सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० १ ]
स्पर्श तथा रस नामक उपद्रव सृ० स्था० अ० २८ में कहे गये हैं। वही देखिये श्लो० ८ से श्लो० ११ तक ॥१३-१३६॥
व्रणक्रियान्वेवसासु न्यासेनोत्कास्यपि क्रियाम्।
भूयोऽप्युपरि वक्ष्यामि सद्योव्रणचिकित्सिते ॥१४०॥
इस प्रकार से इन व्रण क्रियाओं में विस्तार से चिकित्सा कह देने पर भी पुनः सद्योव्रण चिकित्सा में क्रिया को कहूँगा।
वि० मन्तव्य—सद्योव्रणचिकित्सित नामक अगला ही अध्याय है ॥१४०॥
इति सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने द्विवर्णीय- चिकित्सितं नाम प्रथमाऽध्यायः ॥११॥
द्वितीयोऽध्यायः
अथातः सद्योव्रणचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥११॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
अब इसके आगे सद्योव्रणचिकित्सा का व्याख्यान करेंगे— जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था।
वि० मन्तव्य—सद्यः—तत्काल या तत्क्षण जो व्रण होता है वह “सद्योव्रण” कहलाता है। इसी का नाम आगन्तु व्रण है, क्योंकि इसका कारण आगन्तु या बाहरी शस्त्र आदि होता है। शरीर व्रण इसके विपरीत होता है, उसमें—प्रथम शोथ उत्पन्न होता है। फिर यह पकता है और फिर जब फूटता या फटता है, या चौरा लगाया जाता है, तब “व्रण” होता है, इसका कारण भी भीतरी वात आदि दोष होता है ॥११,२॥
धन्वन्तरिधर्मभूतां वरिष्ठो वाग्विभारदः।
विश्वामित्रसुतं शिष्यमपि सुश्रुतमन्वशात् ॥३॥
धर्मधारियों में श्रेष्ठ, उत्तम वक्ता धन्वन्तरि ने विश्वामित्र के पुत्र, शिष्यरूप से आये हुए सुश्रुत ऋषिको शिक्षा दी-कहा॥
नानाधारामुखैः शस्त्रैर्नानास्थाननिपातितैः।
नानारूपा व्रणा ये स्युर्तेषां वक्ष्यामि लक्षणम् ॥४॥
नाना प्रकार की धारा एवं मुखवाले शस्त्रों के नाना स्थानों पर लगने से भिन्न भिन्न प्रकार के जो व्रण हो जाते हैं, उनके लक्षण कहूँगा ॥४॥
आयताश्चतुरस्माश्च न्यस्ता मण्डलिनस्तथा।
अर्धचन्द्रप्रतीकाशा विगला कुटिलास्तथा ॥५॥
शरावन्निन्मध्याश्च यवमध्यास्तथाऽपरे।
एवंप्रकाराकृतयो भवन्त्यागन्तवो व्रणाः ॥६॥
दोषजा वा स्वयंभिन्नाः न तु वैद्यनिमित्तजाः।
आयताकार, चकोर, त्रिकोण, गोलाकार, अर्धचन्द्र की भाँति, (विशाल बड़े) कुटिल (देढ़े-मेढ़े) चम्पन के समान बीच
से दबे, (किनारों पर उठे), तथा जो के समान (बीच में चौड़े-किनारों पर तन्त्र आकार के), इन आकारों के दोषजन्य या स्वयं विदीर्ण हुए तथा आगन्तुज व्रण होते हैं। वैद्य के द्वारा बनाये गये व्रण इन से पृथग् आकार के हैं। (वैद्यजन्य व्रण-आयत, विशाल सम विभक्त लक्षणों के होते हैं) ॥५,६॥
भिषग्व्रणाकृतिल्लो हि न मोहमभिगच्छति ॥७॥
भ्रूगं दुर्दुर्गरूपेषु व्रणेषु विकृतेऽवपि।
व्रण की आकृति को जाननेवाला वैद्य देखने में अतिशय कुरूप तथा विकृत व्रणों में भी नहीं घबरता ॥७॥
अनन्ताकृतिरागन्तुः स भिषग्विभः पुरातनैः ॥८॥
समासतो लक्षणतः षड्विधः परिकीर्तितः।
पुरातन वैद्यों ने आगन्तुज व्रण को असंख्येय आकार का माना है। संक्षेप में लक्षणों के अनुसार आगन्तुज व्रण छे, प्रकार का है ॥८॥
यथा—
छिन्नं भिन्नं तथा विद्धं क्षतं पिच्छितमेव च ॥९॥
घृष्टमाहुस्तथा षष्ठं तेषां वक्ष्यामि लक्षणम्।
छिन्न, भिन्न, विद्ध, पिच्छित, क्षत और घृष्ट-छे प्रकार का है, इनके लक्षण कहता हूँ ॥९॥
तिरश्चोन्न क्लजुर्नाऽपि यो व्रणश्चायतो भवेत् ॥१०॥
गात्रस्य पातनं चापि छिन्नमित्युपदिश्यते।
जो व्रण-तिरछा या सीधा अथवा आयताकार हो, जिसमें शरीर से अंग अलग हो जाये (या कुछ कट जाये) उस व्रण को छिन्न कहते हैं ॥१०॥
कुन्तजकस्यष्टसङ्गप्रविषाणादिभिराशयः ॥११॥
हृतः किञ्चित् श्वेतद्वि भिन्नलक्षणमुच्यते।
भाला, शक्ति, ऋष्टि (शुर्वला), तलवार सींग आदि से आशय में चोट लगने पर इसमें से कोई वस्तु बड़े, तो उसे भिन्न व्रण कहते हैं ॥११॥
स्थानान्यामानपकवानां मूत्रस्य रुधिरस्य च ॥१२॥
हट्टुण्डुकः फुफुसश्च कोष्ठ इत्यमिधीयते।
आमाशय, अग्न्याशय, पक्वाशय, मूत्राशय, रक्ताशय, हृदय, उपद्रुक और फेफड़े—इनको कोष्ठ कहा जाता है।
वि० मन्तव्य—कोष्ठ अर्थात् आशय कहा गया है। वे अवयव भीतर से खोलले होते हैं और इनमें कोई न कोई वस्तु भरी रहती है जो इनके फटने पर बहती है—बाहर निकल आती है—निकलने लगती है। यह भी एक शास्त्रसमय है। यद्यपि क्षत आदि व्रणों में भी रक्त तो निकलता ही है तथापि उसे “भिन्न” नहीं कहा जाता, यथा—“लकड़ी फटती है, और षडा फूटता है आदि वाक्यों को प्रयोग होता है। किसी कोष्ठ