भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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चिकित्सास्थानम्

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और श्वाय या अरुण चकत्ते, चिना कारण के ही—हाय, पैर के तलुओं में, अंगुलियों में, गुल्फ, कलई आदि में निकल आते हैं। इस दशा में चिकित्सा न करने से तथा अपथ्य सेवन करनेवाले में रोग और भी अधिक बढ़ जाता है। इसके लक्षण निदानस्थान में कह दिये हैं। इस अवस्था में भी चिकित्सा न करने से विकलता होती है।

“तस्य स्थानं करो पादावकुल्यः सर्वसन्ध्यः ॥१॥

कृत्वादौ हस्तपादेषु मूलं देहे विधावति ।

सौक्ष्मात् सर्वसरत्वाच्च देहं गच्छन् शिरायनेः ॥२॥

पर्वस्वभिहंतं लुब्धं वक्तव्यादवतिष्ठते ।

स्थितं पितादिसंस्पृष्टं तास्ताः सुजति वेदनाः ॥३॥

करोति दुःखं तेक्ष्वेव तस्मात्प्रायेण सन्धिषु ।

जानुजंघोरुक्तद्वयं सहस्तपादांगसन्धिषु ॥४॥

निस्तोदः स्फुरणं मेदो गुरुत्वं सुसिरेव च ।

कण्ठः सन्धिषु रग्भूत्वा भूत्वा नश्यति चासक्तत् ।

वैषण्यं मण्डलोत्पत्तिः वातासूक्तं पूर्वलक्षयाम् ॥

चि० अ० २६ चरक ।

आज कल चलनेवाली खाज प्रायः करके हाथों की अंगुलियों के बीच में, पैरों पर, गुल्फों में होती है। इसमें छोटी फुंसी होती है, जिसका मुँह पूय से भरा होता है, यह वातरक्त से पृथक् है। चरक कहता है, अंगुली के बीच स्थान वक्र होने से दोष यहाँ रहकर रोग उत्पन्न करते हैं ॥४॥

भवति चात्र—

प्रायशः सुकुमारणां मिथ्याहारविहारिणाम् ।

स्थूलानां सुखिनां चापि वातरक्तं प्रकृष्यति ॥५॥

प्रायः करके यह बात रक्त नाशुक्त प्रकृति, मिथ्याहार-विहार करनेवाले, स्थूल एवं सुखी जीवन व्यतीत करनेवाले पुरुषों में होता है ॥५॥

तत्र प्राणमांसक्षयपिपासाज्वरमूर्च्छाश्वासकासस्तम्भा-रोचकाविपाकविसरणसंकोचनैरनुपदुतं बलवन्तमात्मवन्तमुपकरणवन्तं चोपक्रमेत ॥६॥

इसमें प्राणक्षय, मांसक्षय, प्यास, ज्वर, मूर्च्छा, श्वास, कास, लग्न, अरोचक, अविपाक, विसरण, संकोचन—इन उपद्रवों से रहित, बलवान्, जितेन्द्रिय, साधन सम्पन्न रोगी की चिकित्सा करे। चरक चि० अ० २६ ।

“अस्वप्नारोचकाश्वासमांसकोथशिरोग्रहः ।

मूर्च्छा च मदरुक्त तृष्णा ज्वरमोहप्रलेपकाः ॥

द्विकका पांगुल्यवीसर्पपाकतोदभ्रमकल्माः ।

अंगुलीवक्रता स्फोटा दाहमर्गमुदाबुद्धाः ॥

एतैरपद्रवैर्वैषण्यं मोहेनैकेन चापि यत् ।

संप्रसाविचिवणं च स्तब्धमर्बुदकूलच यत् ॥

बर्जयेच्च संकोचकरमिन्द्रियतापनम् ।

अकृत्स्नोपद्रवं याप्यं साध्यं स्याचिरपद्रवम्” ॥६॥

तत्र, आदावेव बहुवातरुक्षग्लानाङ्गारते मार्गवरेणादुष्टशोणितमसकृदल्पात्मपमसिञ्चेद्वातकोपभयात् । ततो वमनादिभिरुपक्रमैरुपपाय प्रतिसंस्पृष्टभक्तं वातप्रबले पुराणघृतं पाययेत् । अजाक्षीरं वाऽधर्तैलं मधुकाक्षयुक्तं, शृंगालविन्नासिद्धं वा शर्करामधुरं, शुण्टीशृङ्गाटकशेस्कसिद्धं वा श्यामारान्तासुषवीशृंगालविन्नापीलुशतावरीश्ववदृष्टिपञ्चमूलीसिद्धं वा । द्विपञ्चमूलीकाथाष्टगुणसिद्धेन पयसा मधुकमेपशृङ्गीश्वदृष्टासरलभद्रदारुवचासुरभिरुक्तप्रतीवापं तैलं पाचयित्वा पामादिषुपयुञ्जीत, शतावरीमयूरककणिहज्जमोदामधुकक्षीरविदारीबलातिबलातुणपञ्चमूलीकवाथसिद्धं वा काकोल्यादिप्रतीवापं, बलातैलं शतपाकं वेति । वातहरमूलसिद्धेन च पयसा परिषेचनमम्लैवां कुर्वीत । यवमधुकैरण्डतिलवर्षाभूमिर्वा प्रदेहः कार्यः । तत्र चूर्णितेषु यवगोधूमतिलमुद्गमापेषु प्रत्येकशः काकोलीक्षीरकाकोलीजीवकर्षभक्तबलातिबलाबिसमृणालशृंगालविन्नामेवशृङ्गीप्रियाळगर्कराकशेस्कसुरभिवचाकलकमिश्रेषूपनाहार्यं सर्पितैलवसामज्जादुग्धसिद्धाः पञ्च पायसा व्याख्याताः स्नेहिकफलसारोकारिका वा चूर्णितेषु यवगोधूमतिलमुद्गमापेषु मत्स्यपिशितवेशवारो वा, बिल्वपेशिकातगरदेवदारुसरलारान्ताहरेणुकुष्ठशतपुष्पैर्लोसुरादधिमस्त्युक्त उपनाहः, मातुलुङ्गात्मसैन्धवघृतमिश्रं मधुशिम्रमूलमालेपत्तिलकल्को वेति वातप्रबले ॥७॥

इसमें सबसे प्रथम—वायु की अधिकता, रुक्षता एवं ग्लानता (शुष्कता) से रहित अंग में मार्ग के रुकने से दूषित रक्त थोड़ा थोड़ा करके बहुत बार निकाले, जिससे कि वायु का प्रकोप न होने पाये। फिर वमन—विरेचन आदि चिकित्सा को बरत कर, पेया-विलेपी आदि अन्न क्रम से भोजन देकर, वात की अधिकता होने पर पुरातन घृत पिलाये। अथवा बकरी के दूध में आधा तेल और मुल्हटी का चूर्ण एक कर्ष मिलाकर दे। पुरनपणी से सिद्ध किये दूध को शर्करा और मधु से मीठा करके दे। सौठ सिंधाड़ा और कसेल से सिद्ध किया दूध देवे। निशोध, रास्ता, सुखी (मोटा जीरा), पुरिनपणी, पीलू, शतावरी, गोखरू, दशमूल से सिद्ध दूध देवे। दशमूल के क्वाथ में, आठगुणे दूध को सिद्ध करे। इस दूध में मुल्हटी, मेघशृङ्गी, गोखरू, चौड़, देवदारु, वचा, रास्ता, इनके कल्क का प्रत्येक देकर तैल सिद्ध करे। इस तैल को पान आदि में बरते। शतावरी, चिरन्जिटा, क्षनक्षनिया, अजवायन, मुलेहटी, क्षीरविदारी, बला, अतिबला, पंच तृण मूल, के क्वाथ काकोल्यादि गण का प्रत्येक देकर सिद्ध तैल पिलाये। शरपाक किया बला तैल बरते। एरण्ड आदि वातहर द्रव्यों के मूल से सिद्ध जल से या काँची आदि अम्ल द्रव्यों से स्नान कराये। जो, मुल्हटी, एरण्ड, तिल और पुनर्नवा का लेप करे। जो, नेहू, तिल, मूँग