सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ४
वक्तव्य—अस्थियों में वक्रता (रिक्ट) या अस्थियों का क्षय करने का कारण आयुर्वेद में वायु को माना है वायु के लिये स्नेहन—स्निग्ध उपचार हैं। इसीसे कहा है—“वाद्याभ्यन्तरतः स्नेहैरस्थि मज्जगतं जयेत् ॥” अन्दर बाहर दोनों में स्नेहन करते। (२) अस्थिक्षयज्ञान् वस्तिभिः तित्तकोपहितैश्च ॥ संग्रह। इसमें कैलसियम जैसी रूक्षवस्तु कैसे लाभ करती है, यह विचारणीय है—आयुर्वेद की दृष्टि से हैलीवर ऑयल, कॉड-लीवर ऑयल इनका देना तो स्निग्ध होने से समझ में आता है ॥ ६ ॥
शुक्रप्राप्तेऽनिले कार्यं शुक्रदोषचिकित्सितम्। वायु के शुक्र में आने पर शुक्र दोष चिकित्सा करते। हर्षोऽन्नपानं शुक्रस्थे बलशुक्रकरं हितम्। विबुद्धमार्गं दृष्ट्वा वा शुक्रं दद्याद् विरेचनम् ॥ ४० ॥ अवगाहकुटीकर्षप्रस्तराभ्यङ्गवस्तिभिः ॥१०॥ जयेत् सर्वोन्नजं वातं सिरामोक्षैश्च बुद्धिमान्। एकाङ्गं च मतिमाञ्छुङ्गैश्चावस्थितं जयेत् ॥११॥ सर्वांग गतं वायुं मे—अवगाहनं, कुटीस्वेदं, कर्षस्वेदं, प्रस्तरस्वेदं, अभ्यंगं, वस्ति और सिरामोक्षणसे वैद्य वायुको शान्त करे। एकांग में क्षणिक रूप में स्थित वायु को बुद्धिमान् शीग से शान्त करे। (सदा रहनेवाली एकांग वायुमें अवगाहन आदि करते)। “सर्वांगकुपितेऽभ्यंगो वस्त्यः सातुवासनाः ॥ ४० ॥ वलासपितरकैस्तु संसृष्टमबिरोधिनः। कफ, पित्त से मिली वायु को इनके अविरोधि चिकित्सा से शान्त करे।
सुमिवाते त्वसूक्ष्मोक्षं कुर्यात्तु बहुशो भिषक् ॥१२॥ दिद्यान्व च लवणानाग्धूमैस्तैलसमन्वितैः।
रक्त के आवृत वायु में लवणों में स्पर्श जान न होने पर, वैद्य बार २ रक्त मोक्षण करे। रक्त मोक्षण के पश्चात् (वायु प्रकोप न हो) सैन्धव घर का धुंवासा इनको तेल में मिलाकर लगाये।
पञ्चमूलैश्व्रतं क्षीरं फलाम्लो रस एव च ॥१३॥
सुस्निग्धो धान्ययूषो वा हितो वातविकारिणाम्। वातरोगियों के लिये बृहत्पञ्चमूल से सिद्ध किया दूध, अनार आदि खट्टे फल, मांसरस, अति स्निग्ध उड़द आदि का यूष उत्तम है ॥ १३ ॥
काकोल्यादिः सवातघ्नः सर्वाम्लद्रव्यसंयुतः ॥१४॥
सानूपौदकमौसस्तु सर्वस्नेहसमन्वितः।
सुखोष्णः स्पष्टलवणः साल्वणः परिकीर्तितः ॥१५॥
तेनोपनाहं कुर्वीत सर्वदा वातरोगिणाम्।
साल्वण—काकोल्यादिगण, वातघ्न द्रव्य (भद्रदाव्यादि, विदारीगन्धादि), सब खट्टे द्रव्य (शुक्त, कांजी सुरा, सौवी-
रक, दही मस्तु आदि या अनार, बिजौरा आदि), औदक मांस (कछुए, मछली आदि के) आनूप मांस (मैस-सुअर आदि के) सर्वस्नेह (घी, तैल, वसा, मज्जा,) इनके साथ प्रचुर लवण मिलाकर सुहाता हुआ गरम लेप 'साल्वण' कहा जाता है। इससे वातरोगियों में सदा उपनाह करें।
कुञ्चन्यमानं रुजातं वा गार्गं स्तब्धमथापि वा ॥१६॥ गातं पट्टैर्निवन्धनीयात् क्षौमकार्पासिकोणिकैः।
विडाळनकुलोद्गाणां चर्मगोण्यं सुगस्य वा ॥१७॥ प्रवेशयेद्वा स्वभ्यक्तं साल्वणेनोपनाहितम्।
जो अंग संकुचित हो गया हो, जिसमें पीड़ा हो, या जो अङ्ग जड़ (स्थिर) बन गया हो, उस अंग पर क्षौम (रेसमी) कपास के बन्ध, तथा ऊन की पट्टियाँ कसकर बाँध देवे। अथवा भली प्रकार स्नेह अभ्यंग करके, साल्वण से उपनाह देकर अङ्ग को बिछी, नेवला, चूहा, या हरिण इनकी खाद्य से बनी थैली में उस अङ्ग को रख देवे ॥ १६, १७ ॥
स्कन्धवक्ष्छिकप्रान्तं वायुं मन्यागतं तथा ॥१८॥ वमनं हन्ति नस्थं च कुशलेन प्रयोजितम्।
स्कन्ध, वक्ष, त्रिक और मन्यागत वायु को कुशल वैद्य से दिया वमन और नस्थ नष्ट कर देता है। (नस्थ-बिरोविरेचन) ॥
शिरोगतं शिरोवस्तिहन्ति वाऽसन्निवमोक्षणम् ॥१९॥ स्नेहं मात्रासहस्रं तु धारयेत्तत्र योगतः।
शिरोगत वायु को शिरोवस्ति या रक्त मोक्षण नष्ट करता है। इसमें स्नेह को युक्ति से एक सहस्र मात्रा तक धारण करे।
मात्रा का परिमाण— “निमेषोन्मेषणे पुंसां स्फोटनं वा तथाजुलेः। अक्षरस्थ लघोर्वाऽपि मात्रा त्वबारणं भवेत्” ॥ १६ ॥
सर्वाङ्गशतमेकाङ्गस्थितं वाऽपि समीरणम् ॥ २० ॥ रुणद्वि केवलो वस्तिवर्गयुवेगमिवाचलः।
सर्वांग गत या एकांग गत वायु को अकेली वस्ति ही रोक देती है, जिस प्रकार पहाड़ वायु के वेग को रोक देता है ॥
स्नेहस्वेदस्तथाऽभ्यङ्गो वस्तिः स्नेहविरेचनम् ॥२१॥ शिरोवस्तिः शिरःस्नेहो धूमः स्नेहिक एव च।
सुखोष्णः स्नेहगणद्वयो नस्थं स्नेहिकमेव च ॥२२॥ रसाः क्षीराणि मांसाणि स्नेहाः स्नेहान्वितं च यत्।
भोजनानि फलाम्लानि स्निग्धानि लवणानि च ॥२३॥ सुखोष्णाश्च परीपेकास्तथा संवाहनानि च।
कुंकुमायुरूपत्राणि कुष्ठैलातगराणि च ॥२४॥ कौशेयोर्णिकरोमाणि कार्पासानि गुरुणि च।
निवातातपयुक्तानि तथा गर्भगृहाणि च ॥२५॥ सूद्वो शय्याऽग्निनसंतपो ब्रह्मचर्यं तथैव च।
समासेनेवमादीनि योज्यान्यनिलरोगिषु ॥२६॥