भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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अ० २ ]

चिकित्सास्थानम्

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अन्त्र लौटाकर यथास्थान स्थापित नहीं हो सकती तो उदर का ब्रण बड़ा करके अन्त्र को प्रविष्ट करना चाहिये ॥ ५६-६५ ॥

पादौ निरस्तमुष्कस्य जलेन प्रोक्ष्य चाक्षिणी ॥६६॥

प्रवेश्य तुन्नसेवन्या मुष्कौ सीनेत्यंतः परम् ।

कार्यां गोफणिकाबन्धः कट्यामावेष्ट्य शन्त्रकम् ॥६७॥

न कुर्यात् स्नेहसेकं च तेन किलघति हि ब्रणः ।

कालानुसार्यगुर्वलाजाती चन्दनपद्मकैः ॥६८॥

शिलादाल्यभूततुत्यैस्तैलं कुर्यात् रोपणम् ।

जिस पुरुष के अण्ड बाहर आ गये हों, उसके पैर और आँखों पर शीतल जल का सेचन करके अण्डों को अण्डकोष में प्रविष्ट करके—अण्डकोषों को तुन्न सेवनी सीवन से सी देवे । फिर गोफणिका बन्ध बाँध देवे । रोगी की कटि में इस प्रकार बाँध दे—कि वह चले-फिरे या हिले-जुले नहीं । यहाँ पर स्नेह का सेक न करें । क्योंकि इससे ब्रण किल्ल होता है । इसके रोपण के लिये, कालानुसारी, अगरू, इलायची, चमेली, चन्दन, पद्माल, मैनसिल, दारूहल्दी, गिलोय, तुत्य इनसे रोपण तैल बनाये ।

वि० मन्तव्य—यह उपचार तब किया जाता है जब अण्ड-कोश फट जाने पर अण्ड बाहर आकर लटकने लगते हैं ॥

शिरसोऽपहृते शल्ये बालवर्ति निवेशयेत् ॥६९॥

बालवर्त्यामदत्तायां मस्तुलुङ्गं ब्रणात् स्ववेत् ।

हन्थादेनं ततो वायुस्तस्मादेवमुपाचरेत् ॥७०॥

ब्रणे रोहति चैकैकं शनैर्बालमवक्षिपेत् ।

शिर में से शल्य को निकालकर इस छेद में बालों की बनाई वर्ति प्रविष्ट कर देवे । क्योंकि बालों की वर्ति न लगाने से ब्रण में से मस्तुलुङ्ग बहता है । इससे वायु कुपित होकर इसको मार देता है, इसलिये इस प्रकार की चिकित्सा करे । जैसे २ ब्रण भरता जाता हो, वैसे २ एक एक बाल उसमें से निकलता जाये ।

वि० मन्तव्य—मस्तुलुङ्ग—शिरसो बलाधानस्थानघुता-कारम् । आज कल का 'सेरिन्सोफाईन फ्लुड' का शायद अभिप्राय हो ।

वि० मन्तव्य—यह उपचार तब किया जाता है जब शिर पर आधात होने से कपालस्थि दूट जाती है, परन्तु मस्तुलुङ्ग सुरक्षित रहता है । इस दशा में कपालस्थि के टुकड़े निकाल दिये जाते हैं और केवल स्वचा के ब्रण का रोपण कर दिया जाता है । मस्तुलुङ्ग—स्नेह कफ ( जो मूर्धा में रहता है ) मथ शिरो मन्त्रा ( मेजा ) का नाम है । यही कपालस्थियों के भीतर भरा रहता है । इसी में अविपति आदि शिरोगत मर्म हैं ॥

गानादपहृतेऽन्यस्मात् स्नेहवर्ति प्रवेशयेत् ॥७१॥

कृते निःशोगिते चापि विधिः सद्यश्चते हितः ।

शरीर के अन्य भाग में लगे शल्य को निकालकर कपड़े की बनाई-तैल में भिगोई वर्ति को प्रविष्ट करे । ब्रण को रक्त रहित बनाकर सद्यः क्षत का उपचार करना चाहिये ॥ ७१ ॥

दूरावगाढाः सूक्ष्माः स्युर्ब्रणस्तान् विमोणितान् ॥

कृत्वा सूक्ष्मेण नेत्रेण चक्रतैलेन तपयेत् ।

जो ब्रण बहुत लम्बे या गहरे हों, सूक्ष्म हों, उनको रक्त रहित बनाकर, पतली नली द्वारा इनमें कोल्हू का ताजा तैल प्रविष्ट करे । ( चक्रतैल—कोल्हू की लकड़ी से अणुतैल विधि—जो आगे कहेंगे—से बनाया तैल चक्रतैल, यह इल्हण का मन्तव्य है ) ॥ ७२ ॥

समङ्गां रजनीं पद्मां त्रिवर्गं तुत्यमेव च ॥७३॥

त्रिडङ्गं कटुकां पथ्यां गुड्घूचीं सकरञ्जिकाम् ।

संहृत्य विपचेत् काले तैलं रोपणमुत्तमम् ॥७४॥

मजीठ, हल्दी, पद्मा ( भागी ), त्रिफला, तुत्य, विडंग, कुटकी, हरड, गिलोय, करञ्ज, इनको लाकर इन से तैल बनाये । यह तैल ब्रण के संरोहण काल में उत्तम रोपण है ॥

ताटीशं पद्मकं मांसी हरेण्वगुरुचन्दनम् ।

हरिद्रं पद्मबीजानि सोमीरं मधुकं च तैः ॥७५॥

पक्वं सद्योब्रणेपूक्तं तैलं रोपणमुत्तमम् ।

तालीश, पद्माल, जटामांसी, हरेण, अगरू, चन्दन, हल्दी, दारूहल्दी, कमल के बीज, खस और मुल्हठी, इनमें सिद्ध किया तैल, सद्योब्रणों में उत्तम रोपण तैल है ॥ ७५ ॥

क्षते क्षतविधिः कार्यः पिषिते भग्नावद्विधिः ॥७६॥

क्षत ब्रण में क्षतविधि ( मधु घी, तैल का सेचन ) करे, पिषित में भग्न के समान उपचार करे ॥ ७६ ॥

घृष्टे रुजो विगृह्यागु चूर्णरूपचरेद् ब्रणम् ।

घृष्ट ब्रण में शीतल उपचार से वेदना को बन्द करके, ब्रणों को चूर्णों से ( शाल, सर्ज, अर्जुन आदि से ) चिकित्सा करे ॥

विशिलष्टदेहं पतितं मथितं हतमेव च ॥७७॥

वासयेत्तैलपूर्णायां द्रोण्यां मांसरसाग्नाम् ।

अथमेव विधिः कार्यः क्षोणे मर्महते तथा ॥७८॥

जिसकी सन्धिष्यों गिरने आदि से ठीली हो गई हों, गिर गई हों, बलपूर्वक दवाई गई हों ( मिच गई हों ), लाठी आदि से जो मारा गया हो उस मनुष्य को तैल ( तिलतैल ) से भरी द्रोणी ( टब ) में रख देवें । खाने को मांस रख देवें । यही उपचार मुसाफिरी आदि से क्षीण हुये या मर्म स्थानों पर चोट लगने पर बरतना चाहिये ॥ ७७, ७८ ॥

रोपणे सपरीषेके पाने च ब्रणिनां सदा ।

तैलं घृतं वा संयोग्यं शरीररतूनवेदय हि ॥७९॥

रोपण में, परिषेक में, पान में, ब्रण रोगियों को सदा, श्रुद्यु, शरीर को देखकर घी या तैल को देना चाहिये । बात कफ