भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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चिकित्सास्थानम्

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कर) बरतते हैं। (मधु-घृत यह एक उपक्रम गिनने से साठ उपक्रम हो जाते हैं ॥१३०॥

अवगाढास्त्वणुमुखा ये त्रणाः अलस्यपीडिताः ।

निवृत्तहस्तोद्भूतानि यन्त्रं तेषु विधीयते ॥१३१॥

जो त्रण गहरे, सूक्ष्म मुख, शल्य से पीड़ित हो, जिनमें हाथ से शल्य नहीं निकाला जा सकता, उनमें यंत्र का प्रयोग किया जाता है ॥१३१॥

लघुमानो लघुश्चैव स्निग्ध उष्णोऽग्निदीपनः ।

सर्वत्रणिभ्यो देयस्तु सदाऽऽहारो विज्ञानता ॥१३२॥

सब त्रणरोगियों को, मात्रा में लघु, गुणों में लघु, स्निग्ध, उष्ण और अग्नि दीपक आहार सदा देना चाहिये ॥१३२॥

निमात्राभ्यो रक्षयस्तु नित्यमेव क्षतानुरः ।

रक्षाविधानैरुद्दिष्टैर्यमैः सनियमैस्ततथा ॥१३३॥

त्रणरोगी की सदा राक्षसों से (कुम्भियों से) चूँकि ये भी राक्षसों की भांति रात में—अन्धेरे में रहते हैं, मांस-आदि खाते हैं। रक्षा करनी चाहिये। इसके लिये कहे हुये रक्षा उपायों से (गुग्गुल-सरसों आदि का घुँवा, मंत्र आदि) तथा यम और नियम से रक्षा करे।

वक्तव्य—निशाचर ही कुम्भि हैं—दोनों का जीवन एक ही है। यम-अहिंसा, सत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्यापरिग्रहः। नियम—शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वरप्रणिधान। अथवा-अक्रोधो गुणशुश्रूषा शौचमाहार-लाघवम्। अप्रमादश्च पञ्चैते नियमाः परिकीर्तिताः ॥

वि० मन्तव्य—निशाचरों को कुम्भि मानने और सिद्ध करने का आजकल प्रचार या हठ सा हो गया है, आयुर्वेद के जाननेवाले भी यही प्रचार करते हैं। परन्तु आयुर्वेद के आठ अंगों में—“भूतविद्या नाम...शमनार्थम्” (सू० सू० अ० १४ तथा च० सू० अ० ३०-२८) में भूतविद्या नामक विशिष्ट अङ्ग या तन्त्र माना गया है और आयुर्वेद के उक्त ग्रन्थों में यत्र-तत्र इस विद्या के उल्लेख भी पाए जाते हैं। उनको देखकर भी पाश्चात्य कीटानु पेशी के पीछे भागना कहाँ तक उचित है पाठक स्वयं विचार करें और उक्त पेशी में कीटानु पुरीष, रक्त एवं कफ में पाये जानेवाले कुम्भि है, जिनका वर्णन सुश्रुत एवं चरक में पृथक् किया गया है। पुनरपि पाठक—आयुर्वेदज्ञ विवेकशील विद्वानों से प्रार्थना है कि वे इस विषय पर गम्भीरता पूर्वक विचार करें, गतानुगतिक बनना उचित नहीं है ॥

षण्मूलोऽष्टपरिग्राहो पञ्चलक्षणलक्षितः ।

षष्ठ्या विधानैर्निर्दिष्टैश्चतुर्भिः साध्यते त्रणः ॥१३४॥

साक्षात्—त्रण के छे मूल (वात, पित्त, कफ, रक्त, सन्धिपात, आगन्तुज) हैं, आठ परिग्रह-स्थान हैं (त्वचा, मांस, खिरा

स्नायु, सन्धि, अस्थि, कोष्ठ, और मर्म), पांच लक्षणों से—जाना हुआ (वात, पित्त, कफ, सन्धिपात और आगन्तुज लक्षणों से जाना हुआ), त्रण, साठ उपक्रमों द्वारा, चार से (वेद्य, रोगी, औषध और परिचारक) अच्छा किया जाता है ॥१३४॥

योऽल्यौषधकृतो योगो बहुग्रन्थभयान्मया ।

द्रव्याणां तत्समानानां तत्रावापो न दुष्यति ॥१३५॥

ग्रन्थ के बहुत बढ़ने के भय से थोड़ी औषधियों से कहा हुआ जो योग हो उसमें उसके समान द्रव्यों के मिलान में कोई दोष नहीं होता ॥१३५॥

प्रसङ्गाभिहितो यो वा बहु दुर्लभभेषजः ।

यथोपपत्तिं तत्रापि कार्यमेव चिकित्सितम् ॥१३६॥

अथवा प्रसंग के कारण जो योग बहुत-सी एवं अप्राप्य औषधियोंवाला कहा गया है, उसमें भी उपपत्ति के अनुसार (जो मिले, जो ठीक समझे) चिकित्सा कार्य कर लेना चाहिये।

गणोक्तमपि यद्द्रव्यं भवेद्वाधायौगिकम् ।

तदुद्भवेद्यौगिकं तु प्रक्षिपेदप्यकीर्तितम् ॥१३७॥

गण में कहा हुआ भी जो द्रव्य रोग के लिये ठीक न लगे, उसको निकाल देवे। और योग्य द्रव्य यदि न भी कहा हो, तो भी उसको मिटाये।

वक्तव्य—‘तिभ्यो भिषग बुद्धिमान् परिसंख्यातमपि यद्यद्द्रव्यमयौगिकं मन्येत तत्तदपकर्षयेत्, यद्यन्चातुक्तमपि यौगिकं वा मन्येत, तत्तद् विदध्यात्। वर्गमपि वर्गोपसंयुजेदकेनेना नेकेन वा, युक्ति प्रमाणीकृत्य। प्रचरणमिव भित्तुकस्य। बीजमिव कर्षकस्य, सूत्रं बुद्धिमतामल्पमप्यनल्पज्ञानायतनं भवति। तस्माद् बुद्धिमतामृहापोहवितर्काः’ ॥चरक० वि० अ० ८॥१३७॥

उपद्रवाम्बु विविधा त्रणस्य त्रणितस्य च ।

तत्र गन्धादयः पञ्च त्रणस्योपद्रवाः स्मृताः ॥१३८॥

व्वरातिसारो मूच्छो च हिक्का च्छर्दिररोचकः ।

शवासकासाविपाकाश्च तृष्णा च त्रणितस्य तु ॥१३९॥

त्रण एवं त्रणरोगी के उपद्रव बहुत प्रकार के हैं। इनमें गन्ध आदि पांच उपद्रव त्रण के कह दिये हैं। ज्वर, अतिधार, मूच्छो, हिक्का, वमन, अरोचक, श्वास, काष, अविपाक, और तृष्णा ये त्रणरोगी के उपद्रव हैं ॥

वक्तव्य—सर्पितैलवसापूरकश्यावामृत्पतिकाः ।

त्रणानां त्रणगन्धचैरष्टौ गन्धाः प्रकीर्तिताः ॥

विसर्पपञ्चपातश्च शिरस्तम्भापतानकाः ।

मोहोन्मादव्रणरुजो व्वरस्तृष्णाहनुग्रहः ॥

काषशर्छर्दिरतीसारो हिक्का श्वासः सवेपथुः ।

षोडशोपद्रवाः प्रोक्ताः त्रणानां त्रणचिन्तकैः ॥

वि० मन्तव्य—त्रण के पञ्चज्ञानेन्द्रियग्राह-गन्ध, रूप, शब्द,