भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० १ ]

शल्य त्वचा को पार करके, खिरा आदि का भेदन करके, या इनको बचाकर भी—कोष्ठ में रहने पर कहे हुये उपद्रवों को (कोष्ठगते त्वाटोपानाहो मूत्रपुरीषाहारदर्शनं च व्रणमुखात्—स० अ० २० २६) उत्पन्न करता है ॥५०॥

तत्रान्तर्लोहितं पाण्डुं शीतपादकराननम् ।

शीतोच्छ्वासं रक्तनेत्रमानन्दं च विवर्जयेत् ॥५१॥

इसमें—कोष्ठ के अन्दर रक्त आ जाने पर, रोगी का वर्ण श्वेत हो जाने पर, पैर हाथ मुख ठंडा हो जाने से, श्वास ठण्डा होने पर, आँखों में सुखों, दोषों के रुके होने पर असाध्य माने ॥५१॥

आमाशयस्थे रुधिरे वमनं पथ्यमुच्यते ।

पक्वाशयस्थे देयं च विरेचनमसंशयम् ॥५२॥

आस्थापनं च निःस्नेहं कार्यमुर्णैर्विशोधनैः ।

यवकोल्लुक्कुस्थानां निःस्नेहेन रसेन च ॥५३॥

मुखातीतान्तं यवाम् वा पिबेत् सैन्धवसंयुताम् ।

अतिनिःस्वतरको वा भिन्नकोष्ठः पिबेदसूक्तं ॥५४॥

रक्त के आमाशय में रहने पर वमन पथ्य है । पक्वाशय में रक्त होने पर विना संशय के विरेचन देना चाहिये । उष्ण एवं विशोधक गोमूत्र आदि से आस्थापन ( निरुहण वस्ति ) देना चाहिये । जो, बेर और कुलर्थी के स्नेह रहित यूप के साथ या स्नेह रहित मांस रस के साथ अन्न को खाये । सैन्धव मिश्रित यवाम् को पिये । जिसका रक्त बहुत निकल गया या कोष्ठ फट गया हो, वह रक्त को पिये ।

“मृगगोमहिषाजानां सद्यस्कं जीवतामसूक्तं ।

भिन्नेज्जीवाभिस्संधानं जीवं तद्व्याधु गच्छति ॥

तदेव दर्भमृदितं रक्तं वस्ति प्रदापयेत् ॥”

चरक० सि० अ० ६ ॥

स्वमागंप्रतिपन्नस्तु यश्यं विष्णुमंत्रमरुताः ।

व्युपद्रवः स भिन्नोऽपि कोष्ठे जावति मानवः ॥५५॥

जिस पुरुष के मल-मूत्र और वायु अपने मार्गों से प्रवृत्त हो रहे हों, उपद्रवों से रहित हो वह व्यक्ति कोष्ठ के विदीर्ण होने पर भी जीता है । (उपद्रव-ज्वर आभ्रान आदि ) ॥

अभिन्तमन्त्रं निष्कान्तं प्रवेश्यं नान्यथा भवेत् ।

पिपाळिकाशिरामस्तं तदप्येकं वर्दान्त तु ॥५६॥

प्रक्षाल्य पयसा दिग्धं तृणशणितापांगुभिः ।

प्रवेशयेत् कुन्तनखां घृतेनाक्तं शनैः शनैः ॥५७॥

प्रवेशयेत् क्षारसिक्तं शुष्कमन्त्रं घृताप्लुतम् ।

अङ्गुल्याऽभिमुशेत् कण्ठं जलेन्द्रोद्देजयेदपि ॥५८॥

हस्तपादेषु संगृह्य समुत्थाप्य महाबलाः ।

भवत्यन्तःप्रवेशस्तु यथा निर्धुन्युत्पत्तथा ॥५९॥

तथाऽन्त्राणि विशन्यन्तः स्वां कलां पीडयन्ति च ।

व्रणाल्पस्वाद्बहुत्वाद्वा दुष्प्रवेशं भवेत्तु यत् ॥६०॥

तदापात्र्य प्रमाणेन भिषगन्त्रं प्रवेशयेत् ।

यथास्थानं निविष्टे च व्रणं सोऽन्येदतन्द्रितः ॥६१॥

स्थानादपेतमादत्ते प्राणान् गुम्फितमेव वा ।

वेष्टयित्वा तु पट्टेन घृतसेकं प्रदापयेत् ॥६२॥

घृतं पिबेत् सुखोष्णं च चित्रातैलसमन्वितम् ।

मृदुक्रियायर्थं शकुतो वायोश्चाधः प्रवृत्तये ॥६३॥

ततस्तैलमिदं कुर्याद्दोषणायर्थं चिकित्सकः ।

त्वचोऽश्चक्कण्धवयोर्मांसकीमेषशुद्धयोः ॥६४॥

शल्लकयजुर्वेद्योश्चापि विद्यार्थां क्षीरिणां तथा ।

बलाभूलाणि चाहृत्य तैलमेतैर्विपाचयेत् ॥६५॥

व्रणं संरोपयेत्तेन वर्षमात्रं यतैत च ।

जो आंत विदीर्ण न हुई हो, परन्तु बाहर निकल आई हो, उसे ठीक तरह पहले की भाँति प्रविष्ट करे । यदि आंत फट गई हो तो दोनों सिरों को भूरी चिऊटी से कटवाकर उनके सिरों को उसी में लगा रहने देते हुए—आँतों को पूर्व की भाँति अन्दर विठाये, ऐसा भी कई आचार्य कहते हैं । इसके लिये तिनके, रक्त या धूलि से लिपटी आंत को दूध से धोकर नखों को कटाये हुए वैद्य आंत को घी से स्निग्ध करके धीरे-धीरे प्रविष्ट करे । शुष्क आंत को दूध से सेचन करके, घी से तर बनाकर प्रविष्ट करे । अंगुली से गले में खर-खरायें, शीतल जल से कम्पकंपी उठाये । बलवान् व्यक्ति इस रोगी को हाथ और पैरों से पकड़कर इस प्रकार हिलायें-डुलायें, जिससे कि आंत अन्दर प्रविष्ट हो जाये । इस प्रकार करने से आंत अन्दर प्रविष्ट हो जाती है, और अपनी कला (मलधरा-पांचवी) को दवाती है—उसमें बैठ जाती है । व्रण के छोटे होने से या आँतों के बहुत होने से जब आंत अन्दर न जा सके, तब उसके प्रमाण में चीरकर आँतों को अन्दर प्रविष्ट करे । आँतों के यथास्थान बैठ जाने पर वैद्य सावधानी से व्रण को सी देवे । क्योंकि स्थान से हटी हुई आंत अथवा परस्पर एक दूसरी में उलझी आंत मृत्यु का कारण बन जाती है । फिर वस्त्र से लपेट कर घी का सेक करे । एरण्ड तैल से मिठा—सुहाता गरम घी पिये । इससे मल कोमल रहता है, और वायु प्रवृत्त होती रहती फिर वैद्य रोपण के लिए निम्न तैल बनाये—

तैल—अश्चक्कण्, धव, सिम्बल और मेघशुंगी, शल्लकी, अर्जुन इनकी छाल, विदासी और बरगद, पीपल, पिल्लन, गूल्म आदि क्षीर वृक्षों की छाल, बलाभूल, इनके साथ तैल खिड़ करे । इस तैल से व्रण का रोपण करे । एक साल तक परहेज में रहे ।

वि० मन्तव्य—यह उस दशा का उपचार है, जब उदर फट जाने पर अन्न बाहर निकल आती है । व्रणाल्पत्वात्.....यत्—यदि उदर का व्रण छोटा होता है,

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