भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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चिकित्सास्थानम्

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छिन्ना निःशेषतः आखां दग्ध्वा तैलैन बुद्धिमान् । बन्धनीयात् कोशबन्धनेन प्राप्तं कार्यं च रोपणम् ॥३७॥ सम्पूर्ण रूप से कटी हुई शाखा में गरम तैल से जलाकर कोश बन्ध से बाँध दे । रोपण किया करना उत्तम है ॥३७॥ वन्दनं पद्मकं रोध्रमुत्पलानि प्रियङ्गवः । हरिद्रा मधुकं चैव पयः स्यादत्र चाष्ट्रमम् ॥३८॥ तैलमेभिर्विपक्वं तु प्रधानं व्रणरोपम् । चन्दनम्, पद्माल, लोघ, कमल, प्रियंगु, हरदी, मुलहटी, और आठवां दूध, इनसे तैल सिद्ध करे । यह उत्तम व्रण रोपक है ॥३८॥

वन्दनं कर्कटाल्प्या च सहै मास्याह्व्यामृता ॥३९॥ हरेणवो मृणालं वा त्रिफला पद्मकोत्पले । त्रयोदशाङ्गं त्रिघृतमेतद्वा पयसाऽन्वितम् ॥४०॥ तैलं विपक्वं सेकार्थं हितं तु व्रणरोपेण । चन्दन, कर्कटशृंगी सुदग्धपर्णी, माषपर्णी, जटामांसी, गिलोह, मटर, कमलनाल, त्रिफला, पद्माल, नीलोफर इस त्रयोदशाङ्ग के कल्क से दूध में (पानी मिलाकर) सिद्ध किया बिघृत तैल (घी, वसा, मक्का और तैल) व्रण के रोपण के लिये परिपेक करने में उत्तम है । (इसमें घी आदि से, दूध और पानी चार गुण लेना चाहिये) ॥३९,४०॥

अत ऊष्मं प्रवद्व्यामि भिन्नानां तु चिकित्सितम् ॥४१॥ भिन्नं नेत्रमकर्मण्यमभिन्नं लभ्यते तु यत । तन्निवेश्य यथास्थानमव्याविद्धसिर् शनैः ॥४२॥ पीडयेत् पाणिना सम्यक् पद्मपत्रान्तरेण तु । ततोऽस्य तर्पणं कार्यं नस्यं चानेन सर्पिषा ॥४३॥

इसके आगे भिन्न व्रणों की चिकित्सा कहता हूँ—जिस नेत्र में भिन्न व्रण होने से नेत्र काम में अयोग्य (देखने में अयोग्य) हो, परन्तु भिन्न (फटा-विदीर्ण) न हुआ हो, और बाहर लटक गया हो, उसे धीरे से, सिराओं को बिना तुकसान किये, ठीक स्थान पर बिट्टा कर, उस पर कमल का पत्ता रख कर हाथ से भली प्रकार (धीमे से) दबाये । इस पर मधु और घी लगाकर इसका घी से तर्पण करे, और घी से नस्य देवे । (कोई अनेन के स्थान पर 'आजेन' पाठ पढ़ते हैं और बकरी के घी से नस्य देवे—अर्थ करते हैं) ।

वि० मन्तव्य—'नस्यं चाऽनेन सर्पिषा' का अर्थ है इस (आज—प्रशस्यते) पाठ द्वारा कहे सिद्ध घृत से तर्पण नेत्रपूरण करे और इसी की नस्य देवे । इस उपचार से नेत्रगोलक अपने स्थान में पूर्ववत् स्थित हो जाता है ॥४१-४३॥

आजं घृतं क्षीरपात्रं मधुकं चोत्पलानि च । जीवकर्वभकौ चैव पिष्ट्वा सर्पिर्विपाचयेत् ॥४४॥ सवनेत्राभिघाते तु सर्पिरेतत् प्रशस्यते ।

बकरी का घी, दूध एक आङ्क, मुलेहटी, कमल, जीवक, श्रुषभक, इनको पीसकर, इनसे गाय का घृत सिद्ध करे । सव प्रकार के नेत्राभिघातों में यह घृत उत्तम है ॥४४॥

वक्तव्य—बकरी का घी, मुलेहटी आदि द्रव्य समान अंश में लेकर—आठ पल मात्रा में, घी एक पश्य, और दूध एक आङ्क लेकर घी सिद्ध करे । इसमें कई मुलेहटी आदि को बकरी के घी में पीसते हैं ॥

उदरान्मेषो वर्तिर्निर्गता यस्य देहिनः ॥४५॥ कषायभस्ममृत्कीर्णं बध्वा सूत्रेण सूत्रवित् । अग्निंतप्तनेन शोष्ठेण छिन्व्यान्मधुसमायुतम् ॥४६॥ बध्वा व्रणं मुर्जीर्ण्डनेन सर्पिषः पानमिष्यते । स्नेहपानादृते चापि पयःपानं विधीयते ॥४७॥ शर्करामधुयष्टिभ्यां लाक्षया वा श्वर्दष्ट्या । चित्रासमन्वितं चैव रुजादाहविनाशनम् ॥४८॥ आटोपो मरणं वा स्याच्छूलो वाऽच्छिद्यमानया । मेदोघ्नन्थी तु यत्तैलं वद्व्यते तच्च योजयेत् ॥४९॥

जिस मनुष्य के पेट में से मेद की वर्ति (मेद या आंतों का आवरण) निकल आई हो, उस पुरुष में मेद वर्ति पर सर्जक—अर्जुन आदि कषाय रसवाले वृक्षों की भस्म (क्षार), काली मिट्टी, इनको लगाकर (बुरककर) सूत्र को बाँधना जानने-वाला वैद्य धागे से इसे बाँध दे । फिर अग्नि में गरम किये शस्त्र से इसको काट देवे । काटकर इस पर मधु लगाकर बाँध देवे । अन्न के भली प्रकार पच जाने पर घृत का पान कराये । स्नेह पान के सिवाय दूध का पान भी कराया जाता है । दूध को शर्करा, मुलेहटी और लाक्षा, या गोखरु और एरण्ड तैल के साथ देना चाहिये । इससे वेदना और दाह नष्ट होते हैं । न काटने पर आटोप, मूल्यु या शूल होती है । मेद ग्रन्थि में जो तेल कहा जायेगा, उसे यहाँ बरते ।

वक्तव्य—कषाय रस वृक्ष की भस्म होने से कषाय रस के कारण यह संकुचित होकर सुगमता से अन्दर प्रविष्ट हो जा सकती है । क्षार, मिट्टी का आंतों पर लेप करने से जलाने में आंतों के अन्दर गहरा जलने का भय नहीं रहता । अग्नि में गरम किये शस्त्र से पकने का भय नहीं, इसीसे इल्क्षण ने कहा 'अततशस्त्रच्छेदने पाकमयं स्यात्'—इल्क्षण ने दो योग माने हैं—मुलेहटी के क्वाथ से सिद्ध दूध में शर्करा और एरण्डतैल से एक, गोखरु के क्वाथ से सिद्ध दूध में लाक्षा और एरण्ड-तैल मिलाने से दूसरा । परन्तु संग्रह में इसे एक ही योग माना है, यथा—'क्षीरं वा शर्कराचित्रलाक्षागोलुरुकेः श्रुतम् । रुदा-हजित् स यष्ट्याहैः परं पूर्वोदितो विधिः' ॥४५-४६॥

त्वचोऽतीत्य सिरादीनि भिन्त्वा वा परिहृत्य वा । कोष्ठे प्रतिष्ठितं शल्यं कुर्यादुक्तानुपद्रवात् ॥५०॥

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