सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 479, कुल 872 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ ८]
चिकित्सास्थानम्
४२३
श्रीम देवे । इसके लिये कहे हुए स्वेद द्रव्यों से, कुशरा (तिल-तण्डुल, उड़द की खिचड़ी) खीर आदि से स्वेद देवे । ग्राम्य मांस, आसू मांस, औदक मांस, बटेर आदि बिक्रिओं के मांस, कन्दक, एरण्ड और विल्लादि गण इनका भली प्रकार क्वाय बनाकर तैल के घड़े में भर देवे । इस क्वाय से नाड़ी स्वेद द्वारा वैद्य ब्रण में स्वेद दे । तिल, एरण्ड, अलसी, उड़द, जौ, गेहूँ, सरसों, पौँचों लवण, अम्लवर्ग इनको थाली (चौड़े पात्र) में क्वाय करे । इससे रोगी को स्वेद देवे । इस प्रकार करने से भगन्दर अच्छा होता है । स्वेदन के उपरान्त रोगी को कूठ, पाँचों नमक, वच, हींग, अजवायन इनको समान मात्रा में लेकर घी से, द्राक्षा से, दाडिम या बिजौर के रस से, घुरा से या कांजी से पिलाये । इसके ब्रण पर मुलेहठी के तेल से परिषेक करे । बात वेदना को नष्ट करनेवाले तेलों से गुदा पर भी परिषेक करे । इस प्रकार करने से मल मूत्र अपने अपने मार्ग में आने लगते हैं । और दूसरे भी जो उपद्रव होते हैं, वे (निःशन्देह) शान्त हो जाते हैं । शतपोनक भगन्दर को कह दिया ।
वि० मन्तव्य—छेदन कर्म अथवा अग्निकर्म से उत्पन्न वेदना आदि की शान्ति के लिये तत्काल इस विधि से स्वेदन की व्यवस्था कर देनी चाहिये ॥२२-२६॥
शतपोनक आख्यात उपग्रोचे क्रियां शृणु ।
अथोपग्रीवमेपित्त्वा छित्त्वा क्षारं निपातयेत् ॥२०॥
पूतमांसव्योपहार्यमग्निरन्त्र न पूजितः ।
अथैन घृतसंस्पृष्टेस्तिलैः पिष्टैः प्रलेपयेत् ॥२१॥
बन्धं ततोऽनुकुर्वीत परिषेकं तु सर्पिषा ।
रुतीये द्विवसे मुक्त्या यथास्वं शोधयेद् भिषक् ॥२२॥
ततः शुद्धं विदित्त्वा च रोपयेत् यथाक्रमम् ।
उपग्रीव की चिकित्सा को सुनो । उपग्रीव को दूँडकर, काटकर, इसमें क्षार लगाये । सड़े हुए मांस को निकालने के लिये क्षार कर्म करे । इसमें अग्नि का दाह उत्तम नहीं । फिर पित्ते हुए तिलों को घी में मिलाकर लेप करे । फिर पट्टी बाँध देवे, घी से परिषेक करे । तीसरे दिन खोलकर वैद्य दोषानुसार करे । शोधन हुआ जानकर विधि के अनुसार रोपण करे ।
वक्तव्य—उपग्रीव भगन्दर—टेढ़ा-मेढ़ा होता है, इसमें क्षार तो द्रव होने से सब स्थानों पर पहुँच जायेगा, परन्तु अग्नि सब स्थान पर नहीं पहुँचाई जा सकती ।
वि० मन्तव्य—उपग्रीव भगन्दर पित्तज होता है, अतः अग्निकर्म को पूजित नहीं माना है ॥२०-२२॥
उक्त्यास्त्रावमार्गस्तु परिखाविणि बुद्धिमान् ॥२३॥
क्षारेण वा स्त्रावर्गति दहेदुत्तवहेन वा ।
सुखोष्णेनाणुतैलेन सेचयेद् गुदमण्डलम् ॥२४॥
उपनाहाः प्रदेहाश्च मूत्रक्षारसमन्वितः । वामनोद्योपधैः कार्याः परिषेकाश्च मात्रया ॥२५॥ मृदुभूतं विदित्वैनमल्पस्त्रावरुग्न्वितम् । गतिमन्विष्य शस्त्रेण छिन्त्यान् खजूरपत्रकम् ॥२६॥ चन्द्रार्धं चन्द्रवक्रं च सूचीमुखमवाङ्मुखम् । छिन्त्वाऽग्निना दहेत् सम्यगोर्वक्षारेण वा पुनः ॥२७॥ ततः संशोधनैरेव मृदुतूयैर्विशोध्यते ।
परिखावि भगन्दर में बुद्धिमान् सब स्त्राव मार्गों को शस्त्र से काटकर स्त्राव के रास्ते को क्षार से या अग्नि से जलाये । सुहाते गरम अणुतेल से गुदा के चारों ओर से सेक करे । गोमूत्र और क्षार युक्त प्रलेप और उपनाह बाँधे । मदन फल आदि वामक औषधियों से थोड़ा परिषेक करे । जब यह कोमल हो जाये, स्त्राव और पीड़ा कम हो जाये, तब गति रास्ते को दूँडकर शस्त्र से खजूर के पत्र के समान, अर्धचन्द्राकार, पूर्ण चन्द्रमा के समान, सूचीमुख, नोचे को मुख किये रूप में काटे । फिर क्षार से या अग्नि से भली प्रकार जलाये । फिर पहले मृदु शोधन देकर पीछे से तीक्ष्ण संशोधन (विरेचन) दे ।
वि० मन्तव्य—खजूरपत्रक-खजूर के पत्र का सा, चन्द्रार्ध-अर्धचन्द्राकार, चन्द्रवक्र-द्वितीया के समान टेढ़ा, सूचीमुख-सूई के समान सूक्ष्म मुखवाला, ब्रण करे । अवाङ्मुख-अर्वाचीन मुखवाले भगन्दर में क्षारकर्म अथवा अग्निकर्म करे ॥२३-२७॥
बहिरन्तमुखश्चापि जिगोयस्य भगन्दरः ॥२८॥
तस्याहितं विरेकाग्निशस्त्रक्षारावचारणम् ।
यद्यन्मृदु च तीक्ष्णं च तत्तत्तस्यावचारयेत् ॥२९॥
जिस बच्चे में भगन्दर बहिर्मुख या अन्तर्मुख हो, उसमें विरेचन, अग्निकर्म, शस्त्रकर्म, अहितकारी है । इसमें न तो तीक्ष्ण और न बहुत मृदु उपचार करे ॥२९॥
आरग्वधतिशकाळाच्छूर्णं मधुघृताप्लुतम् ।
अप्रवर्तिप्रणिहितं ब्रणानां शोधनं हितम् ॥३०॥
योगोऽयं नाशयत्यागु गतिं मेघमिवानिलः ।
अमलतास, हल्दी, काला (कदुम्बी या क्षिटी) इनके चूर्ण को प्रचुर घी और मधु में मिलाकर, सूत की बनी कर्ती पर लगाकर ब्रण में रखे, यह ब्रणों का शोधन करती है । जिस प्रकार वायु बादलों की गति को नष्ट कर देती है, उसी प्रकार यह वर्त्ति ब्रणों को नष्ट करती है ॥३०॥
आगन्तुजे भिषङ्गनाडीं शस्त्रेणोक्तव्य यन्ततः ॥३१॥
जम्बुवृष्टेनाग्निवर्णनं तमया वा शलाकया ।
दहेद्यथोक्तं मतिमास्तं ब्रणं सुसमाहितः ॥३२॥
कृमिष्वं च विधिं कुर्वाच्छ्ल्यत्यानयनमेव च ।
आगन्तुज भगन्दर में वैद्य शस्त्र से नाड़ी को यत्नपूर्वक काटकर, अग्नि में लाल किये जम्बोष्ठ शस्त्र से या गरम की