भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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अ० १० ] ५५

चिकित्सास्थानम्

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प्रकार अपने सुरा की परिभाषा भी भिन्न प्रकार से लिखी है, यथा—परिपक्वाऽन्नसन्धानसमुत्पन्ना सुरां जगुः। श्री सुश्रुत ने इन परिभाषाओं का अनुकरण नहीं किया है ॥७॥

अथ सुरां वक्ष्यामः—शिंशापाखदिरयोः सारमादा-योस्ताव्य चोत्तमारणीब्राह्मीकोशवतीस्तत्सर्वमेकतः कषाय-कल्पेन विपाच्योदकमाददीत मण्डोदकार्यं, किण्वपिष्ट-मभिषुण्यार्च्छ यथोक्तम्। एवं सुराः शालसारोदौ न्यग्रो-धादावारवधादौ च विदध्यात् ॥८॥

इसके आगे सुरा कहते हैं—श्रीशम और खैर का सार भाग (मध्यभाग) लाकर, इसको फाड़कर उत्तमारणी, ब्राह्मी, देवदाली इन सबको एक साथ कषाय विधि से पकाकर कषाय को मण्ड कार्य के लिये (बोलने के लिये) लेकर इसमें किण्व पिष्ट (सुरा बीज) कही हुई विधि से (मूत्र स्थान में विरेचना-धिकार में कही) मिलाये। इसी प्रकार शालसारोदि, न्यग्रोधादि, आरवधादि गण से सुरा बनाये।

वक्तव्य—उत्तमारणी के स्थान में कोष में उत्तर-बाह्मी-पदकर करम्मा या इन्द्रवाह्नी (इन्द्रायण) अर्थ दिया है। अथवा उत्तमा-त्रिफला अरणी, अग्निमन्थये दो द्रव्य हो सकते हैं ॥८॥

अतोऽवल्लेहान् वक्ष्यामः—खदिरासननिम्बराजदुश्श-शालसारकाथे तत्सारपिण्डाऽल्लक्षणपिष्टान् प्रक्षिप्य विपचेत्, ततो नातिद्रवं नातिसान्द्रमवतार्य तस्य पाणि-तलं पूर्णमप्रातरागो मधुमिश्रं लिह्यात्। एवं शालसारोदौ न्यग्रोधादावारवधादौ च लेहान् कारयेत् ॥९॥

इसके आगे अब लेहो को कहेंगे—खैर, असन, नीम, अमलतास, शाल का मध्यभाग, इनके कषाय में इन्हीं द्रव्यों के मध्यकाष्ठ को बारीक पीसकर मिलाकर, पकाये। जब यह न तो बहुत पतला, न बहुत गाढ़ा हो, तब उतारकर, इसकी पाणितल (कर्ष मात्रा या हथेली भर मात्रा) मात्रा को मधु में मिलाकर, प्रातःकाल कुछ न खाते हुए खाये। इसी प्रकार शालसारोदि, न्यग्रोधादि, आरवधादि गण से अवल्लेह बनाये।

वक्तव्य—डल्हण ने अप्रातराश का अर्थ 'सायंकाल ही भोजन करता हुआ खाये। अर्थात् दिन में एक ही समय, सायंकाल को ही भोजन करे' किया है ॥९॥

अतश्चूर्णक्रियां वक्ष्यामः—शालसारोदौ सारचूर्ण-प्रस्थमाहृत्यारवधादिकषायपरिपीतमनेकशः शालसारोदि-कषायैर्गैवं पाययेत्, एवं न्यग्रोधादौ फलेषु पुष्पेष्वार-वधादौ चूर्णक्रियां कारयेत् ॥१०॥

इसके आगे चूर्ण किया को कहेंगे—शालसारोदि गण की औषधियों के सार भाग का चूर्ण एक प्रस्थ लाकर, आरवधादि कषाय से इसको अनेक बार भावित करके, शालसारोदिगण के कषाय के साथ ही पिलाये। इसी प्रकार न्यग्रोधादि गण के फलों के चूर्ण को, आरवधादि गण के पुष्पों के चूर्णों की भावना देकर इनसे चूर्ण किया बनाये ॥१०॥

अत ऊर्ध्वमयस्कृतीर्वक्ष्यामः—तीक्ष्णलोहपत्राणि तन्-नि लवणवर्गप्रदिवधानि गोमयारिगप्रतमानि त्रिफलागाल-सारोदिकषायेण निवीपयेत् षोडजवारान् ततः खदि-राङ्कारतमान्युपगन्नातपाणि सूक्ष्मचूर्णानि कारयेद्घनता-न्तवपरिस्रावितानि ततो यथावलं मात्रां सर्पिर्मुखभ्यां संसूज्योपयुज्जीत, जीर्णं यथाव्याध्यतन्मलवणमाहारं कुर्वीत, एवं तुलासुपयुज्य कुष्ठमेहमेदःश्वयथुषाण्डुरोगो-न्मादापस्मारानपहृत्य वर्षशतं जीवति, तुलायां तुलायां वर्षशतमुत्कर्षः, एतेन सर्वलोहैष्वयस्कृतयो व्याख्याताः ॥

इसके आगे अयस्कृति, कहते हैं—तीक्ष्ण लोह के पतले पत्रों पर सैन्यव-सीवचल आदि लवण वर्ग का लेप करके, गोबर के अग्नि में लाल गरम करके, त्रिफला, शालसारोदि कषाय में इनको बुझाये (ठंडा करे)। इस प्रकार सोल्ह बार करे। फिर इनको खैर के अंगारों पर गरम करके, ठण्डा होने दे। पीछे से इनको फिर खैर के अंगारों पर गरम करे (इस प्रकार सोल्ह बार या जब तक चूर्ण होने लायक न हो तब तक करे। इनका सूक्ष्म चूर्ण करके बहुत महीन बल्ल (रेशम) से इसको छान ले। फिर अग्नि बल के अनुसार इसकी मात्रा को मधु और घृत में मिलाकर खाये। इसके पचने पर रोग के अनुसार, नमक और खटाई से रहित भोजन करे। इस प्रकार इस चूर्ण को एक तुला (एक सौ पल) खाकर, कुष्ठ, मेद, मेह, शोथ, पाण्डुरोग उन्माद अपस्मार से मुक्त होकर एक सौ वर्ष जीता है। एक एक तुला के उपयोग से एक एक सौ वर्ष आयु बढ़ती है। इसी प्रकार से दूसरे सब लोहों (स्वर्ण-चाँदी आदि) की अय-स्कृतियां बनाये।

वि० मन्तव्य—अयस्कृतिः—लोह अथवा लोहों (स्वर्ण आदि धातु भी लोह कहे जाते हैं) की कृति-कर्म या संस्कार करना अर्थात् उनको खाने योग्य बनाना। यह सब विधान लोह आदि का स्मार बनाने का विधान है। आज भी एलोपैथो इसी विधान का अनुसरण प्रायः कर रही है, यथा—स्वर्ण लवण, रजत लवण आदि २ ॥

त्रिवृच्छयामाग्निमन्थसमप्रलाकेतुकुशडुखिनोतिखक-त्रिफलापलाशभिजपानां स्वरसमादाय पाठाशेयां द्रोण्या-मभ्यासिन्ध्य खदिराङ्कारतमभयःपिंडं त्रिसमक्रुत्वो निर्वाप्य तमादाय पुनरासिन्ध्य स्थात्यां गोमयार्गिन्ना विपचेत् ततश्चतुर्थभागवाशिष्टमवतार्य परिस्राण्य भूयोऽ-ग्नितामन्ययःपत्राणि प्रक्षिपेत्, सिध्दति चास्मिन् पिप्प-ल्यादिचूर्णभागं द्वौ मधुनस्तावदुष्टस्येति दद्यात्, ततः प्रशान्तमायसे पात्रे स्वनुगुमं निदध्यात्, ततो यथायोगं शुक्तिं प्रकृच्छं चोपयुज्जीत, जीर्णं यथाव्याध्याहारसुप-सेवेत। एषोषधायस्कृतिसाधं कुष्ठं प्रमेहं वा साधयति, स्थूलमपकर्षति, शोकसुपहन्ति, सन्तमग्निमुद्गरति विशेषेण चोपदिरयते राजयस्मिणां, वर्षशतायुश्चानया पुरुषो