भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

६ अ० ५

हृत्वेगमुपक्रमेत , वातव्याधिचिकित्सित' चावेक्षेत, रक्षा-कर्म च कुर्यादिति ॥१८॥

जिसकी आँख गिरी न हो, मोँहें टेढ़ी न हुईं हों, मेहन में स्तम्भता न हो, पसीना और कम्पन न हो, वक्वाद न करता हो, खाटपर ही न पड़ा रहनेवाला, वहिरायाम से न पीड़ित-ऐसे अपतन्त्रक रोगी की चिकित्सा करे। इसमें सब से प्रथम स्नेह का अभ्यंग करके शरीर में स्वेदन देकर शिर की शुद्धि के लिये तीक्ष्ण अवपीडन नश्य देवें। इसके पीछे विदारी-गन्धादि क्वाथ मांसरस, दूध और दही से सिद्ध घी को अकेला ही पिलाये। क्योंकि इस प्रकार करने से वायु बहुत अधिक नहीं फैलती। फिर भद्राध्यादि वातध्वनगण की औषधियों के साथ जौ, बेर, कुलस्थी, आनूपमांस, पाँचों वर्ग का औदक मांस (कूलचर, प्लव, कोशस्थ, पादी मछली) इन सबका एक साथ क्वाथ करे। यह क्वाथ, क्वाथ द्रव्य (बरगद आदि) अम्ल (कांजी, सुरा आदि) दूध इनको मिलाकर, इसमें काकोल्यादि गण का प्रक्षेप डालकर, घी, तैल, वसा, मज्जा, इनको सिद्ध करे। यह त्रैवृत्त घृत (तैल, वसा मज्जा से घी के युक्त होने के कारण) अपतानक रोगियों के पान, परिपेक, अवगाहन, अभ्यंग, भोजन, अनुवासन और नश्य में बरतना चाहिये। कहीं हुई स्वेदन विधियों से स्वेद देवे। वायु के बलवान होने पर सुहाते हुए गरम तुष, भूसा, छानों से भरे गड़े में मुख तक गाड़ देवे। अंगारों से गरम भट्टी पर या गरम शिलापर सुरा का छिड़काव करके, ढाक के पत्ते बिछाकर सुलाये। तिल-तण्डुल उड़द की खिचड़ी या खीर अथवा कीमिया किये मांस से स्वेद देवे। मूली, एरण्ड, स्फूर्ज, अर्जक, आक सतला, शंखिनी, इनके स्वरस से सिद्ध तैल अपतानक रोगी के परिपेक आदि में बरते। विना भोजन किये खट्टी दही में मरिच, वज्र मिलाकर पीने से अपतानक रोग नष्ट होता है। तैल, घी, वसा और मधु पीये। यह चिकित्सा शुद्ध (अकेली) वायु जन्य अपतानक की है, दोनों के मिला होने पर मिलाकर चिकित्सा करे। आक्रमणो के मध्य में अवपीडन नश्य देवे। मुर्गा, कैकड़ा, काली मछली, शिशुमार (नाका) और सुअर की वसा का सेवन करे। वातहर द्रव्यों से सिद्ध दूध पीये। जौ, बेर, कुलस्थी, मूली, दही, घी, तैल से सिद्ध यवागू पीये। दस दिन तक आक्रमण न होने पर स्नेह विरेचन, आस्थापन, अनुवासन से इसकी चिकित्सा करे। वात व्याधि की चिकित्सा करे और रक्षा कर्म करे ॥१८॥

पक्षाघातोपद्रुतसम्भानागार्हं सहजमात्मवन्तमुपकरण-वन्तं चोपक्रमेत। तत्र प्रागोव स्नेहस्वेदोपपन्नं मृदुना शोघनेन संशोभ्यानुवास्यास्थाप्य च यथाकालमाक्षेपकवि-धानेनोपचरेत्, वैशेषिकश्चात्र मस्तिष्क्यः शिरोवस्तिः,

अणौतैलमभ्यङ्गार्थं, सालवणमुपनाहार्यं, बलातैलमनुवास-नार्थं, एवमत्तन्द्रितस्त्रीश्रुतुरो वा मासान् क्रियापथमुपसे-वेत् ॥१९॥

पक्षाघातवाले जिस रोगी का शरीर या अंग सूखा न हो, वेदना होती हो, जितेन्द्रिय एवं जो साधन सम्पन्न हो, उसकी चिकित्सा करे। इसमें प्रथम ही स्नेह स्वेदन, देकर मृदु संशो-धन करके अनुवासन, आस्थापन देकर, समय के अनुसार आक्षेपक चिकित्सा से उपचार करे। इसमें इतना भेद है कि इसमें मस्तिष्क के लिये हितकारी शिरोवस्ति, एवं स्नेह (पित्त) बरती जाती है, अभ्यंग के लिये अणुतैल, उपनाह के लिये बला तैल बरते। इस प्रकार विना आलस्य के यह चिकित्सा तीन या चार मास करे। इसी से कहा है—

हनुस्तम्मादिताक्षेप-पक्षाघातापतानकाः ।

कालेन महताऽऽख्यानां यत्नात् सिध्यन्ति वा न वा ॥१९॥

मन्यास्तम्भेऽप्येतदेव विधानं विशेषतो वातश्लेष्म-हरेनैस्ये रूक्षस्वेदोश्चोपचरेत् ॥२०॥

मन्यास्तम्भ में भी यही चिकित्सा है, विशेष कर वात कफ नाशक नश्य देवे, और रूक्ष स्वेद करे ॥२०॥

अपतन्त्रकातुर नापतर्पयेत्, वमनानुवासनास्थापनानि न निपेचेत्, वातश्लेष्मोपहरुद्धोच्छ्वासं तीक्ष्णैः प्रथमापनेमोक्ष-येत्, तुम्बुरुपुष्कराद्वाहृिग्वम्बलेतसपध्यालवणत्रयं यवका-थेन पातुं प्रयच्छेत्, पध्याशतार्थं सौवर्चलद्विप्ले चतुर्गुणे पयसि सर्पिःप्रस्थं सिद्धं, वातश्लेष्मापनुच कर्म कुर्यात् ॥२१॥

अपतन्त्रक रोगी को लंघन न कराये। इसे वमन आस्था-पन और अनुवासन भी न देवे। वायु-कफ के कारण श्वास काटिन्ध्य होने पर तीक्ष्ण प्रथमन नश्य देवे। तुम्बुरु, पुष्कर-मूल, हींग, अम्लवेतस, हरड, सैन्धव, सौवर्चल और विड इनके चूर्ण को जो के क्वाथ के साथ पीने को देवे। पचास हरड, सौवर्चल दो पल, इनसे चार गुणे दूध में सिद्ध किया घी पीने को देवे। वात कफ नाशक चिकित्सा करे ॥२१॥

अर्दितातुरं बलवन्तमात्मवन्तमुपकरणवन्तं च वात-व्याधिविधानेनोपचरेत्, वैशेषिकैश्च मस्तिष्क्यशिरोव-स्तिनस्यधुमोपनाहस्तेहनाडीस्वेदादिभिः ततः सतुणं महापश्चमूलं काकोल्यादि विदारिगन्धादिमौदकानूपमांसं तथैवोदककन्दश्चाहृत्य द्विगुणोदकं क्षीरद्रोणे निःक्वाथ्य क्षीरावशिष्टमवतार्य परिस्राण्य तैलप्रस्थेनोन्मिश्रय पुनरग्ना-वधिभ्रयेत्, ततस्तैलं क्षीरानुगतमवतार्य शीतीभूतमभिम-थनीयात् तत्र यः स्नेह उत्तिष्ठेतमादाय मधुरोषधसहक्षीर-युक्तं विपचेत्, एतत् क्षीरतैलमर्दितातुराणां पानाभ्यङ्गादि-पूपयोज्यं, तैलहीनं वा क्षीरसर्पिरक्षितर्पणमिति ॥२२॥

बलवान्, जितेन्द्रिय, साधन सम्पन्न अर्दिता शोमी की वातव्याधि चिकित्सा के अनुसार चिकित्सा करे। विशेष-