सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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यथा न चरनं तस्य भग्नस्य क्रियते तथा ।
सन्धेरुभयतो रौ दौ तले चैकश्च कीटकः ॥४९॥
जंघा ओर ऊर के दूने पर रोगी को लकड़ी के तरते पर
रेटाना चाहिये । रोगी दिले.डे नहीं इखछ्यि तरते पर पाच
कील गाड़ देनी चाहिये (एक तलु के खाथ दो जंघामे दो
ऊरु की दोनों ओर ) भग्न रोगी हिले-डुके नदी, एेखा प्रयत्न
करे । इसमें जंघा भग्न मे एक कीठ तुए पर, दो कौट गुल्फ सन्धि की दोनों ओर ओर दो जानु सन्धि कौ दोना ओर गाडे । ऊरु भग्न मे - जानु सन्धि के पास दौ, वंक्षण सन्धि के
पास दो ओर तलुए पर एक कीर गाड ॥[४८४६॥
श्रोण्यां वा प्रष्ठवंशो वा वक्षस्यक्षकयोस्तथा ।
भरनसन्धिविमोक्षेषु विधिमेनं समाचरेत् ॥५०॥
श्रोणी, पृष्ठवंश, वक्षःस्थल, अक्षक इनके भग्न होने पर या
सन्धि मुक्त होने पर यही विधि वरते । अथात् रोगी को ठ्य
रक्खे हिल्ने न दे । र
वि° मन्तव्य--कपाट शयनं कौ व्यवस्था कर ॥*०॥
सरन्धीथिर विमुक्तस्तु स्निग्धान् स्विन्नान् ्रदृकृतान् ।
उक्तेविधानेबुद्धया च सम्यक् प्रकृतिमानयेत् ॥८१।।
देह से अरग हृद सन्धि मे स्नेहन स्वेदन करके इनको
` नरम करे । किर के हुए उपायों से ओर अपनी बुद्धि से वेदय
इनको भटी प्रकार पूवांवस्था मे लाये ॥५१॥
काण्डभरने प्ररूढे तु विषमोल्वणसं हिते ।
आपोध्य समयेद्धग्नं ततो भग्नवद्ा चरेत् ॥५२॥
काण्डमग्न-विषम उल्वण जुड़ने पर यदि भरगयाहो
(स्थिरहोगयादहो)तो भी इसको अलग करके भग्न को समान वनाये-शेष क्रिया भगन की भाति ह ॥५२॥ कत्पयन्तिगेतं शुष्कं व्रणान्तेऽस्थि समादितः।
सन्ध्यन्ते वा क्रियां कुयौत् सत्रणे व्रणभग्नवत् ॥५३॥
व्रण के एक माग मेँ सूखी ओर बाहर निकली अस्थि को सावधानी से काट देवे) अथवा ब्रणवे भगन में सन्धि के समीप से काट देवे ओर व्रण युक्त मग्न के समान उपचार करे। उध्वंकाय तु भग्नानां मस्तिष्क्यं कणेपूरणम् । `
घृतपानं हितं नस्यं प्रशाखास्वदुवासनम् ॥५४॥ शिर के मग्नों ये शिर पर शिरोवस्ति, घीया तेकका पिचु, कान मे तेर डालना, घृत पान, ओर नस्य उत्तम है । हाथपैर के भग्नो मे अनुवाखन वस्ति उत्तम दै ॥५५॥ अत उध्वं प्रवद्यामि तें भरनप्रसाधकम् ।
रात्र रात्रौ तिखान् कृष्णान् वासयेदस्थिरे जङे ॥५५॥
दिवा दिवा ओषयित्वा गवां क्षीरेण भावयेत् चृतीयं सप्तरात्र तु नावयेन्मधुकाम्बुना ॥५६॥ ततः क्षीरं पुनः पीतान् सुञुष्कांश्चूणेयेद्धिषक । `
सुश्रतसंहिता । ह भ् | कुष्ठं सजरसं मांसीं सुरदारु सचन्दनम् । अतपुष्या च संचये तिचूणंन योजयेत् ॥५८॥
पीडनाथ च कतेव्यं सेगन्घश्तं पयः |
चतुगुणेन पयसा तत्तलं विपचेद्धिषक् ॥१९॥ एलामंजुमतीं पत्रं जौवकं तगरं तथा ।
रोध्रं प्रपौण्डरीक च तथा काानुसारि(बा)णम्॥६० सेरेयक क्षीरञ्चक्छामनन्तां समधूलिकाम् । पिष्टा शङ्गाटकं चेव पूर्वोक्तान्योषधानि च ॥६१॥ एभि्तद्धिपवेत्तेठं ाखविन्मृदुनाऽग्निना ।
एतत्तें सदा पथ्यं भग्नानां सकंकमसु ॥६२॥ आक्षपके पक्ष घाते ताद्ुखोषे तथाऽर्दिते ।
मन्यास्तम्भे शिरोरोगे कणंशूरे हय प्रहे ॥६३॥
बाधियं तिमिरे चेव ये च खीषु क्षयं गताः! पथ्यं पाने तथाऽभ्यङ्गे नस्ये बस्तिषु भोजने ॥६४।
म्रीवास्कन्धोरसां बृद्धिरमुनेबोपजायते ।
मुखं च पद्यप्रतिमं स सुंगन्धिसमीरणम् ॥६५॥
गन्धतेरमिदं नाम्नां सवेवातविकारयुत्। राजाहैमेपत् कतेव्यं राज्ञामेव विचक्षणः ।॥६६॥
इसके आगे भग्न को स्वस्थ करनेवाला तेर कर्हूगा |
कले तिलो कौ सात दिन तक रात्रि मे नदी के ब्रहते जले
रक्वे ओर दिन मे धूप में सुखाये, फिर सात दिन गाय के दूष
से इनको भावित करे। तीसरे हप्ते म सुेहटी के क्वाथे
भावना दे। फिर चौये सक्ताह पुनः गायके दधसे भावित
करके, सुलाकर चूं कर ठे । इसमे काकोल्यादि गण के द्रम
सुलेहठी, मजीठ, सारिवा, कूठ, राल, जटामांसी, देवदार,
चन्दन, सफ, इनका चूण ( आपस मे समान माग ) तिल कै
चूण के समान भाग से मिले । किर एढादि _गण से हिद दूष से इख चूण को गीला बनाकर, इन तिलो से 5० निकाटे।
इस तैल को तैक से चार रुने दूध के साथ-इलागची, शा
पर्णी, तेजपन्न, जीवक, तगर, लोध, प्रपौण्डरीक कालानुखाय धषिष्ठी, क्षीरविदारी, खारिवा, मधूठिक, विाह़ा, पूरी ओषधियां ( काकोल्यादि से लेकर सफ तक की } इनक
कल्क के साथ मृदु अग्नि पर शास्र को जानने ब्राखा वट षि
करे । यह तै भग्न व्यक्तियों के सव कार्यो मे पथ्य र |
आक्तेपक, पक्षापात, ताह्वशोष, अदित; मन्यास्तम्भः शिरो)
कणंशूल, हनुग्रह, बधिरता, तिमिर रोगो मे तथा ज।
चयो मे क्षीण इए है, उनके पान, अभ्यङ्ग, नस्य बस्ति क
भोजन में पथ्य है । इस तेक से रीवा, स्कन्ध ओर छाती
वृद्धि होती दै । सुख कमल के समान, सुख की वायु ध ति
| होती दै। इस तैढ का नाम गन्धतैक है, वायु के खव ति |
को नष्ट करता दै। यह् तैर राजाओं के योग्य दै,. 8
काकोल्यादि सयष्टयाहं मच्िष्ठां सारिवां तथा ॥५७॥ |.को राजाओं के ल्म दी बनाना. चादि ॥१५-६९॥