सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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मुमुक्षुसंहिता
[ अ० १० ]
भवति । शालसारोदिकवाथमासिन्ध्या पालार्यां द्रोण्याम- योघनांतमन्निर्वाप्य कृतसंस्कारे कल्लोडभ्यासिन्ध्या पिप्प- ल्यादिचूर्णभागं क्षौद्रं गुडमिति च दत्त्वा स्वतुगुमं निद- ध्यात , एतां महौषधायस्कृतिं मासमर्थमासं वा स्थितां यथाबलमुपयुज्जीत । एवं न्यग्रोधादावारेवतादिषु च विदध्यात् ॥१२॥
निशोथ, काली निशोथ, अरणी, सतला, केचुक, शंखिनी, तिल्वक, त्रिफला, ढाक, शीशम, इनका स्वरस (अभाव में क्वाथ या शीत कषाय) लेकर गिले ढाक की वनी द्रोणी (टब) में डाल देवे । फिर लोहे के पिण्ड को खैर के अंगारों में गरम करके इस स्वरस में बुझाये । इस प्रकार से इक्कीस बार करे । फिर इस पानी को (स्वरस को) लेकर थाली में (चौड़े पात्र में) रखकर गोबर की आग से पाक करे । जब यह स्वरस चौथाई रह जाये, तब इसको उतारकर, छान ले । फिर दुबारा लोहे के पत्रों को आग में लाल करके इसमें डाल देवे । (इन लोह पत्रों को इस कषाय से पीसकर इसीमें मिला दे ।) फिर इनमें पिप्पल्यादि चूर्ण एक भाग (लोह पात्र के बराबर), मिला- कर पकाये । जब यह लेह की भाँति हो जाये, उतारकर ठण्डा करे, ठण्डा होने पर इसमें मधु दो भाग (एक सौ पल) और धी भी एक सौ पल मिलाये । जब सब बन जाये, तब इसको लोह पात्र में रख कर सुरक्षित रख देवे । फिर योग के अनुसार आधा पल या एक पल खाये । इसके पचने पर रोग के अनुसार आहार करे । यह औषध अयस्कृति असाध्य कुष्ठ या प्रमेह को भी अच्छा कर देती है । मोगाये को कम करती है, शोथ को नष्ट करती है । मन्द अग्नि को बढ़ाती है, राजयक्ष्मा रोगियों के लिये विशेष रूप में कही जाती है । इसके उपयोग से पुरुष की आयु एक सौ बरस की होती है । ढाक की द्रोणी में शालसारोदि गण का क्वाथ डालकर, आग में लाल किये लोहे के पिण्डों को इसमें बुझाकर, धूप आदि से संस्कृत बनाये घड़े में इस कषाय को लोह पिण्डों समेत डालकर, इसमें पिप्पल्यादिगण का चूर्ण एक भाग मधु, और गुड दो-दो भाग मिलाकर सुरक्षित स्थान पर रख देवे । इस महौषधायस्कृति को एक मास या पन्द्रह दिन के पीछे अग्निबल के अनुसार बरते । इसी प्रकार न्यग्रोधादि, आरेवतादि (आरवधादिगण) से भी अयस्कृतियाँ बनाये ।
वक्तव्य—प्रथम योग में गुड मिलाना मूल पाठ में नहीं है, परन्तु इल्लु ने “द्वौ मधुनः द्वौ गुडस्वेतिपलाशतमित्यर्थः”—लिखा होने से इस में गुड भी मिलाना चाहिये ॥१२॥
अतः खदिरविधानमुपदेक्ष्यामः—प्रशस्तदेशजातमनु- पहतं मध्यमवयसं खदिरं परितः खानयित्वा तस्य मध्यमं मूलं छिन्वाडयोमयं कुर्म तस्मिन्नन्तरे विदध्याद्यथा
रसग्रहणसमर्थो भवति, ततस्तं गोमयमुदासवलिमभवकी- र्ण्यनैर्गोमयमिश्रैरादीपयेद्यथाऽस्य दहमानस्य रसः क्षत्रव्यधस्तात , तथाथा जानीयात् पूर्णं भाजनमिति । अथैतमुद्भूय परिखाण्य रसमन्यस्मिन् पात्रे निधायातुगुमं निदध्यात्, ततो यथायोगं मात्रामामलकरसमधुसर्पिभिः संस्तुष्योपयुज्जीत, जीर्णो भल्लातकविधानवदाहारः परि- हारश्च, प्रस्थे चोपयुक्ते शतं वर्षाणामायुषोऽभिबुद्धिर्भवति । खदिरसारतुलामुदकद्रोणे विपाच्य षोडशोऽनाव- शिष्टमवतायीतुगुमं निदध्यात् , तमामलकरसमधुसर्पि- भिः संस्तुष्योपयुज्जीत । एष एव सर्ववृक्षसारेषु कल्पः । खदिरसारचूर्णतुलां खदिरसारक्वाथमात्रां वा प्रातः प्रातरुपसेवेत, खदिरसारक्वाथसिद्धमाविकं वा सर्पिः ॥
इसके आगे खदिर विधान को कहते हैं—प्रशस्त देश में उत्पन्न, अग्नि-धूप आदि से न मारे हुये, मध्यम वय (तकण), खैर को चारों ओर से खोदकर, उसके मध्यममूल (मुख्य जड़) को काटकर इसके बीच में लोहे का एक घड़ा इस प्रकार से रक्खे, कि गिरा हुआ रस इस घड़े में गिरे । फिर इस खैर को चारों ओर गोबर और मिट्टी से लेप करके, लकड़ी, उपले आदि से घेरकर, इसमें आग लगा देवे । जिससे जलने पर इसका रस नीचे घड़े में गिरे । जब जाने कि घड़ा भर गया, तब इस घड़े को निकालकर, छानकर, दूसरे पात्र में रखकर सुरक्षित रख देवे । फिर योग के अनुसार इसकी मात्रा को आँवले के रस, मधु और धी में मिलाकर खाये । इसके पचने पर मिलावे की भाँति आहार एवं परहेज करे । एक प्रस्थ खाने पर एक सौ वर्ष की आयु बढ़ती है । खैर के सार भाग की एक तुला (एक सौ पल) को एक द्रोण जल में पकाये । जब सोलहवाँ भाग रह जाये, तब उतारकर सुरक्षित रख देवे । इसको आँवले के रस, मधु और धी में मिलाकर खाये । यही विधान सब वृक्षसारों के लिये है । खैर के सार के चूर्ण की एक तुला को, या खैर के सार के क्वाथ की मात्रा को प्रतिदिन प्रातः खाये । अथवा खैरसार के क्वाथ में सिद्ध किया भेड़ का धौ बरते ।
वक्तव्य—प्रशस्तदेश—“तत्र देशे जांगले साधारणे वा यथाकालं शिशिरातपवनसलिलसेविते समे शुचौ। प्रदक्षिणे शमशानचैत्यदेवयजनागारसभाश्वारासमवल्मीकोपरविरहिते, कु- शरोहिपास्तीर्णे स्निग्धकुष्णस्वर्णवर्णमधुरमुक्ति के मुदावकालकृष्टेऽ- नुपहतेऽन्यैः बलवत्तरेः दुमैरोषधानि जातानि प्रशस्यन्ते ॥” चरक० क० अ० १६॥१३॥
अमृतवल्लीस्वरसं क्वाथं वा प्रातः प्रातरुपसेवेत, तस्मिद्धं वा सर्पिः अपराह्नि सप्तपिंक्तमोदनमासलकृष्टेऽन्ये मुज्जीत, एवं मासमुपयुज्य सर्वकृष्टैर्विमुच्यत इति ॥१४॥