सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० १ ]
कूटकर, घी के घड़े में रखकर, (मुख बन्द करके) मिट्टी से घड़े के मुख पर लेप करे। इस घड़े के चारों ओर उपले रखकर आग लगाये। इस पत्र लवण को वातरोगों में उपयोगी कहते हैं।
एवं स्तुहीकाण्डवार्ताकुशिमूलवर्णाणि संखुद्य घटं पूर-यित्वा सपित्तैल्वसामज्जाभिः प्रक्षिप्याबलिष्य गोशक्रुद्धिर्दहियेत्, एतत् स्नेहलवणमुपदिशन्ति वातरोगेषु। ( इति काण्डलवणम् ) ॥३१॥
स्तुही (थोर) की डण्डी, बड़ी कटरी, सुहांजना और सैन्यलवण, इन सब को कूटकर, घड़े में भरकर, घी, तैल, वसा, मरूजा इनको भरकर, मिट्टी से लेप करके, गाय के छानों से इसको जलाये। इसको स्नेह लवण कहते हैं, वात रोगों में इसे बरते। (इसे काण्ड लवण भी कहते हैं) ॥३१॥
गणडीरपलाशकुटजबिल्वार्कस्तुह्यपामार्गपाटलापारिभद्रकनादीयैकृष्णगन्धानीपनिम्बनिर्दह्मन्यटरूपकनकमालकपूतिकङ्कृतीकण्टकारिकासल्लातकेकुडीवैजयन्तीकदलीवा-ष्यद्वयेक्षुरकेन्द्रवारुणीश्वेतमोक्षकाशोका इत्येवं वर्ग समूलपत्रशाखमाद्रमाहृत्य लवणेन सह संसृज्य पूर्ववद्गन्धवाक्षारकल्पेन परिस्त्राण्य विपचेत्, प्रतिवापश्चात्र हिङ्गवादिभिः पिप्पल्यादिभिर्वा। इत्येतत् कल्याणकलवणं वातरोगगुल्मप्लीहाभिपङ्कजीर्णार्शोडरोचकार्तानां कासादिभिः क्रुमिभिरुपदुतानां चोपदिशन्ति पानभोजनेष्वपीती ॥३२॥
गणडीर, ढाक, कूड़ा, बिल्व, आक, स्तुही, चिरचित्ता, पाटला, फरहद, जलजम्बू, सुहांजना, कदम्ब, नीम, निर्दहनी (मोरट या चित्रक), अङ्गुसा, करंज, नाटा करंज, बड़ी कटरी, छोटी कटरी, मिलावा, जीर्णोट, वैजयन्ती (अरणी), केला, वाष्पद्रव, तालमखाना, इन्द्रायण, श्वेता (अपराजिता), मोक्षक, इन सबको हरा ही मूलपत्र-शाखा में लेकर सबके बराबर नमक ले। नमक को छोड़कर शेष औषधियों को पूर्व की भाँति खार कल्याण से जलाकर, इसमें, नमक मिलाकर, घोलकर नितार लेवे। इस नितारे जल को पकाये, पकाते समय चौथाई रूप में हिंवादि गण का या पिप्पल्यादि गण का प्रक्षेप इस में मिलाये। यह कल्याणक लवण वातरोग, गुल्म, प्लीहा, अग्नि मांघ, अजीर्ण, अर्श, अरोचक के रोगियों के लिये तथा कास, श्वास, हिका, क्रुमियों से पीड़ित व्यक्तियों के पान भोजन में बरतना चाहिये ॥३२॥
भवति चात्र—
विष्यन्दनादुष्णभावाद्दोषाणां च विपाचनात्। संस्कारापाचनाच्चेदं वातरोगेषु जश्यते ॥३३॥ नमक-विष्यन्दन (खवण बहाने के गुण से) करने से, उष्ण होने से तथा दोषों का पाचन करने के कारण, संस्कार के कारण
अधिक पाचन बन जाने से वात रोगों में प्रशस्त है ॥३३॥ इति श्रीसुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने वातव्याधि-चिकित्सितं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥४॥
पञ्चमोऽध्यायः
अथातो महावातव्याधिचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥१॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
अब इसके आगे महावात व्याधि चिकित्सा का व्याख्यान करेंगे—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था।
वि० मन्तव्य—महावातव्याधि—बड़ी बड़ी वातव्याधियाँ, यथा-वातरक्त एवं अपतानक आदि ॥१,२॥
द्विविधं वातशोणितमुत्तानमवगाढं चेत्येके भाषन्ते, तत्तु न सम्यक्, तद्धि कृष्टबहुत्तानं भूत्वा कालान्तरेणवगाढोभवति, तस्माच्च द्विविधम् ॥३॥
वात रक्त उत्तान और गम्भीर भेद से दो प्रकार का है, ऐसा कई कहते हैं। यह ठीक नहीं है, क्योंकि यह वातरक्त कृष्ट की भाँति उत्तान बनकर कुछ समय पीछे गम्भीर बनता है, इसलिये वात रक्त दो प्रकार का नहीं है ॥ परन्तु चरक दो प्रकार का कहता है, यथा—
“उत्तानमथ गम्भीरं द्विविधं तत्पञ्चशते।
स्वडुमांसाश्रयमुत्तानं गम्भीरं त्वन्तराश्रयम् ॥”
चरके में चिकित्सा के दृष्टिकोण से इसे दो प्रकार का माना है। सुश्रुत में कारण की दृष्टि से इस को एक कहा है, यथा—
“तत् संपृक्तं वायुना दूषितेन,
तस्यावलयादुच्यते वातरक्तम्” ॥३॥
तत्र बलवद्धिग्रहादिभिः प्रकृपितस्य वायोगुर्लुण्णाध-शनगोलस्य प्रदुष्टं शोणितं मार्गमावृत्य वातेन सहैकीभूतं युगपद्वातरक्तनिमित्तां वेदनां जनयतीति वातरक्तम्। तत्तु पूर्व हस्तपादयोरवस्थानं कृत्वा पश्चादहं व्याप्नोति। तस्य पूर्वरूपाणि तोददाहकण्डुशोफस्तम्भस्वकपासुष्यसिरा-स्तानुधमनीस्पन्दनसकियदौर्बल्यानि इयावागुणमण्डलोत्पत्तिश्चाक्रमात् पाणिपादतलाकुलिलुल्फमणिबन्धप्रभृतिषु, तत्राप्रतिकरणोऽपचारिणश्च रोगो व्यक्ततरः तस्य लक्ष्यमुक्तं, तत्राप्रतिकारिणो वैकल्प्यं भवति ॥४॥
इसमें गुरु, उष्ण एवं भोजन पर भोजन करने की आवत-वाले व्यक्ति में दूषित रक्त और बलवान् व्यक्ति के साथ कुस्ती आदि वायुकोपक कारणों से प्रकृपित वायु के मार्ग को रोककर साथ मिलाकर, एक साथ वात और रक्तजन्य वेदनाओं को उत्पन्न करते हैं, इसको वातरक्त कहते हैं। यह वातरक्त पहले हाथ पैरों में स्थान बनाकर फिर सारे शरीर में फैलता है। इसके पूर्वरूप—तोद, दाह, कण्डु, शोफ, स्तम्भ, त्वचा में कठोरता सिरा-स्तानु-धमनी में स्पन्दन, टांगों में दुर्बलता, होते हैं