सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ५ ]
और उद्ग इनमें एक एक के चूर्ण में काकोली, क्षीर काकोली, जीवक, शृषभक, बला, अतिबला, विष, कमलनाल, पुश्चिपणी, मेपशङ्को, पियाल, शर्करा, कसेरु, रास्ना और बचा इनका कल्क मिलाकर, घी, तैल, बसा, मरुजा और दूध में सिद्धकर उपनाह के लिये पायस (खीर) बनाये—इस प्रकार से पाँच खीर बन जाती हैं। अथवा अलसी, तिल, चिरौंजी आदि तेल-वाले फलों से उत्कारिका (लपसी) बनाये। जो, गेहूँ, तिल, मूँग और उद्ग इनके चूर्णों में मछली का मांस या किमिया किया मांस मिलाकर उत्कारिका बनाये। विल्व का गुहा, तगर, देवदारु, निशोध, रास्ना, हरेणु, कूठ, सैक, इलायची, सुरा, दही, मस्तु से मिला उपनाह बनाये। विजौरा का रस, सेन्धव, घी इनमें मीठे सहजन की मूल का या तिल का कल्क मिलाकर वात प्रबल वात रक्त में लेप करे ॥७॥
पित्तप्रबले द्राक्षारैवतकटफलपयस्यामधुकचन्दनका-शर्म्यकषायं शर्करामधुरं पाययेत्, शतावरीमधुकपटो-लत्रिफलाकटुरोहिणीकषायं गुड्डीकषायं वा पित्तव्यरहरं वा चन्दनादिकषायं शर्करामधुमधुरं, मधुरतिककषायसिद्धं वा सर्पिः, विसमुणालभद्रश्रीयपद्मकषायेणाधर्क्षीरेण परिषेकः, क्षीरेत्तुरसेमधुकशर्करातण्डुलोदकैर्वा द्राक्षेनुक-षायमिश्रैर्वा मस्तुमघधान्याम्लैः जीवनीयसिद्धेन वा सर्पिपाऽभ्यङ्गः, शतघौतघुतेन वा काकोल्यादिकल्कक-षायविपक्वेन वा सर्पिर्वा, शालिपष्टिकनलवञ्जुलता-लोसशृङ्गाटकगलीड्घगौरगैरिकञ्जैवलपद्मकपद्मपत्रप्रभृ-तिभिर्धान्याम्लपिष्टैः प्रदेहो घृतमिश्रः, वातप्रबलेऽप्येष सुखोष्णः प्रदेहः कार्यः ॥८॥
पित्तप्रबल वात रक्त में—द्राक्षा, अमलतास, कटफल, बिदारी, मुलैहटी, चन्दन, गम्भारी इनका कषाय शर्करा और मधु से मीठा करके पिलाये। शतावरी, मुलैहटी, पटोल, त्रिफला, कुटकी का कषाय या गिल्ले का कषाय या पित्तव्यर नाशक चन्दनादिकषाय को शर्करा, मधु से मीठा करके पिलाये। मधुर एवं तित्त कषाय से सिद्ध घृत पिलाये। विष, मृणाल, चन्दन, पद्ममाल इनके कषाय में आधा दूध मिलाकर परिषेक करे। दूध, ईख का रस, मुलैहटी, शर्करा, या चावल के पानी से या द्राक्षा, इल्लु के कषाय के साथ मस्तु-मय और कांजी मिलाकर परिषेक करे। जीवनीय गण से सिद्ध घी से अभ्यंग करे। शतघौत घृत से अभ्यंग करे। शाली, सांठी, नडसर, जलवेतस, तालीश, सिंधाड़ा, कमलजीज, हल्दी गेरु, सरवाल, पद्ममाल, कमलपत्र आदि को कांजी में पीसकर घी मिलाकर लेप करे। वायु की प्रबलता होने पर इन्हीं को सुहाता गरम करके लेप करे ॥९॥
रक्तप्रबलेऽप्येवं बहुशस्त्र शोणितमवसेचयेत्, शीत-तमाश्र प्रदेहाः कार्या इति ॥१०॥
रक्त की प्रधानतावाले वातरक्त में भी इसी विधि को बरते। बहुत बार रक्त मोक्षण करे। अतिशय शीत प्रदेह लगाते चाहिये ॥१०॥
श्लेष्मप्रबले त्वामलकहृदिद्राकषायं मधुमधुरं पाययेत्, त्रिफलाकषायं वा; मधुकशृङ्गवैरहरीतकीतिकुरोहिणी-कल्कं वा सञ्चोद्वं, मूत्रतोययोरन्यतरेण गुड्डहरीतकीं वा भक्षयेत्, तैलमूत्रक्षारोदकसुरागुक्तकफश्चोषधनिकवा-थैश्च परिषेकः आरुवादिकषायैर्वाणैः, मस्तुमूत्रसुरा-गुक्तमधुससारिवापद्मकसिद्धं वा घृतमभ्यङ्गः, तिलसर्प-पातसौयवचूर्णानि श्लेष्मातककपित्थमधुश्रिप्रमिश्राणि क्षारमूत्रपिष्टानि प्रदेहः, श्वेतसर्षपकल्कः, तिलाश्वगन्धा-कल्कः, प्रियालसेलुकपित्थकल्कः, मधुश्रिप्रपुनर्त्वाकल्कः व्योषतित्ताप्रथकपर्णीवृहतीकल्क इत्येतेषां पञ्च प्रदेहाः सुखोष्णाः क्षारोदकपिष्टाः शालिपर्णीं पुद्गिनपर्णीवृहत्तीं वा क्षीरपिष्टास्तर्पणमिश्राः ॥११॥
कफ प्रबल वात रक्त में—आँवले हल्दी के कषाय को मधु से मीठा करके पिलाये। या त्रिफला का कषाय पिलाये। मुलै-हटी, साँठ, हरड, कुटकी इनके कल्क को मधु के साथ खिलाये। गोमूत्र या जल के साथ गुड् हरीतकी (गुड् और हरड) को खिलाये। तैल, गोमूत्र, क्षारोदक, सुरा, शुक्त, कफश्च औषधियों के (आरुवधादि गण) के सुहाते गरम कषाय से परिषेक करे। आरुवधादि गण के गरम कषाय से परिषेक दे। मस्तु, गोमूत्र, सुरा, शुक्त, मुलैहटी, सारिवा और पद्ममाल से सिद्ध घी से अभ्यंग करे। तिल, सरसों, अलसी, जौ, इनके चूर्णों को, लसूडा, कैय, मीठा सहजन इनमें मिलाकर क्षार (वक्षार) और गोमूत्र में पीसकर प्रदेह करे। श्वेत सरसों के कल्क से लेप करे। तिल-अश्वगन्धा के कल्क से लेप करे। प्रियाल, लसूडा और कैय के कल्क का लेप करे। मीठा सहजन, पुनर्त्वा का लेप करे। त्रिकुट, कुटकी, शालपर्णी, बड़ी कटेरी, इनको क्षारोदक से पीसकर सुहाता हुआ गरम लेप एक-एक से अलग-अलग, या सबको मिलाकर करे, इस प्रकार से ये पाँच प्रदेह कहे हैं। शालपर्णी, पुश्चिपर्णी, कटेरी, और बड़ी कटेरी, इनको दूध में पीसके जौ के सत्तू के साथ मिलाकर लेप करे ॥
संसर्गं सन्निपाते च क्रियापथमुक्तं मिश्रं कुर्वीत् ॥११॥ दोषों के संसर्ग या सन्निपात में कही चिकित्सा को मिश्र-कर बरते ॥११॥
सर्वेषु च गुड्हरीतकीमासेवेत, पिप्पलीर्वा क्षीर-पिष्टा वारिपिष्टा वा पद्मचामिबुद्धया दशामिबुद्धया वा पिबेन्, क्षीरोदनाहारो दशरात्रं भूयश्चापकर्षयेत्, एवं यावत् पञ्च दश वेति, तदेतत् पिप्पलीवर्धमानकं वात-शोणितविषमञ्जरारोचकपाण्डुरोगप्लीहोदराशः कासश्चा-सशोफ़ोषाग्निनसादहृद्वोगोदराण्यपहन्ति, जीवनीयप्रती-वापं सर्पिःपयसा पाचयित्वाऽभ्यज्यात् स हासहृदेवा-