भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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अ० ४ ]

चिकित्सास्थानम्

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वातरोगियों के सेवनीय-स्नेह, स्वेद, अर्भंग, वस्ति, स्नेह-विरेचन, शिरोवस्ति, शिर पर स्नेह लगाना, स्नेहिकधूम्र, सुहाता गरम स्नेह का गण्डूष, स्नेहिकनस्य, मांखरस, दूध, मांस, स्नेह (बसा, घी, तैल आदि), स्नेह से युक्त अन्य भोजन, दाडिम आदि खड़े फल, स्निग्ध एवं लवण युक्त भोजन, सुहाता गरम पत्रिके, संवाहन, केसर-अगरू-तेजपत्र-कूठ बड़ी इलायची तगर का प्रयोग, रेसम, ऊन, रोमावाले कपास के भारी वस्त्र, वायुरहित-धूपवाले गर्भ गृहों में रहना, कोमल शय्या, अग्नि का सेकना, ब्रह्मचर्य, आदि इसी प्रकार आहार-विहार संक्षेप में वात रोगियों को देना चाहिये ॥२१-२६॥

त्रिदुहन्तीमुषर्णक्षीरीसमलाशङ्खिनीत्रिफलाविडङ्काना-मक्षसमाः भागाः, बिल्बमात्रः कल्कस्तिल्वकमूलकस्पित्त-कयोः, त्रिफलारसदधिपात्रे द्वे द्वे, घृतपात्रमेकं, तदैकध्व सं-सृष्ट्य विपचेत्, तिल्वकसर्परेतत् स्नेहविरेचनमुपदिशन्ति वातरोगिषु । तिल्वकविधिरैवाशोकरम्यकयोर्द्रष्टव्यः ॥२७॥

तिल्वक घृत—निशोथ, जमालगोटा, स्वर्णक्षीरी (चोक), सभला (यवतिका), शंखिनी, त्रिफला, वायविडंग, प्रत्येक एक कर्ण, तिल्वकमूल, कमीला इनका कल्क एक तिल्व (एकपल परिमाण में), त्रिफला क्वाथ दो आदक, दही-दो आदक, घी एक आदक, इन सबको एक साथ मिलाकर पकाये । यह तिल्वकघृत वातरोगियों के लिये विरेचन है । तिल्वक की भाँति अशोक और महानिम्ब (डेक) से भी घृत बनाना चाहिये । (रम्यक-पर्वत निम्ब-इल्हण) ॥२७॥

तिलपरिपीडनोपकरणकाष्ठाग्न्याहृत्यानलपकात् तैलपरि-पीतान्युणूनि खण्डशः कल्पयित्वाऽवबुद्य महति कटाहे पानीयेनाभिच्छाद्य क्वाथयेत्, ततः स्नेहमन्तुपृष्ठाद्यदुदेति तत् सरकपाण्योरन्यतरणादाय वातघ्नौषधप्रतीवापं स्नेह-पाककल्पेन विपचेत्, एतदणुतैलमुपदिशन्ति वातरोगिषुः अणुभ्यस्तैलद्रव्येभ्यो निष्पाद्यत इत्यणुतैलम् ॥२८॥

जिस कोल्हू ने बहुत दिनों तक तेल पिया हो, उस कोल्हू की लकड़ियों को लाकर, उनके टुकड़े-टुड़े करके, कूटकर, बड़े भारी कड़ाहे में पानी भरकर इनको भली प्रकार पकावे । इससे जो स्नेह पानी की पीठ पर आ जाये, उसको रूई के फाई या कपड़े अथवा हाथ से निकाल ले । इस तैल में भद्र-दार्थादि वातघ्न औषधियों का कल्क मिलाकर स्नेह पाक विधि से पाक करे । इसको अणु तैल कहते हैं, वातरोगियों के लिये उत्तम बताते हैं । सूक्ष्म तैल द्रव्यों से बनाया जाने के कारण इसे अणु तैल कहा जाता है ॥२८॥

अथ महापञ्चमूलकाष्टैर्बहुभिरवदद्यावनिप्रदेशमसि-तमुषितमेकरात्रमुपशान्तेऽरन्नावपोह्य भस्मनिष्ठतां भूमिं

विदारिरगन्धादिसिद्धेन तैलघटशतेन तुल्यपयसाऽभिषिच्ये-करात्रमवस्थाप्य ततो यावती भुक्तिका स्निग्धा स्यात्तामा-दायोणोदकेन महति कटाहेऽभ्यासिञ्चेत्, यत्र यत्तैलमु-त्तिष्ठेत् पणिभ्यां पर्यादाय स्वनुगुणं निदध्यात्, तत-स्तैलं वातहरोषधक्वाथमांसरसक्षीरामूलभागसहस्रोण सह-स्रपाकं विपचेद्यावता काष्ठेन अकृयात् पक्तुं, प्रतिवापश्चात्र हैमवता दक्षिणापथगाश्च गन्धा वातस्तानि च, तस्मिन् सिध्यति शङ्खान्नाधमापयद् दुन्दुभौनावातयेच्छृच्छं धारयेद् बाल्म्यजनैश्च वीजयेद् ब्राह्मणसहस्रं भोजयेत्, तत् साधु सिद्धमवतार्य सौवर्णं राजते शुन्मये वा पात्रे स्वनुगुणं निदध्यात्, तदेतत् सहस्रपाकमप्रतिवारवीर्यं राजाहं तैलम्, एवं भागशतविपकं शतपाकम् ॥२९॥

काली भूमिपर बिल्बादि महापंचमूल की बहुत सी लकड़ियाँ एकत्रित करके इनको जलावे । एक रात के पीछे अग्नि के शान्त हो जाने पर, अग्नि को हटाकर, राख से खाली की भूमि पर, विदारी गन्धादि गण से सिद्ध किये तैल के एक सौ घड़ों से एवं एक सौ दूध के घड़ों से इस भूमि पर सेचन करे । फिर एक रात के पीछे जितनी भूमि स्निग्ध हो, उतनी मिट्टी को लेकर, गरम पानी में एक बड़े कड़ाहे के अन्दर घोल देवे । इससे जो तैल पानी के उपर आ जाये, उसे हाथों से लेकर सुरक्षित रख देवे । फिर इस तैल का वातहर औषधियों के क्वाथ मांखरस, दूध, कांजी इनके हजार भागों के साथ, जितने समय में एक हजार बार पाक कर सके, उतने समय कल्क रस में हिमालय के और विन्ध्याचल (दक्षिणा पथ) के गन्ध द्रव्य और वातघ्न औषधियों को डाले । इस तैल के बनते समय शंखों को बजाये, नगाड़े बजाये, इस पर छत्र चढ़ाये, बालों की चँवर झुलाये । एक हजार ब्राह्मणों को भोजन कराये । फिर भली प्रकार सिद्ध होने पर उत्तारकर सुवर्ण, चाँदी, या मिट्टी के पात्र में सुरक्षित रख देवे । यह सहस्र पाक, अप्रतिहत शक्ति वाला तैल राजाओं के योग्य है, इस प्रकार एक सौ बार पकाया तैल शतपाक तैल है ॥२९॥

गन्धर्वहस्तमुष्ककनक्तमालाटरूपकपूतीकाररवधचित्र-कादीनां पत्राण्याद्रीणि लवणेन सहोद्वसलेऽवबुद्य स्नेहघटे प्रक्षिप्यावलिष्य गोशक्रुद्धिद्विहयेत्, एतत्पत्रलवणमुपदिश-न्ति वातरोगेषु ॥३०॥

एरण्ड, मुष्क, करंज, अङ्गुस, नाटा करंज, अमलतास, चित्रक आदि के हरे पत्रों को लेकर नमक के साथ ऊखल में

१ गन्ध द्रव्य—कस्तूरी, शट्टी, कुष्ठ, मांसा, सरल देवदारु आदि उत्तरीय प्रदेश के, चन्दन, जातीफल, शीतलचोनी, लवंग, दालचोनी आदि दक्षिण प्रदेश के द्रव्य बरते । इनका कल्क तेल का चतुर्थांश ।