भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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अ० ६ ]

चिकित्सास्थानम्

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को त्रिफला, दारु हल्दी, पटोल, कुशा इनके क्वाथ में या गोमूत्र में अथवा खारोदक में अथवा गरमजल में घोलकर प्रायः पीये। इसके पच् जाने पर-यूप से, मांस रस से या दूध के साथ भोजन करे। इस प्रकार एक मांस सेवन करने पर गुल्म, प्रमेह, उदवर्त्त, उदर, भगन्दर, कुम्भ, कण्डु, अरुचि, श्वित्र, अर्बुद, ग्रन्थि, नाड़ी, आल्सवात, रवयश्च, कुष्ठ, दुष्टव्रण, कोष्ठगत-सन्धि-गत और अस्थिगत वायु नष्ट होती है, जिस प्रकार कि विजली से वृक्ष नष्ट होते हैं ॥४०-४५॥

इति शुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने महावातव्याधि- चिकित्सितं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥५॥

पञ्चोऽध्यायः

अथातोऽर्शसां चिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥१॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

अब इसके आगे अशों की चिकित्सा का व्याख्यान करेंगे- जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥१,२॥

चतुर्विधोऽर्शसां साधनोपायः। तद्यथा—भेषजं क्षारो- र्गिनः शस्त्रमिति। तत्र, अचिरकालजातान्यल्पदोषलिङ्गो- पद्वाणि भेषजसाध्यानि, मृदुप्रसूतावागदानीयुच्छिन्तानि क्षारेण, कर्कराशस्थिरपृथुकठिनान्यगिन्ना, तनुमूलान्युच्छि- न्तानि क्लेदवन्ति च शस्त्रेण। तत्र भेषजसाध्यानामर्शसा- महरयानां तु भेषजं भवति, क्षारानिगच्छसाध्यानां तु विधानमुच्यमानमुपधारय ॥३॥

अशों की चिकित्सा चार प्रकार की है। यथा—भेषज, क्षार, अग्नि और शस्त्र। इनमें नूतन उत्पन्न हुए, थोड़े लक्षण एवं थोड़े उपद्रववाले अर्श औषध साध्य हैं। कोमल, फैले हुए गहरे गये या ऊपर को उभरे अर्श क्षार साध्य हैं। कर्कराश, स्थिर चपटे और कठिन अर्श अग्निसाध्य हैं। पतले मूलवाले, ऊपर को नहीं उठे और क्लेदवाले अर्श शस्त्रसाध्य हैं। इसमें भेषज से चिकित्सा करने योग्य तथा न दीखनेवाले अशों में औषध से उपचार किया जाता है। क्षार, अग्नि और शस्त्र की विधि को मुझसे सुनो।

“तत्राहुरेके शस्त्रेण कर्त्तनं हितमर्शसाम्। दाहं क्षारेण चाप्येके दाहमेके तथागिन्ना ॥ अस्येतद् भूरि तन्त्रेण धीमता हृष्टकर्मणा। कियते त्रिविधं कर्म भ्रंशस्तस्य च दारुणः ॥ पुंस्त्वोपधातः श्वयधुगुदे वैगविनिग्रहः। मरणं वा भवेच्छीघ्रं शस्त्रक्षारानिगविभ्रमात्” ॥३॥ तत्र बलवन्तमातुरमर्शोभिर्बहुतुपुस्तुपस्तिग्धं परिस्वि- ममनिल्वेदनाभिद्युद्धिप्रशमाथं स्तिग्धमुष्णमल्पमन्नद्रवप्रायं सुक्लवन्तमुपवेशय संवृ (भृ) ते शुची देशे साधारणं न्यग्ने

कालं समे फलके शय्यायां वा प्रत्यादित्यगुदमन्यस्योत्सङ्गे निपणणपूर्वकायमुत्तानं किञ्चिदुन्नतकटिं वक्षकम्बलको- पविष्टं यन्त्रणाशाटकेन परिस्विमग्नीवासर्कियं परिकर्मभिः सुपरिगृहीतमस्पन्दनगरीरं कृत्वा ततोऽस्मै घृताभ्यक्तगु- दाय घृताभ्यक्तं यन्त्रमञ्चनमुखं पायी शनैः शनैः प्रवाह- माणस्य प्रणिधाय, प्रविष्टे चार्गो वीक्ष्य, शलाकयोः पीक्ष्य, पित्तुवक्ष्यो रन्यतरेण प्रसृज्य, क्षारं पातयेत्। पातयित्वा च पाणिता यन्त्रद्वारं पिधाय वाक्च्छतमात्रमुपेक्षेत, ततः प्रसृज्य क्षारवत् न्याधिबलं चावेक्ष्य पुनरालेपयेत्, अथाशः पक्वजास्त्ववप्रतीकाजमवसन्नमोषन्तमभिसमीक्ष्योपावर्त- येत्, क्षारं प्रक्षालयेद्धान्याम्लेन दधिमस्तुशुक्तफलाम्लैर्वा, ततो यष्टीमधुकमिश्रेण सर्पिषा निर्वाप्य यन्त्रमपनीयोत्था- प्यातुरमुष्णोदकोपविष्टं शीताभिरग्निः परिपिञ्चेत्, अशीता- भिरित्येके, ततो निर्वातमागारं प्रवेश्याचारिकमादिशेत्, सावशेषं पुनर्दहैत्, एवं सप्तरात्रादेकैकमुपक्रमेत, तत्र बहुषु पूर्व दक्षिणं साधयेत्, दक्षिणाद्वाभं वामात् पृष्ठजं, ततोऽग्रजमिति ॥४॥

अर्थ रोग से पीड़ित बलवान् रोगी को स्नेहन और स्वेदन देकर, बड़ी हुई वायु की वेदना को शांत करने के लिये, स्तिग्ध उष्णद्रव बहुत अन्न को थोड़ी सी मात्रा में देकर, एकांत तथा पवित्र स्थान में, न बहुत गरम, न बहुत ठण्डे बादल रहित दिन में, समतल फलक या शय्या पर बिठाये। रोगी की गुदा को सूर्य के सामने रखे। रोगी का नाभि से ऊपर का भाग दूसरे मनुष्य की गोदी में चित (उत्तान-मुख को ऊपर रखकर) रखवाये। कटि के नीचे वस्त्र या कम्बल की एंडकी (गद्दी) रखकर कटि प्रदेश को कुछ ऊंचा उठाये। फिर यंत्र शाटिका को ग्रीवा और टांगों में बंधवाकर, सहायकों से भली प्रकार पकड़वाये, जिससे कि रोगी हिल न सके। फिर गुदा में घृत का अभ्यङ्ग करके, घी से स्तिग्ध यंत्र को, सीधा गुदा-मुख के साथ साथ गुदा में धीरे-धीरे, रोगी के प्रवाहण करते रहने पर प्रविष्ट करे। यंत्र के गुदा में पहुँच जाने पर अर्श को देखकर, शलाका से दबाकर, रूई के फोये या वस्त्र से साफ करके क्षार लगाए। क्षार लगाकर, हाथ से यन्त्र द्वार को बन्द करके एक सौ गिनने के समय तक प्रतीक्षा करे। फिर क्षार को साफ करके क्षार बल और रोग की शक्ति को देखकर फिर क्षार लगाये। यदि अर्श पके हुए जामुन के समान रंग के, दबे, थोड़े मुड़े हों तो क्षार लगाना बन्द कर दे। क्षार को कांजी, दही, मखु, शुक्त या विजोरे आदि खड़े फलों के रस से घोये। फिर मुलेहटी मिले घी को लगाकर जलन शान्त करे। यंत्र निकालकर, रोगी को उठाकर गरम पानी में बिठाये और शीतल जल से स्नान कराये। कई आचार्य कहते हैं कि गरम पानी से स्नान कराये, तत्पश्चात् वायुरहित