट्टी घाँध देवे)। शीतलता उत्पन्न करने के लिए (रक्त-पित्त ब्रणों में) और स्नेह को बचाये रखने के लिए जाननेवाला वैद्य पत्र का उपयोग करे ॥ ११२-११८ ॥
मक्षिका ब्रणमागत्य निःक्षिपन्ति यदा कुमीन् । इवयथुर्भक्षिते तैस्तु जायते भृशदारुणः ॥११९॥
तीव्र रजो विचित्राश्च रक्तास्वावश्च जायते ।
सुरसादिहितस्तत्र धावने पूर्णे तथा ॥१२०॥
सम्पर्णकरस्त्राकर्त्तव्यराजादनस्वचः ।
हिता गोमूत्रपिष्टाश्च सेकः क्षारोदकेन वा ॥१२१॥
प्रच्छाद्य संपश्यामां वा कुमीनपहरेद् ब्रणात् ।
विज्ञति क्रमिजातीस्तु वक्ष्याम्युपरि भागजः ॥१२२॥
मक्खियां जब ब्रण पर बैठकर क्रमि (अण्डे) उत्पन्न कर देती हैं, तब उन कीड़ों के खाने से ब्रण में भयानक शोथ उत्पन्न होता है। इसमें तीव्र एवं नाना प्रकार की वेदनायें और रक्तास्वाव होता है। इसमें सुरसादि गण का धोने और भरने में उपयोग करना चाहिए। सतवन, कख, आंक, नीम, खिरनी की छाल, इनको गोमूत्र में पीसकर लेप करे या क्षारोदक से परिषेक करे। अथवा मांस पेशी से द्राँपकर ब्रण से क्रमियों को निकाले। क्रमि की बीस जातियों को उत्तर तन्त्र में कहूँगा।
वक्तव्य—ब्रण पर रक्त मिश्रित मांस पेशी रखने पर क्रमि मांस रक्त के लोम से पेशी में आ जायेंगे—जब यह भर जाये, इसे हटाकर दूसरी रख देवे। इस प्रकार करे।
१ गुस्कुल कांगड़ी में आज से तीस साल पहले डाक्टर सुख-देव जी केले के कोमल पत्ते का उपयोग पुराने ब्रणों पर करते थे। इससे जहाँ ब्रण का उपकार होता है, वहाँ स्नेह या औषधपट्टी को या रूई आदि को भी नहीं बिगाड़ती। यह वहाँ बहुत चलता रहा।
वि० मन्तव्य—ये क्रमि “जन्तुमाता” कहे हैं—जन्तु-मक्षिका माता जननी येषां ते जन्तुमातरः, अर्थात् मक्षिका है, जननी जिनकी। बीस प्रकार के क्रमियों का वर्णन उत्तर तन्त्र अ० ५४ में किया जायगा। परन्तु जन्तुमाता नामक क्रमियों का वर्णन चरक विमान स्थान अ० ७ के सू० ११ में देखिये ॥
दीर्घकालातुराणां तु क्रूरानां ब्रणशोषिणाम् ।
बृ० हणीयो विंध्यः सर्वः कायान्ति परिरक्षता ॥१२३॥
चिरकालीन रोगी कुश एवं ब्रण से शुष्क बने पुरुषों में—जाठरागिन की रक्षा करते हुए—सम्पूर्ण रूपमें वृंहण विधि बरतनी चाहिये ॥ १२३ ॥
विषजुष्टस्य विज्ञानं विषनिश्चयमेव च ।
चिकित्सितं च वक्ष्यामि कल्पेषु प्रविभागजः ॥१२४॥
विष से आक्रान्त ब्रण के लक्षण, विष की परीक्षा और विष चिकित्सा को अलग २ कल्पस्थान में कहूँगा ॥१२४॥
कण्डूमन्तः सजोफाश्च ये च जत्रूपरि ब्रणाः ।
शिरोविचरेन तेषु विदुष्यात्कृशलो भिषक् ॥१२५॥
कण्डूयुक्त, शोफयुक्त, तथा शले से ऊपर के जो ब्रण हों, उनमें कुशल वैद्य शिरो विरेचन दे ॥ १२५ ॥
रुजावनतोऽनिलाविद्या रूक्षा ये चोर्ध्वजत्रुजाः ।
ब्रणेषु तेषु कर्तव्यं नश्यं वैद्येन जानता ॥१२६॥
वेदना युक्त, वायु से आक्रान्त, रुक्ष और जत्रु से ऊपर के जो ब्रण हों, उनमें जानकार वैद्य नश्य देवे ॥ १२६ ॥
दोषप्रत्यावनार्थाय रुजादाहक्षुयाय च ।
जिह्वादनस्तमुत्थस्य हरणाथं मलस्य च ॥१२७॥
शोधनो रोपणश्चैव ब्रणस्य मुखजस्य वै ।
उष्णो वा यदि वा शीतः कवलग्रह इष्यते ॥१२८॥
दोषों को निकालने के लिए, रुजा और दाह नष्ट करने के लिये, जीम एवं दांत में उत्पन्न मलों को दूर करने के लिये, मुख के ब्रण के शोधन एवं रोपण के लिये उष्ण या शीत कवल उत्तम है ॥ १२७, १२८ ॥
ऊर्ध्वजत्रुगतान् रोगान् ब्रणांश्च कफवातजान् ।
शोफस्वावरुजायुक्तान् धूमपानैरुपाचरेत् ॥१२९॥
जत्रु से ऊपर के रोगोंमें, कफवातजन्य ब्रणों में शोफ, स्वाव, पीड़ा होने पर (जत्रु से—गले के ऊपर के रोग एवं ब्रणों में) धूमपान से चिकित्सा करे ॥ १२९ ॥
क्षतोष्मणो निग्रहार्थं सन्धानार्थं तथैव च ।
सद्योब्रणेष्वायतेषु क्षौद्रसर्पिर्बिधीयते ॥१३०॥
सद्यःक्षत को उष्णिमा को रोकने के लिये, इसको जोड़ने के लिए, चौड़े-ब्रणों में मधु और घृत (मिला-