सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ११ ]
श्लेषमेदोहराणि च । लक्षोष्णा वस्तयस्तीक्ष्णा लक्षाण्युद्भन्तानि च” ॥ ४ ॥
सर्व एव च परिहरेयुः सौवीरकतुषोदकशुक्तमैरेय-सुरासवतोयपयस्तैलघुतेलुविकारदधिपिष्टात्रामूल्यवगुप्ता-नकानि ग्राम्यान्पूदकमांसानि चेति ॥५॥
सब प्रकार के प्रमेही—सौवीरक (सतुषकांजी), तुषोदक (निस्तुषकांजी), शुक्त, मैरेय, सुरा, आसव, पानी, दूध, तैल, घी, इल्लु विकार (गुड आदि), दही, पिठी से बनी वस्तु, अम्ल, यवागु, पानक (शर्बत), ग्राम्यमांस, आन्पमांस, औदकमांस इनको त्याग करे ॥५॥
ततः शालिषष्टिकयवगोधूमसकोद्रवोहालकाननवान् मुर्जजीत चणकाढकीकुल्लयमुद्गाविकल्पेन, तित्कषायाभ्यां च शाकगणाभ्यां निकुम्भेकुद्वासर्षपातसौतेलसिद्धाभ्यां, बद्धमुर्जैर्वा जाङ्ग्लैर्मांसैरपहृतमेदोभिरनस्त्रैरघृते-श्रेति ॥६॥
फिर पुरातन शालि, खांटी, जौ, गेहूँ, कोह्रा, उहालकों को, चना, अरहर, कुलथी और मूंग इनके साथ बदल बदल खाये। तित्कगण पनवाड़, पटोल आदि, कषायगण-वटशुंगादि शाकगणों को दन्ती, इगुदी (हिंगोट), सरसों, अलसी, इनके तैल में सिद्ध करके इनके साथ खाये। हरिण आदि का मांस, मेद निकालकर जांगल पशुओं के मांस को बिना घी और बिना खटाई के खाये ॥ चरक में —
‘मुद्गादियुषैरेय तित्काशकैः पुराणशाल्योदनमाददीत ।
दन्तीकुद्वातेलयुतं प्रमेही तथाऽतसीसर्षपतैलयुक्तम् ॥’
चरक० चि० अ० ६।२० ।
वि० मन्तव्य—इस सूत्र में दन्ती अर्थात् जमालगोटा के तैल में शाक आदि को सिद्ध करके खाने का विधान किया है, परन्तु वह अत्यन्त तीव्र वामक एवं विरेचक है, रत्ती आधी रत्ती को मात्रा में भी। अतः चिकित्सक को विचारकर कार्य करना चाहिये। यदि किसी दिन वमन विरेचन करना हो तो ३ या ४ रत्ती का प्रयोग किया जा सकता है अन्यथा नहीं, जैसे निम्नलिखित सूत्र ७ में बतलाया गया है ॥६॥
तत्रादित एव प्रमेहिणं स्निग्धमन्यतमेन तैलेन प्रियङ्गवादिसिद्धेन वा घृतेन वामयेत् प्रगाढं विरेचयेच्च विरेचनादनन्तरं सुरसादिकषायेणास्थापयेन्महौषधमद्वदा रुमुस्तावापेन मधुसैन्धवयुक्तेन दह्यमानं च न्यम्रोधादिकषायेण निःसृनेहेत ॥७॥
इनमें सबसे प्रथम स्निग्ध प्रमेह रोगी को प्रियंगु आदि गण से सिद्ध किये उपयुक्त किसी तेल से या घी से तीक्ष्ण वमन कराये, और तीक्ष्ण विरेचन देवे। विरेचन के पीछे सुरसादि गण के कषाय में सोठ, देवदारु, मुस्ता का प्रत्तेष एवं मधु और सैन्धव मिलाकर आस्थापन बस्ति देवे। यदि जलन होती हो तो तैल रहित न्यम्रोधादिकषाय से बस्ति देवे।
“स्निग्धस्य योगा विविधाः प्रयोज्याः कल्पोपदिष्टा मलशोधनाय ।
ऊर्ध्वं तथाऽवश्व मलेऽपनीते, मेहेषु सन्तर्पणमेव कार्यम् ॥” चरक चि० अ० ६ निःसृनेह का अर्थ कोई अल्प घृत करते हैं। कफ प्रमेह में वमन, पित्त प्रमेह में विरेचन दे ॥७॥
ततः शुद्धदेहमामलकरसेन हरिद्रां मधुसंयुक्तां पाययेत्, त्रिफलाविशालादेवदारुमुस्ताकषायं वा, शालकन्धि-रलकमुष्ककलकमक्षमात्रं वा मधुमधुरसामलकरसेन हरिद्रायुतं, कुटजकपित्थरोहीतकविभीतकसप्तर्पणपुष्पकलकं वा, निम्बारग्वधसप्तर्पणमूर्वाकुटजसोमधुक्षपलाशानां वा त्वकपत्रमूलफलपुष्पकषायाणि, एते पञ्च योगाः सर्वमेहानामपहन्तारो व्याख्याताः ॥८॥
शरीर का शोधन हो जाने पर आँवले के रस से (चार पल), हल्दी को (एक कर्ष)—मधु (एक कर्ष) मिलाकर पिलाये। त्रिफला, देवदारु, इन्द्रवारणी, मुस्ता इनका कषाय पिलाये। शाल, कमीला, मुष्कक इनका कलक एक कर्ष, मधु से मीठे किये आँवले के रस और हल्दी के साथ देवे। कुटज, कैथ, रोहेड़ा, बहेड़ा, सप्तर्पण इनके फूलों का कलक या नीम, अमल-तास, सप्तर्पण, मूर्वा, कुटज, विट्खैर, ढाक, इनकी छाल, पत्ते, मूल, फल, पुष्प के कषाय का उपयोग करे। ये पाँच योग सब प्रकार के प्रमेहों को नष्ट करते हैं। (इन सब योगों में आँवले का रस, हल्दी और मधु मिलाना चाहिये। इसीसे कहा है—“क्षौद्रेण युक्तामथवा हरिद्रां पिबेद्रसेनामलकीफलानाम् ॥” चरका।
विशेषश्रात ऊर्ध्व—तत्रोदकमेहिंनं पारिजातकषायं पाययेत्, इल्लुमेहिंनं वैजयन्तीकषायं, सुरामेहिंनं निम्बकषायं, सिकतामेहिंनं चित्रककषायं शनैर्मेहिंनं खदिरकषायं, लवणमेहिंनं पाठाऽगुरुहरिद्राकषायं, पिष्टमेहिंनं हरिद्रादारुहरिद्राकषायं, सान्द्रमेहिंनं सप्तर्पणकषायं, शुक्रमेहिंनं दूर्वाशैवल्लवहठकरञ्जकसेरुककषायं ककुभचन्दनकषायं वा फेनमेहिंनं त्रिफलाग्वधसुद्धीकाकषायं, मधुमधुरमांसं, पैतिकेषु नोलमेहिंनं शालसारादिकषायं मरवत्यकषायं वा पाययेत्, हरिद्रामेहिंनं राजवृक्षकषायम् अम्लमेहिंनं न्यम्रोधादिकषायं, क्षारमेहिंनं त्रिफलाकषायं, मञ्जिष्टामेहिंनं मञ्जिष्टाचन्दनकषायं, शोणितमेहिंनं गुड्घाचोतिन्दुकास्थिकाश्मर्यखजूरकषायं मधुमिश्रम्, अत ऊर्ध्वंमसाध्येष्वपि योगान् यापनार्थं वद्यामः, तथवा सर्पिर्मेहिंनं कुष्ठकुटजपाठाद्विह्नकदुरोहिणीकलकं गुड्घाचोचित्रकषायेण पाययेत्। वसामेहिंनमनिमन्थकषायं शिशपाकषायं वा, क्षौद्रमेहिंनं खदिरककषायं, हस्तिमेहिंनं तिन्दुककपित्थशिरोषपलाशपाठामूर्वाऽस्पशर्कषायं मधुमधुरं हस्त्यरवशूकरखरोष्ट्रास्थिक्षारं चेति, दह्यमानमौदककन्दकवाथसिद्धां यवागं क्षौरेजुरसमधुरां पाययेत् ॥