सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० २ ]
तत्रोष्णमणो निमृद्धार्य तथा दाहप्रपाकयोः ॥२७॥
शीतमालेपनं कार्यं परिषेकश्च शीतलः ।
पिच्छित और घृष्ट व्रणों में रक्त बहुत नहीं बहता । इनमें दाह और पाक विशेष रूप में होता है । इनमें उष्णमा को, तथा दाह एवं पाक को बचाने के लिये शीतल आलेप करना और परिषेक भी शीतल करना चाहिये ॥२६, २७॥
षट्स्वेतेषु यथोक्तेषु छिन्नादिषु समासतः ॥२८॥
ज्ञेयं समर्पितं सर्वं सद्योवृणचिकित्सितम् ।
छिन्न आदि ज्ञे व्रणों की संक्षेप में सम्पूर्ण रूप से सद्यो चिकित्सा कह दी हैं ॥२८॥
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि छिन्तानां तु चिकित्सितम् ॥२९॥
ये व्रणा विवृताः केचिच्छिरःपार्श्ववर्लम्बिनः ।
ताम् सीन्येद्विधिनोक्तं वधनीयाद् गाढमेव च ॥३०॥
इसके आगे छिन्न व्रणों की चिकित्सा कहूँगा । जो कोई व्रण, चौड़े मुखवाले शिर या पार्श्व में स्थित हो, उन व्रणों को कहीं हुई विधि से सी देना चाहिये, उन पर कसकर पट्टी बाँध देवे ॥२९, ३०॥
कर्णं स्थानादपहृतं स्थापयित्वा यथास्थितम् ।
सीन्येद्यथोक्तं तैलेन स्रोतश्चाभिप्रतपेयेत् ॥३१॥
कृकाटिकान्ते छिन्ने तु गच्छत्यपि समीरणे ।
सम्यङ्निवेश्य वधनीयात् सीन्येचापि निरन्तरम् ॥३२॥
आजेन सर्पिषा चैवं परिषेकं तु कारयेत् ।
उत्तानोऽन्तं समरुनीयाच्छयीत च सुयन्त्रितः ॥३३॥
स्थान से जिसके कान को यथास्थान बिठाकर उसे यथोक्त विधि से सी देवे । कान में तैल (वातच्न तैल) भरे । गले के पिछले भाग तक ग्रीवा के कट जाने पर और वायु के बाहर निकलने पर भी ग्रीवा को भली प्रकार बिठाकर-बाँध देवे और चारों ओर से सी देवे । बकरी के घी से परिषेक करे । पीठ के भार चित् लेटकर अन्न को खाये, भली प्रकार सावधानी से (जिससे ग्रीवा स्थिर रहे) सोये ।
वि० मन्तव्य—यदि बाह्यकर्ण अर्थात् कर्णशकुली को कोई दूसरा सर्वाचकर उखाड़ देवे तो तत्काल उसे उसी स्थान पर स्थापित कर देवे और विधिपूर्वक विहित उपचार करे, इस प्रकार वह जुड़ जाती है । कृकाटिका—शिर एवं ग्रीवा के संन्धान स्थल पर कृकाटिका नामक दो मर्म हैं, (दे० शा० आ० ६-२७) इन मर्मों के अन्त-समीप तक ग्रीवा कट जाने पर भी, श्वासवह स्रोत से कट जाने पर छिन्न व्रण में से श्वास वायु के आ जाने पर भी, यदि कृकाटिका कटने से बच गई हो तो यथास्थान ग्रीवा को स्थापित करके निरन्तर-अन्तर रहित सीवन कर्म कर देवे । यदि केवल श्वास नलिका ही कटी हो,
अन्य मातृका आदि मर्म कटने से बचे रहे हों तो रोगी ह्रस्व दशा में भी बच जाता है । सीवन कर्म के अनन्तर विहित उपचार करता रहे । और रोगी स्वतः ग्रीवा को हिलाने डुलाने में तब तक सावधान रहे जब तक व्रण का रोपण-सन्धान भली भांति हो जाय । सीवन कर्म के लिये देखिये सू० अ० २५ ॥
आखासु पतितान्तिर्यक्त्र प्रहारान् विवृतान् भुशम् । सीन्येत सम्यङ्निवेश्यासु सन्ध्यस्थीन्यनुपूर्वशः ॥३४॥ बध्वा वेखिलतकेनासु ततस्तैलेन सेचयेत् ।
चर्मणा गोफणाबन्धः कार्या यो वा हितो भवेत् ॥३५॥
हाथ-पैर के कट जाने पर, तिरछे प्रहारों के कारण चौड़ा व्रण होने पर, सन्धि-अस्थियों को शीघ्र ही ठीक बिठाकर तुरन्त सी देवे । वेखिलत बन्ध (पट्टी) बांधकर इस पर तुरन्त तेल से सेचन करे । अथवा चमड़े से गोफण बन्ध या जो ठीक समझे वह बाँधे ।
वि० मन्तव्य—इस प्रकार कटी अस्थि भी जुट जाती है, परन्तु यह सब उपचार आशु-अत्यन्त शीघ्र तक्षण हो हो जाना चाहिये तभी सफलता मिलती है । पाक का प्रारम्भ बचाने के लिये साथ साथ उचित उपचार भी होना चाहिये और उस स्थान या शाखा को हिलाने डुलाने में भी बहुत सावधान रहना चाहिये । बन्ध विशेष के लिये देखिये सू० अ० २८, तथा अ० १६ । यह सब उसी दशा के लिये कहा गया है जब शाखा (टाङ्ग या बाहु) पूर्ण रूप से न कटी हो, कटकर अलग न हुई हो । पूर्ण रूप से कट जानेपर श्लो० ३७ के अनुसार कार्य करे ॥
पृष्ठे व्रणो यस्य भवेदुत्तानं गाययेत्तु तम् ।
अतोऽन्यथा चोरसिजे गाययेत् पुरुषं व्रणे ॥३६॥
जिसके पीठ में व्रण हो वह चित्, पीठ के भार मुख ऊपर रखकर सोये (जिससे खाव नीचे बहे) । छाती पर व्रण होने में रोगी को उत्था-मुख नीचे करके सुलाये ।
वक्तव्य—गयी ने "पृष्ठे व्रणो यस्य भवेदुत्तानः शयीत सः । अतोऽन्यथा चोरसिजे शयीत पुरुषो व्रणे ।" यह पाठ दिया है । यह उस समय के लिये है जब खाव बन्द होकर व्रण शुद्ध हो गया हो ।
वि० मन्तव्य—हमारे विचार में आचार्य गयी का पाठ ही समीचीन है और व्रण का खाव तो ब्यान वायु द्वारा प्रेरित होकर निकलता है । पृष्ठ गत व्रण में उत्तान होकर लेटने से तो व्रण पर दबाव पड़कर उसमें विकृति आ सकती है और यह अवस्था सदा भी नहीं हो सकती और फिर लेटने के दोही प्रकार नहीं हैं । पार्श्व के बल भी लेटा जाता है और इस प्रकार पीठ एवं उस के व्रणों का बचाव भी हो सकता है । पाठक इस विषय पर स्वतः गम्भीर विचार करें ॥३६॥