सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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चिकित्सास्थानम्
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गिलोय का स्वरस या क्वाथ प्रतिदिन प्रातःकाल सेवन करे। अथवा गिलोय के क्वाथ से सिद्ध किया घृत खाये। सार्यकाल में घी मिश्रित मात को आँवले के यूष से खाये। इस प्रकार एक मास करने से सब प्रकार के कुष्ठों से मुक्त हो जाता है ॥१४॥
कृष्णतिलभल्लातकतैलामलकरससर्पिषां द्रोणं शालसारदिकृपायस्थ च, त्रिफलात्रिकटुकपुरुषफलमज्जविडङ्गफलसारचित्राकॉवल्गुहह्रिद्राद्वयत्रिबुद्धन्तीद्रवन्तीन्द्रयवयष्टीमधुकातिविषारसाञ्जनप्रियङ्गणां पालिका भागास्वानैकध्वं स्नेहापकविधानेन पचेत्, तत् साधुसिद्धमवताये परिसाद्यानुगुप्तं निदध्यात्। तत उपसंस्कृतशरीरः प्रातः प्रातःस्थाय पाणिशुक्तिमात्रं क्षौद्रेण प्रतिसंमुखोपयुञ्जीत, जीर्णं मुद्रामलकयूषेणालवणेन सर्पिषंमन्तं खदिरौदकसिद्धं मुद्रोदनमरनीयात् खदिरौदकसेवी, इत्येवं द्रोणमुपयुज्य सर्वकुष्ठैर्विमुक्तः शुद्धतनुः स्मृतिमान् वर्षशतायुररोगो भवति ॥१५॥
काले तिल, भिलाये का तेल, आँवले का रस, घी, शालसारदि कपाय, प्रत्येक एक द्रोण, त्रिफला, त्रिकटु, फाल्से की गुठली, वायविडंग, एरण्ड, आक, बावची, हल्दी, दारुहल्दी, निशोथ, जमालमोटा, मोगलई एरण्ड, इन्द्रजो, मुलेहठी, अतीस, रसौत, प्रियंगु-प्रत्येक एक पल, इन सबको मिलाकर स्नेह पाक विधि से पकाये। फिर भली प्रकार पकने पर छानकर, इसको पुरक्षित स्थान पर रख देवे। फिर वमनादि से शरीर का संस्कार करके, प्रतिदिन प्रातःकाल इसकी एक पल मात्रा को मधु के साथ मिलाकर खाये। इसके पचने पर नमक रहित मूंग और आँवले के यूष के साथ, खैर के क्वाथ में पकाया, कोमल मात घी डालकर खाये। खैर का ही क्वाथ पीने में बरते। इस प्रकार से एक द्रोण भर खाकर मनुष्य सब प्रकार के कुष्ठों से मुक्त हो जाता है, शरीर शुद्ध हो जाता है, स्मृति-शाली होता है, एक सौ बरस तक नीरोगी होता है ॥१५॥
भवति चात्र— सुरामन्थासवारिष्टांरुलेहांश्रुणीन्ययस्कृतोः। सहस्रजोऽपि कुर्वीत बाजेनानेन बुद्धिमान् ॥१६॥ इसमें श्लोक भी है—बुद्धिमान् व्यक्ति इन बीज रूप योगों से हजारों (बहुत से) सुरा, मन्थ, आसव, अरिष्ठ, लेह, चूर्ण, अयस्कृतियाँ बनाले ॥ चरक में— बीजमिव कर्षकस्य सूत्रं बुद्धिमतम्। अल्पमप्यनल्पशनायतनं भवति ॥१७॥ इति सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने महाकुष्ठचिकित्सनं नाम दशमोऽध्यायः ॥१०॥
एकादशोऽध्यायः
अथातः प्रमेहचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥१॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
अब इसके आगे प्रमेह चिकित्सा का व्याख्यान करेंगे— जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥१,२॥
द्वौ प्रमेहौ भवतः—सहजोऽपथ्यनिमित्तश्च। तत्र सहजो मातृपितृबीजदोषकृतः, अहिताहारजोऽपथ्यनिमित्तः। तयोः पूर्वणोपदुतः कृशो रूक्षोऽल्पाशी पिपासुर्ध्वंजं परिसरणशीलश्च भवति, उत्तरेण स्थूलो बह्माक्षो स्तिग्धः शय्यासनस्वप्नशीलः प्रायेणेति ॥३॥
प्रमेह दो प्रकार का होता है, सहज (जन्मजात) और अपथ्य कारण जन्म। इनमें सहज प्रमेह माता-पिता के बीज दोषजन्य है। अहिताहारजन्य प्रमेह अपथ्य कारण से होता है। इनमें पूर्व प्रकार के प्रमेह से पीड़ित रोगी कृश, रूक्ष, थोड़ा खानेवाला, प्यासयुक्त और अतिशय घूमने के स्वभाववाला होता है। अपथ्य सेवन जन्म प्रमेही स्थूल, बहुत खानेवाला, स्तिग्ध, लेटने बैठने सोने में सुख अनुभव करनेवाला प्रायः होता है।
वक्तव्य—“स्थूलः प्रमेही वल्लानिहैकः कृशस्तयैकः परिदुर्बलश्च ॥ संवृहणं तत्र कृशस्य कार्यं संशोधनं दोषवलाधिकर्य ॥” चरक। तत्रान्तर में एक श्लोक दिया है—“रजः-प्रसेकाचारीणां मासि मासि विशुध्यति। सर्वं शरीरं दोषाश्च न प्रमेहन्त्यतः त्रियः ॥” इसका अभिप्राय यह नहीं कि आर्तच धर्म होते रहने से त्रियों को प्रमेह नहीं होता। त्रियों में मधुमेह या अन्य प्रकार के प्रमेह देखे जाते हैं। परन्तु जिन औरतों को ठीक प्रकार से नियमित रूप में रजोदर्शन होता रहता है, उनमें प्रमेह नहीं मिलता। प्रमेह उन्हीं औरतों में होता है, जिनको मासिक धर्म नियमित या शुद्ध रूप से नहीं होता। ठीक प्रकार से नियमित रूप में मासिक धर्म होने से शरीर के दोष शुद्ध होने से प्रमेह होने की सम्भावना का अवसर ही नहीं रहता। इसी से कहा है “कफः सपितः पवनश्च दोषाः, मेवोऽल्लुष्कांशुवसालसीकाः। मज्जा रसोजः पिशितं च दूष्याः, प्रमेहिणां विशतिरेव मेहाः ॥” चरक० चि० अ० ६-८ ॥३॥
तत्र कृशमन्त्रपानप्रतिसंस्कृताभिः क्रियाभिश्चिकित्सेत, स्थूलमपतर्पणयुक्ताभिः ॥४॥
इनमें कृश व्यक्ति की खान-पान की संस्कृत की क्रियाओं से (स्तिग्ध क्रियाओं से) चिकित्सा करे। स्थूल पुरुष की अपतर्पणवाली क्रियाओं से (व्यायाम, तिककटु आदि रसों से) चिकित्सा करे।
वक्तव्य—“गुरु चातर्पणं श्रेष्ठं स्थूलानां कर्षणं प्रति। कृशानां बृहण्यर्थं च लघुसतर्पणं च यत् ॥ वातध्वान्यमपानानि