भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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हुई शलाका से बुद्धिमान्‌ वेय सावधानी के खाथ जलाय ।

घुश्रतसंहिता अश.

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वि० मन्तव्य-उत्सादन-उपक्रम करे ( देखिये चि त ध

9 शल्य होने पर ृमिनाशक एवं शल्य निकालने का उपचार | अ० १ का सू० ८) उत्सादनं निम्नव्रणवास्तुनः (गहरे ्रणस्थान

करे ॥३१,३२॥ ९

प्रत्यास्यायेष चारभ्यो वज्यंश्चापि चरिरोषजः ।।३३॥

यह आगन्वुज भगन्दर आसाध्य कहकर चिकित्सा आरम्भ

करे, चरिदोषजन्य असाध्य हे ॥३३॥

एतत्‌ कमं समाख्यातं सवंषामनुपूवंशः।

एषां तु अस्त्रपतना्टेदना यच्र जायते ॥३४॥ तत्राणुतेकेनोष्णेन परिषेकः प्रशस्यते । वातत्नौषधसंपू्णा स्थाींछिद्रशराविकाम्‌ ॥२५॥ स्नेहाभ्यक्तगुदस्तप्रामध्यासीत सवाष्पिकाम्‌ ।

नाञ्या वाऽस्याहरेत्‌ स्वेदं अयानस्य रुजापहम्‌ | उष्णोद केऽवगाह्यो वा तथा म्यति वेदनां ॥२६॥

सवके ल्यि क्रमशः यह चिकित्षा कहदीदहै। इनमें

शखर कमं के कारण जरह वेदना उद्यन्न हो जाये, वहाँ, अणु

तेल को गरम करके उससे परिषेक करे । मद्रदारु, एरण्ड

आदि वातनाशक ओषधियों के क्वाथ से पात्र को भरे] इसके

ऊपर छिद्रोवाला ठक्कन रख दे । गुदा पर स्नेह ठगाकर गरम

होते इए पात्र पर बैठे, ओर वाष्प स्वेद लवे | अथवा लठेटकर

नाड़ी से स्वेद ठे। इससे वेदना नष्ट होती है । अथवा गरम

पानी मेँ अवगाहन करे, इससे वेदना शान्त होती है ।॥२६॥

कदलोखगखोपाकप्रियकाजिनसंभतान्‌।

कारयेदुपनाहां श्च साल्वणादीन्‌ विचक्षणः ॥३७॥

कद्‌ लीमृग, लोमी, प्रियक, इनके चर्मो से मिलाकर

उपनाह करे । साल्वण आदि उपनाह वपे ।॥३७॥ कटुत्रिकं वचादिङ्कखवणान्यथ दीप्यकम्‌ । पाययेन्चाम्कोरत्थञुरासोवीरकादिभिः ॥३८॥

त्रिकटु (खोठ, मस्चि, पिप्पली), वच, हींग, क्वण ओर

अजवायन इनको कांजी, कुर्त्थी की सुरा, सौवीरक (सतुष

धान्यो की काजी ) के साथ पिलये ॥३८।

उयोतिष्मतीटाङ्गख्कीठयामादन्तीत्चिघ्रत्तिखाः ।

कुष्ठं अताह्ा गोलोमी तिल्वको गिरिकर्णिका ॥३९6॥ कासीसकाव्रनक्षीयो वगेः शोधन इष्यते । माल्कगनी, कटिहारी, निशथोथ, कारी निशोय, तिढ, कूठ, सफ, गोखोमी (श्वत दवा), तिल्वक, श्वेत अपराजिता, कासीस, स्वणसीरी ये द्रव्य भगन्दर मे शोधन कायं मे उत्तम ईह ॥२३६॥ --~

त्रिवृत्तिखा नागदन्ती मंजिष्ठा पयसा सद ॥४०॥ उत्सादनं भवेदेतत्‌ सेन्धवधौद्रसंयुतम्‌ । निद्योय, तिर, नागदन्ती, मजीठ, बिदारी, इनमे सैन्धव ओर मधु मिव्यकर उत्ादन करे। = ~ ` ~ -

४ कनेर, वायविडंग, त्रिफला, थोर का दूध

का) पूरणं (भरनेवाला) लेपनयोगेन (लेपन रूपमेँ

से) इति डल्हनटीका ।[४०॥

रसाज्ञनं हरिद्रे ह मञ्जिष्ठानिम्बपल्ल्वाः ४१ वरिवृत्तेजोबतीदन्तीकल्को नाडीत्रणापह्‌ः । कुष्टं तरिवृत्तिखा दन्ती मागध्यः सेन्धवं मधु ॥४२॥

रजनी त्रिफला तुत्थं हित स्याद्‌ ब्रणञ्नोधनम्‌ | रसौत, हल्दी, दारहल्दी, मजीठ, नीम के पत्ते, निशोथ

तेज, जमालगोटा, इनका कल्क ॒नाद़व्रण नाशक दै।

कूठ, निशोथ, तिर, जमाल्गोरा, पिप्पलो, सेन्धव, मधु, हष्दौ,

त्रिफला, नीला तुस्थ ये व्रण के शोधन करने में हितकारी है । वि० मन्तव्य-यह दोनों योग-कल्क नामक उपक्रम है

प्रयोग करने

देखिये चि अ०१ का सू०८। इनका कल्क बनाकर ।

आवश्यकतानुखार भगन्दर के व्रणपर ख्गायायामभरा जाता

है, इससे रण का शोधन हो जाता हे ।४१,४२॥ |

मागध्यो मधुकं रोधं कु्ठमेखा हरेणवः ॥४३॥

समङ्गा घातकी चैव सारिवा रजनीदयम्‌ ।

प्रियंगवः सजेरसः पद्मकं पद्मकेसरम्‌ ॥४४॥

सुधा वचा छांगढक्ी मधूच्छिष्टं ससेरघवम्‌ ।

एतत्‌ संभ्रत्य संभारं तैं धोरो विपाचयेत्‌ ।॥४४॥

एतद्वै गण्डमाछासु मण्डलेष्वथ मेहिषु। |

सोपणा्थं' हितं तरं भगन्दर वि नाञ्चनम्‌ ॥४६॥

पिप्पी, सुलेहटी, लोध, कूठ, इखायची, हरेणु, मजी,

धातकी फएूल, सारिवा, हल्दी, दाखहल्दी, प्रियंगु रार प्रस!

कमलकेशर, स्नुदी-वच, कलिहारी, मोम सेन्धवः इन सबको

लाकर इनसे तैल सिद्ध करे । यह तैर गण्डमाला मे, मेहरोगि्ा

की पिडकाओं मे, मण्डलो भे, रोपण के लिय तथा मगनद्र ॐ

नाश के लये उत्तम है ॥४२-४६॥

न्यभ्ोधादिगणश्चैव दितः ओोधनरोपणे ।

तटं घतं वा तत्पक्वं भगन्दरविना्नम्‌ ॥४

शोधन ओर रोपण मे न्यग्रोधादि गण को बरते।

इसमें सिद्ध किया तैर या घृत भगन्दर के नाश के

उत्तम हे ||४७॥ ध व ।

त्िवबृन्तीदरिद्राकमूढं रोदा श्चमारकौ । .

विडंगसारं त्रिफला स्नह्यकेपयसी सधु ।॥४८॥ मधूच्चिष्ठसमायुक्तस्तेरमेतेविपाचयत्‌ ।

भगन्दरविनााथमेतदोच्यं विशेषतः ॥४५, गर

निशोथ जमार्गोटा, हल्दी, आक को जङ्‌?

गृन्दर

७॥

इनके साथ तैरु पकाये | इस तेक को स्यतः भ

के लिए बरतना चाहिये ॥४८,४६॥

= । विन्नकाकों तरिब्ृत्पाठे मपु हयमारकः (=