भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

पृष्ठ 465, कुल 872 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 465

अ० ५ ] ५२

चिकित्सास्थानम्

४०६

चन्दनमूर्वामुस्ताप्रियाळशातावरीकशेरुपद्मकमधुकशतपुष्पाविदारीकुष्ठानि क्षीरपिष्टः प्रदेहो घृतमण्डयुक्तः सैरय-कारुषकबलातिबलाजीवन्तीसुषवीकल्कौ वा च्छागक्षीर-पिष्टः, क्षीरपिष्टः कारुसर्मसधुकतर्पणकल्कौ वा मधुच्छिष्टम-च्छिष्टासर्जससारिवाक्षीरसिद्धं पिण्डतैलमभ्यङ्गः, सर्वेषु च पुराणघृतसामलकरसविषकं वा पानार्थं, जीवनीयसिद्धं परिषेकार्थं, काकोल्थादिकाथकल्कसिद्धं वा सुषवीकाथक-ल्कसिद्धं वा, कारवैल्लककाथमात्रसिद्धं वा, बलातैलं वा परिषेकावागाहवस्तिभोजनेषु, शालिषष्टिकयवगोधूमात्रमनवं भुञ्जीत पयसा जाङ्गलरसेन वा मुह्युषेण वाटनम्लेन, शोणितमोक्षं चाभीर्घ्नं कुर्वीत; उच्छिष्टदोषे च वमनविरे-चनास्थापनानुवासनकर्म कर्तव्यम् ॥१२॥

सब प्रकार के वातरक्त में गुड और हरङ्ग का सेवन करे । पिप्पली को दूध से या पानी से पीसकर पाँच-पाँच बढ़ाते हुए अथवा दस दस बढ़ाते हुए दस दिन तक खाये । भोजन में दूध और भात लेवे । फिर पाँच-पाँच या दस दस क्रमशः कम करता जाये । इस प्रकार पाँच जब तक या दस पर न आ जाये तब तक घटाये । इस विधि को पिप्पली-वर्धमान कहते हैं । यह प्रयोग वातरक्त, विषमञ्जर, अरोचक, पाण्डु रोग, प्लीहा, उदर, अर्श, कास, खास, शोफ, शोष, अग्निहाद, हृदरोग और उदर रोग को नष्ट करता है । जीवनीय गण के कल्क से साधित घी से सिद्ध किये दूध से अभ्यंग करे । माषपर्णी, सहदेवा, चन्दन, मूर्वा, मुस्ता, चिरौंजी, शतावरी, कसेरू, पन्नाख, मुलेहटी, सौफ, विदारी, कुष्ठ इनको दूध के साथ पीसकर घृतमण्ड के साथ मिलाकर प्रदेह करे । झिण्टी, अङ्गुसा, बला, अतिबला, जीवन्ती, सुषवी, इनके कल्क का वकरी के दूध में पीसकर लेप करे । गाम्भारी, मुलहटी, जी का सन्, इनको गाय के दूध में पीस कर लेप करे । सोम, मजीठ, राल, सारिवा, दूध इनसे सिद्ध किया तेल अभ्यंग में बरते, इसको पिण्ड तैल कहते हैं (अपर-सुतन छना किट्ट युक्त तेल, पिण्डतैल है) । सय वातरक्त में आँवले के रस से पकाया पुरातन घृत (दस सालका) पीने के लिये देवे । जीवनीय गण से सिद्ध पुरातनघृत परिषेक में बरते । काकोल्थादि क्वाथ और कल्क से सिद्ध घृत परिषेक में बरते । सुषवी के क्वाथ कल्क में सिद्ध किया घृत परिषेक में या करेले के अकेले क्वाथ में सिद्ध घृत परिषेक में बरते । बलातैल को परिषेक, अवगाहन, वस्ति और भोजन में बरते । पुरातन शाली, साठी, जी और गेहूँ को दूध से मांस रस से या खटाई रहित मूंग के दूध के साथ खाये । बार-बार रक्तमोक्षण करे । दोष के उत्कट होनेपर वमन, विरेचन, आस्थापन, अनुवासन कर्म करे । (सुषवी—कलौंजी-हरयेके) ॥१२॥

परवल, विफला, शतावरी, गिलोय और कुटकी, इनका क्वाथ पीने से वातरक्त की तीव्र वेदना शीघ्र शान्त होती है ॥ भवन्ति चात्र— एवमाद्यैः क्रियायोगैरचिरोत्पतितं सुखम् । वातासुक् साध्यते वैद्यौष्यतेतु चिरोत्थितम् ॥१४॥ इसमें श्लोक भी हैं—इस चिकित्सा से थोड़े काल का उत्पन्न वातरक्त वैद्य अच्छा कर लेते हैं, और देर का उत्पन्न वात रक्त याप्य होता है ॥१४॥ उपनाहपरोषेकप्रदेहाभ्यङ्गजनानि च । शरणाभ्यप्रवातानि मनोज्ञानि महान्ति च ॥१५॥ मृदुगण्डोपधानानि शयनानि सुखानि च । वातरक्तं प्रशस्यन्ते मृदुसंवाहनानि च ॥१६॥ उपनाह, परिषेक, प्रदेह, अभ्यंग, खुली वायु रहित सुन्दर और बड़े विशाल घर, कोमल गोदूम तकिया (मसनद), सुख-दायक शय्या और कोमल संवाहन वात रक्त में उत्तम हैं ॥ व्यायामं मैथुनं कोपमुष्णाम्ललवणानाम् । दिव्यास्वप्नमभिष्यन्दि गुरु चात्रं विवर्जयेत् ॥१७॥ व्यायाम, मैथुन, क्रोध, उष्ण-अम्ल-लवण भोजन दिन में सोना, अभिष्यन्दि और गुरु अन्न इसमें त्याज्य-अपथ्य हैं ॥१७॥ अपतानकिनमखस्ताक्षमवक्त्रभ्रुवमस्तव्यमेठमस्वेदन-मवेपनमप्रलापिनमखट्वापातितमबहिःप्रायामिनं चोपक-मेत । तत्र प्रागेव स्नेहाभ्यक्तं स्विन्नशरीरमवपीडनेन तीक्ष्णनोपक्रमेत शिरःशुद्धयर्थं, अनन्तरं विदारिगन्धादि-क्वाथमांसरसक्षीरदधिषकं सर्पिरच्छं पाययेत्, तथा हि नातिमात्रं वायुः प्रसरति, ततो भद्रावदिवीवातस्न-गणमाहृत्य सयवकोलकुलस्थं सान्नीदकमांसं पञ्चवर्ग-मेकतः प्रक्वाथ्य तमादाय क्वायमरुद्धश्रीरः सहोन्मिश्य सर्पितैलवसामज्जभिः सह विपचेनधुरकप्रतीवापः तदेतत् त्रैवृत्तमपतानकिनां परिषेकावगाहाभ्यङ्गपानभोजनानुवा-सननस्येषु विदध्यात, यथोक्तैश्च स्वेदविधानैः स्वेदयेत्, बलीयसि वाते सुलोषणुपुसुसकरीषपूर्णं कृपे निदध्यादा-मुखात्, तमायां वा अङ्गारजुल्ल्यां तमायां वा शिलायां सुरापरिषिक्त्यां पलागदलच्छन्नायां आययेत् कृशरावेशवारपायसंवां स्वेदयेत् । मूळकोरुबुकस्फूर्जार्ज-कार्कसप्रलाशङ्खिनीस्वरससिद्धं तैलमपतानकिनां परिषे-कादिषुपयोज्यम् । असुक्तवता पीतमरुलं दधि मरिच-वचायुक्तमपतानकं हन्ति, तैलसर्पिवंसाक्षौद्राणि वा । एतच्छुद्धवातापतानकविधानमुक्तं, संसृष्टे संसृष्टे कर्त-व्यम्, वेगान्तरेषु चावपीडं दद्यात्, ताम्बूडककर्द-कृष्णमस्त्यशिशुमारवराहवसाश्चासेवेत, क्षीराणि वा वातहरसिद्धानि, यवकोलकुलस्थमूळकदधिघततैलसिद्धा वा यवागूः, स्नेहविरचनास्थापनानुवासनैश्चैर्न दशरात्रां-

पटोलत्रिफलाभीरुगुडूचीकटुकाकृतम् । कार्थं पीत्वा जयत्याशु वातशोणितजां रुजम् ॥१३॥