भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० ६ ]

अन्दर डालकर, इस ऐषणी को ऊँचा उठाकर, आशय समेत शस्त्र से काट देवे। इसी प्रकार अन्तर्मुख में यंत्र को भली प्रकार गुद में प्रविष्ट करके प्रवाहण करते हुए रोगी के, भगन्दर मुख को देखकर ऐषणी डालकर शस्त्र चलाये। अथवा भगन्दर को देखकर अनि या क्षार कर्म करे, यह चिकित्सा सब भगन्दरों में सामान्य है।

वि० मन्तव्य—प्रारम्भ में भगन्दर की पिङ्गिका जब तक पक कर फूटती नहीं तब तक अपतर्पण से विरेचन पर्यन्त उपक्रमों (देखिये वि० अ० १ का सू० ८) से बैठ जाती है। परन्तु जब पककर फूट जाती है। तब इस विधि से चिकित्सा करे। विधि मेंद से भगन्दर दो प्रकार के होते हैं—१-पराचीन अर्थात् अन्तर्मुख इनका मुख भीतर—गुद के भीतर होता है। २-अर्वाचीन अर्थात् बहिर्मुख इनका मुख गुदाष्ठ से बाहर होता है। शासय—भगन्दर का व्रण जितने स्थान में हो उतने स्थान को काटकर निकाल देना चाहिये ॥४॥

विशेषतस्तु—

नाड्यन्तरे व्रणान् कुर्याद्विषक् तु शतपोनके।

ततस्तेषूपरुष्टेषु शेषा नाडीरूपाचरेत् ॥५॥

विशेष चिकित्सा—शतपोनक भगन्दर में—वैद्य नाडीव्रणों के बीच में व्रणों को करे। इन व्रणों के भर जाने पर शेष नाडीव्रणों की चिकित्सा करे।

वि० मन्तव्य—शतपोनक में अनेक नाडीव्रण—नासूर होते हैं, अतः एक-एक नाडी व्रण में शस्त्र किया करके रोपण कर्म करे अर्थात् एक का रोपण हो जाने पर दूसरे नाडी व्रण में शस्त्र कर्म करे इसी प्रकार तीसरे चौथे आदि में। सब व्रणों को एक साथ काटना उचित नहीं है। इसे समझने के लिए निम्न श्लोक ६-८ देखिये ॥५॥

गतयोऽन्योन्यसंबद्धा बाह्याश्छेद्यास्त्वनेकधा।

नाडीरनभिंसंबद्धा यशिक्षन्त्येकधतर भिषक् ॥६॥

स कुर्याद्विबुतं जन्तोव्रणं गुदविदारणम्।

तस्य तद्विबुतं मार्गं विष्मन्त्रमनुगच्छति ॥७॥

आटोपं गुदशूलं च करोति पवनो भृशम्।

तत्राधिगततन्त्रोऽपि भिषक्मुद्येदसंशयम् ॥८॥

तस्मान्न विवृतः कार्या व्रणस्तु शतपोनके।

एक दूसरे से मिली हुई नाडियों को अनेक रूप में बाहर काटे। जो नाडियाँ परस्पर एक दूसरे से नहीं मिलीं उनको एक ही साथ काट देता है, वह वैद्य मनुष्य के व्रण को चौड़ा बना देता है, और गुदा को विदीर्ण कर देता है। इस चौड़े हुए मार्ग से मल-मूत्र आता है। आटोप, गुदा शूल को वायु उत्पन्न करती है। इसमें भली प्रकार शास्त्र अभ्यास किया वैद्य भी निःसन्देह चूक जाता है, इसलिये शतपोनक में व्रण को कभी चौड़ा न करे ॥६-८॥

०याधौ तत्र बहुच्छिद्रे भिषजावै विज्ञानता ॥९॥

अर्धलाङ्गलकश्छेदः कार्या लाङ्गलकोऽपि वा।

सर्वतोभद्रको वाऽपि कार्या गोतीर्थकोऽपि वा ॥१०॥

(द्वाम्भ्यां समाभ्यां पार्श्वभ्यां छेदो लाङ्गलको मतः।

हृस्वमेकतरं यच्च सोऽर्धलाङ्गलकः स्मृतः ॥

सेवनी वर्जयित्वा च चतुर्धा दारिते गुदे।

सर्वतोभद्रकं छेदमाहुश्छेदविदो जनाः।

पार्श्वगतेन अस्त्रेण छेदो गोतीर्थको वदेत् ॥)

सर्वतः स्नावमार्गास्तु दृढेष्टैश्चतथाऽग्निना।

सुकुमारस्य भोरौहि दुष्करः शतपोनकः ॥११॥

इसलिये, इस बहुत छिद्रवाले भगन्दर में जाननेवाला वैद्य अर्धलांगलक छेदन या लांगलक छेदन, या सर्वतोभद्रक अथवा गोतीर्थक करे। वैद्य सब मार्गों को पूर्णतः अनि से जलाये। नाजुक प्रकृति एवं डरप्रोक्त में शतपोनक कष्ट साध्य है।

वक्तव्य—“द्वाम्भ्यां समाभ्यां पार्श्वभ्यां छेदो लांगलको मतः। हृस्वमेकतरं यच्च सोऽर्धलांगलकः स्मृतः ॥ सेवनी वर्जयित्वा तु चतुर्धा दारिते गुदे। सर्वातोभद्रकं छेदमाहुश्छेदविदो जनाः ॥ पार्श्वगतेन अस्त्रेण छेदो गोतीर्थको वदेत् ॥”

लॉंगल—हल, अर्धलांगलक—आधा हल, सर्वातो भद्र-आसनविशेष (गोलाई लिये), गोतीर्थ—गाय का मन्न जैसे टेढ़ा-मेढ़ा पड़ता है, अथवा गाय की योनि के समान।

वि० मन्तव्य—केवल अर्धलाङ्गलक आदि आकार प्रकार के व्रण करना चाहिये। अथवा अग्निकर्म द्वारा ही स्नाव-मार्गों-नासूरों का अवरोध कर देना चाहिये ॥९-११॥

रुजास्वावापहं तत्र स्वेदमाशु प्रयोजयेत्।

स्वेदद्रव्यैर्यथोद्दिष्टैः क्रशरापायसादिभिः ॥१२॥

ग्राम्यान्प्रीदकैर्मांसैर्लोघाद्योर्वोऽपि विधिकरैः।

वृक्षादनीमथैरण्डं बिल्वादिं च गर्णं तथा ॥१३॥

कृषायं सुकृतं कृत्वा स्नेहकृम्भे निषेचयेत्।

नाडीस्वेदेन तेनास्य तं व्रणं स्वेदयेद्विषक् ॥१४॥

तिलैरण्डातसीमाषयवगोधूमसर्षपान्।

लवणान्यम्लवर्णं च स्थात्यामेवोपसाधयेत् ॥१५॥

आतुरं स्वेदयेत्तेन तथा सिध्यति कुर्वतः।

स्विन्नं च पाययेदेनं कुष्ठं च लवणानि च ॥१६॥

वचाहिङ्गवजमोदं च समभागानि सर्पिषा।

मादूर्वीकेनाथवाऽम्लेन सुरासौबरीकेण वा ॥१७॥

ततो मधुकतैलेन तस्य सिञ्चेद् भिषगव्रणम्।

परिषिञ्चेद् गुदं चास्य तैलेर्वातंरुजापहैः ॥१८॥

विधिनाऽनेन विष्मन्त्रं स्वमार्गमधिगच्छति।

अन्ये चोपद्रवास्तोत्राः सिध्यन्त्यत्र न संशयः ॥१९॥

रुजा-वेदना और स्नाव को कम करनेवाला स्वेद