भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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अ० ५ ]

चिकित्सास्थानम्

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वतः—मस्तित्थक के लिये हितकारी शिरोवस्ति, नस्य, धूम्र, उपनाह, स्नेहन, नाड़ी स्वेद आदि से चिकित्सा करे । पंच-तृणमूल, विल्वादि मद्भा पंचमूल, काकोल्यादि गण, विदारी-गन्धादि गण, औदकमांस, आनूपमांस, उदककन्द (सिंधाड़ा, कमलकन्द आदि) इनको लाकर सबका एक आदक, जल दो द्रोण, दूध एक द्रोण लेकर क्वाथ करे । जब दूध एक द्रोण रह जाये, तब इसे उतारकर छान ले । फिर इसमें एक प्रस्थ तैल मिलाकर पुनः अग्नि पर पकाये । जब तैल दूध में मिल जाये तब इसको उतारकर ठण्डा होने दे, ठण्डा होने पर इसको मधे । इससे जो तेल निकले उसको लेकर, उसे काकोल्यादि गण, मुद्गपर्णी और दूध के साथ पकाये । यह क्षीर तैल अर्दित रोगियों के पान, अभ्यंग आदि में बरतना चाहिये । तैले के बिना मिलाये दूध का घी, आँखों के तर्पण के लिये श्रेष्ठ है । २२।

गुप्तसीविश्वार्थीकोष्टुकशिरःखल्लपङ्कलवातकण्टकपादवाहपादहर्षाववाहुकवाधियधमनीगतवातरोगेषु यथोक्तं यथोद्देशं च शिरःनयधं कुर्यात्, अन्यत्राववाहुकात्, वातव्याधिचिकित्सितं चावेक्षेत् । १२३॥

गुप्तसी, विश्वार्थी, कोष्टुकशीर्ष, खंज, पंगुल, वातकण्टक, पादवाह, पादहर्ष, अववाहुक, वाधिय, धमनी गत वात रोगों में कहे के अनुसार, उद्देश्य के विचार से सिराबेध करे । अववाहुक में सिराबेध न करे । वातव्याधि की चिकित्सा भी बरते ॥२३॥

कर्णशूलं तु शृङ्गवेरसं तैलमधुसंसृष्टं सैन्धवोपहितं मुखोष्णं कर्णं दधात् अजामूत्रमधुतैलानि वा, मातुलुङ्ग-दाडिमतिन्तिडीकस्वरसमूत्रसिद्धं तैलं, शुक्तसुरातक्रमूत्र-लवणसिद्धं वा, नाडीस्वेदैश्च स्वेद्येत, वातव्याधिचिकित्सां चावेक्षेत्; भूयश्चोत्तरे वद्यामः । १२४॥

कर्णशूल में अदरक का रस, तैल, मधु, सैन्धव मिलाकर थोड़ा गरम करके डाले । बकरी का मूत्र, मधु या तैल डाले । बिजौरा, दाडिमी, तिनतिडीक ( इमली ), इनके स्वरस और गोमूत्र में सिद्ध तैल कान में डाले । शुक्त, सुरा, तक्र, मूत्र और नमक में सिद्ध तैल डाले । नाड़ी स्वेद करे । वातव्याधि की चिकित्सा करे । अधिक उत्तर स्थान में कहेंगे ॥२४॥

तूनीप्रतूनयोः स्नेहलवणमुष्णोदकेन पाययेत्, पिप्पल्यादिचूर्णं वा हिङ्गुयवक्षारप्रगाढं वा सर्पिः बस्तिभिरुचैनमुपक्रमेत् । १२५॥

तूनी, प्रतूनी में स्नेह लवण को गरम जल से पिलाये । पिप्पल्यादि चूर्ण को पिलाये । प्रजुर मात्रा में हींग और यवक्षार मिलाकर घी देवे । बस्तियों से चिकित्सा करे ॥२५॥

आधमानं त्वपतपणपाणिताप ( दीपनचूर्ण ) फलवर्ति-क्रियापाचनीयदीपनीयबस्तिभिरुपाचरेत्, लंघनानन्तरं

चात्रकाले धान्यकजीरकादिदीपनसिद्धान्यत्रानि । प्रत्याधमाने क्षुर्दनापतपणदीपनानि कुर्यात् ॥२६॥

आधमान में अपतपण, हाथों को गरम करके उदर पर सेके । ( दीपन चूर्ण ), फलवर्ति प्रयोग, दीपनीय पाचनीय औषधियों से तथा बस्तियों से चिकित्सा करे । लंघन के पीछे, भोजन के समय में धनिया जीरा आदि दीपनीय औषधियों से सिद्ध अन्न देवे । प्रत्याधमान में वमन अपतपण, दीपन आदि उपचार करे ॥२६॥

अष्टौलाप्रत्यष्टौल्योगुर्लुमाभ्यन्तरविद्रधिषत् क्रियाविभाग इति ॥२७॥

अष्टौला और प्रत्यष्टौला में गुल्म और अभ्यन्तर विद्रधि की भाँति चिकित्सा करे ॥२७॥

हिङ्गुत्रिकटुवचाजमोदाधान्याजगन्धादाडिमतिन्तिडीकपाठाचित्रकयवक्षारसैन्धवविडसौवर्चलस्वजिकापिप्पलीमूलास्लवैतसशदीपुष्करमूलहपुषाचन्याजाजीपथ्यारचूर्णंयित्वा मातुलुङ्गाम्लेन बहुशः परिभाषायाश्चमात्रा गुटिकाः कारयेत् । ततः प्रातरेकैकां वातविकारी भक्षयेत्-एष योगः कासश्वासगुल्मोद्वारोचकहृदोग्राधमनपाशर्वीद्वरवस्तिशूलानाहमूत्रकृच्छ्रप्लीहागर्स्तूनीप्रतूनीरपहन्ति ।।

हिंवादि चूर्ण—हींग, सोंठ, मरिच, पीपल, वच, अजवायन, धनियाँ, अजगन्धा, दाडिमी, इमली, पाठा, चित्रक, यवक्षार, सैन्धव, विड, सौवर्चल, सजक्षार, पिप्पलामूल, अस्लवैतस, कचूर, पुष्कर मूल, हाउवेर, चन्ध, जीरा, हरड, इनको चूर्ण करके बिजौरा के रस से बहुत बार ( सातबार या इक्कीसबार ) भावित करके कर्ण परिमाण की गोळियाँ बना लेवे । इनमें से एक एक गोली प्रातः वातविकार रोगी खाये । यह योग कास, श्वास, गुल्म, उदर, अरोचक, हृद्वेग, आधमान, पाशर्वशूल, उदरशूल, वस्तिशूल, आनाह, मूत्रकृच्छ्र, प्लीहा, अर्श, तूनी, प्रतूनी को नष्ट करता है ।

वक्तव्य—इसमें क्षार, हींग, अस्लवैतस दुगुने मिलाने चाहिये, यथा—यच्चूर्णं गुटिकायाश्च कर्तव्या वातगुल्मनाम् । हिंगुणक्षारहिंगम्लवैतसास्ता हितः स्मृताः ॥ चरक में—

हिंगुत्रिकटुकापाठा हपुषामभयां शदीम् ।

अजमोदाजगन्धे च तिनतिडीकाम्लवैतसौ ॥

दाडिमं पुष्करं धान्यं अजाजी चित्रकं वचाम् ।

द्वौ क्षारौ लवणे द्वे च चन्धं चैकत्र चूर्णयेत् ॥

चूर्णमेतत्प्रयोक्तव्यं अनुपानेभ्वनस्ययम् ।

प्राग्भक्तमथवा पेयं मधेनीणोदकेन वा ॥

भाविता मातुलुंगस्य चूर्णमेतद् रसेन वा ।

बहुशो गुटिकाः कार्याः कामुर्काः स्युस्ततोऽधिकम् ॥

भर्वात् चात्र—

केवले दोषयुक्तो वा धातुभिर्वाऽऽवृतोऽनिलः ।