भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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चिकित्सास्थानम्

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त्रयुसाक्षप्रियालानां तैलानि मधुरैः सह । वसां दत्त्वा यथालाभं क्षीरे दशगुणे पचेत् ॥६७॥ स्नेहोत्तममिदं चासु कुर्याद् भग्नप्रसाधनम् । पानाभ्यञ्जननस्येषु वस्तिकर्म्मणि सेचने ॥६८॥ खीरा, बहेड़ा, चिरौजी इनके तैलों को, काकोल्यादि गण के साथ, दस गुणे दूध में मिला करे । यदि बसा मिल जाये तो उसे भी मिला दे । यह उत्तम स्नेह-भग्नों को जलद स्वस्थ करता है । पान, अभ्यञ्ज, नस्य, परिषेचन और वस्ति कर्म में उत्तम है ॥६७,६८॥

भग्नं तैति यथा पार्कं प्रयतेत तथा भिषक् । पक्वमांससिरास्तान् तु तद्धि कृच्छ्रोण सिध्यति ॥६९॥ वैद्य को चाहिये कि वह ऐसा प्रयत्न करे कि भग्न पकने न पाये । मांस, खिरा, स्नायु के पक् जाने पर भग्न कठिनाई से अच्छा होता है ॥६९॥

भग्नं सन्धिभननाविद्धमहीनाङ्गमनुलब्धम् । सुखचेष्टाप्रचारं च संहितं सम्यगादिशेत् ॥७०॥ जिस भग्न या सन्धि भंग से रोगी को बेचैनी अंग की कमी ( छोटा पड़ना ) या ऊपर को उठना न हो, थिकोड़ने फैलाने आदि चेष्टाओं में सुखपूर्वक प्रवृत्ति हो, उसे भली प्रकार जुड़ा जानो।

“अस्थिभग्नं व्युतं सन्धिं सन्दधीत समं पुनः । समेन सममङ्गनं कुत्वाऽन्येन विवक्षणः ॥ स्थिरैः कवलिकाबन्धैः कुशिकाभिश्च संस्थितम् । पट्टैः प्रभूतसर्पिष्वैः बन्धीयादचलं सुखम् ॥ अविवाहिभिरन्यैश्च वैष्टिकैस्तमुपाचरेत् । ग्लानिर्हि न हिता तस्य सन्धिष्विश्लेषकारिका ॥”

॥ चरक चि० अ० २५ ॥७०॥

इति सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने भग्नचिकित्सतं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥

चतुर्थोऽध्यायः

अथातो वातव्याधिचिकित्सतं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥ अब इसके आगे वातव्याधिचिकित्सा का व्याख्यान करें—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥ १,२ ॥ आमाशयगते वाते च्छुर्द्विचिन्ता यथाक्रमम् । दैयः षड्धरणो योगः सप्तरात्रं सुखाम्बुना ॥ ३ ॥ चित्रकेन्द्रयवे पाठा कटुकाऽतिविपाऽभया । वातव्याधिप्रशमनो योगः षड्धरणः स्मृतः ॥ ४ ॥ आमाशय गत वायु में विधि अनुसार वमन करा के, सात दिन तक षड्धरण योग को गरम पानी से देना चाहिये ।

चित्रक, इन्द्रजो, पाठा, कटुकी, अतीक्ष और हरड, इसका नाम षड्धरण है, यह वातरोग को नाश करनेवाला है । ( छ धरण-बराबर है, मध्यम आकार के इक्कीस निष्पाव के ) ।

वक्तव्य—यथाविधि—स्नेहन स्वेदन देकर, वमन के लक्षण, वेग, कायशुद्धि संसर्जन क्रम के अनुसार । षड्धरण—यह एक संज्ञा है । प्रथम दिन एक कर्ण देकर, प्रतिदिन तीन तीन निष्पाव बढ़ाने से सातवें दिन पूरे हो जाते हैं ॥ ३,४ ॥

पकाजयगते चापि देयं स्नेहविरेचनम् ।

वस्तयः शोधनीयाश्च प्राणाश्च लवणोत्तराः ॥ ५ ॥

वायु के पक्वाशय में होने पर स्नेह विरेचन देना चाहिये, शोधनीय वस्तियाँ दे । लवण प्रधान भोजन देना चाहिये । ( शोधन वस्तियाँ—शोधन द्रव्यों के क्वाथ एवं कल्क, स्नेह के साथ ) वक्तव्य—

“विशेषतस्तु कोष्ठस्थे वाते क्षारं विवेन्नरः ।

पाचनोवेदीपनोयैरल्लेवा पाचयेन्मलान् ॥

गुदपक्वाशयस्थे तु कर्मादावर्त्ततुद्व हितम् ।

आमाशयस्थे शुद्धस्य यथा दोषहराः क्रियाः ॥”

चरक ॥ ५ ॥

कार्यो वस्तिगते चापि विधिर्बस्तिविशोधनः ।

वस्तिगत वायु में वस्ति शोधक उपाय करे ।

श्रोत्रादिषु प्रकृपिते कार्यश्चानिलह्वा क्रमः ॥ ६ ॥

श्रोत्र आदि में वायु प्रकोप होने पर वात-नाशक चिकित्सा

( स्नेहन, स्वेदन ) करे ॥ ६ ॥

स्नेहाभ्यञ्जोपनाहाश्च मर्दनाल्लेपनानि च ।

त्वक्कमांसासूकसिराप्राप्ते कुर्याच्छासूत्रविमोक्षणम् ॥

त्वक् ( रस ), मांस-खिरा और रक्त में वायु के पहुँचने पर

स्वेदन, अभ्यञ्ज, उपनाह, मर्दन, आल्लेपन, और रक्तमोक्षण करना चाहिये ।

स्वेदाभ्यंगा निवातानि द्रव्यं चान्नं स्वगाश्रिते ।

शीताः प्रदेहा रक्तस्थे विरेको रक्तमोक्षणम् ॥

विरेको मांसमेदःस्थे निरूहाः शमनानि च ।

बाह्याभ्यन्तरतः स्नेहैरस्थिमज्जगतं जयेत् ॥ ७ ॥

स्नेहोपनाहान्निकर्मबन्धनोन्मर्दनानि च ।

स्नायुसन्ध्यस्थिस्पंश्राप्ते कुर्याद्व्यावतन्द्रितः ॥ ८ ॥

वायु के स्नायु-सन्धि और अस्थि में आ जाने पर, स्नेहन, उपनाह, अन्निकर्म, बन्धन, उन्मर्दन कार्य बिना आलस्य के ( चिरकाल तक ) करना चाहिये ॥ ८ ॥

निरुद्धेऽस्थनि वा वायो पाणिमन्थने दारिते ।

नाडीं दत्त्वाऽस्थनि भिषक् चूषयेत्पवनं बली ॥ ९ ॥

अस्थि में वायु के जानेपर, अस्थि को आरा शस्त्र से चीर-कर, उसमें दो मुखवाली नाड़ी लगाकर, बलवान् वैद्य, वायु का आर्चुषण करे ।

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