सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंॐ ११ ]
चिकित्सास्थानम्
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इसके आगे विशेष रूप में कहते हैं—उदकमेही को पारिजात (फरहद) का कषाय पिलाये। इक्षुमेही को वैजयन्ती (अरणी) कषाय पिलाये। सुरामेही को नीम का कषाय, सिकतामेही को चित्रक का कषाय, शनैःमेही को खैर का कषाय, लवणमेही को पाठा, अगर और हल्दी का कषाय, पिष्टमेही को हल्दी, दारुहल्दी का कषाय, सान्द्रमेही को सप्तपर्ण का कषाय, शुक्रमेही को दूध, शैवाल, प्लव (केवटी मोया), हठ (जलकुम्भी) करंज और कसेरु का कषाय या ककुभ (अजुन) और चन्दन का कषाय, फेनमेही को त्रिफला, अमलतास और द्राक्षा का कषाय दे। इन सब कषायों को मधु से मीठा करके देवे। पित्तजन्य प्रमेहों में नीलमेही को आलसारादिगण का या पीपल का कषाय पिलाये। हरिद्रामेही को अमलतास का कषाय, अरुमेही का न्यम्रोधादि गण का कषाय, क्षारमेही को त्रिफला कषाय, मजिष्टामेही को मजीठ और चन्दन का कषाय, शोणितमेही को—गिलोय, तिन्दुक की गुठली, गम्भारी, खजूर का कषाय देवे, इन सब में मधु मिलाये। इसके आगे असाध्य प्रमेहों में भी यापना के लिये योगों को कहेंगे—यथा-सर्पिमेंही को—कुष्ठ, कुटज, पाठा, हींग, कुटकी का करक, गिलोय, चित्रक के कषाय से पिलाये। वसामेही को अग्निसन्ध का या शीयम का कषाय, मधुमेही को कंदर (खैर—जिसमें बदबू आती है), और सुपारी का कषाय हस्तिमेही को तिन्दुक, कैथ, शिरीष, टाक, पाठा, मूर्वा, धमासा इनका कषाय पिलाये, सब कषायों में मधु मिलाये। हाथी, घोड़ा, सुअर, गधा, ऊँट इनकी अस्थियों को जलाकर इनका क्षार पानी में घोलकर शीतल रूप में हस्तिमेही को पिलाये।
शरीर में जलन होने पर (प्रमेह में जलीय घातु—कलेद के क्षीण होने से, इसके विरोधी पित्त के बढ़ने पर दाह होता है)—औदक कन्दों (कमल की जड़, विस, कसेरु, सिंघाड़ा आदि) के कषाय में सिद्ध की यवाग् को दूध, गन्ने का रस इनसे मीठा करके पिलाये।
वक्तव्य—प्रमेहों में मधु का मधुर रस विषेय है, क्योंकि यह योगवाही है “नानाद्रव्यात्मकत्वाच्च योगवाहि परं मधु।” चरक। दूसरी सब शर्करायें—खासकर दानेदार मशीन की शर्कर बहुत हानिकारक है। कन्दों का क्वीथ-वर्द्धन परिभाषा से करना चाहिये। इस तरह बनाई यवाग् अपवाद रूप है ॥६॥
ततः प्रियङ्गवन्ततायुथिकापद्मात्रायन्तिकालोहितिकाम्बुघ्नाडाडिमस्वक्शाल्पणंपद्मातुङ्गाकेशरधातकीबकुल-शासम्लोशीवेष्टकमोचरसेव्वरिष्टानयस्कृतीर्लहानासवांशकुर्वीत, शृंगाटकगिलोच्चविसमुणालकाशकसेरुकमधुका-
प्रजन्म्वसन्ततिनिशककुभकद्वंगरोधभरलात कपलाशचर्म-वृक्षगिरिकर्णिकाशीतशिरनिचुलदाडिमाजकर्णहरिबृक्षरा-जादनगोपघोण्टाविकङ्कतेषु वा, यवान्तविकाराश्च सेवेत, यथोक्तकषायसिद्धा यवाग् चार्मै प्रयच्छेत्, कषायणि-वा पातुम् ॥१०॥
प्रियंगु, अनन्ता (सारिवा), यूथिका (जूही), मार्गा, त्रायन्तिका (मेहदी), लोहितिका (मजीठ), अम्बुघ्ना (पाठा-जल जमनी), अनार की छाल, शाळपर्णी, कमल, नागकेशर, धाय का फूल (धातकी), मौलसरी, सिम्बल, धूपवृक्ष, मोचरस (सिम्बल का गोंद) इनसे पूर्व की मांति अरिष्ट, अयस्कृति, लेह, आसव बनाये। सिंघाड़ा, कमलकन्द, विष, कमलनाल, कास, कसेरु, मुलेहटी, आम, जामुन, असन, सांदन, अजुन, रथोनाक, लोघ, मिलावा, टाक, चर्मवृक्ष (कीकर या दूसरा कोई), अपराजिता, शीतशिव (डल्हन के मत से शतपुष्पा भेद, दूसरों के मत से चन्दन), जलवेतस, अनार, अजकर्ण, हरिबृक्ष (धव), खिरनी, गोपघंटा (झाड़ी बेर), विकङ्कत (वैकड़ा) इनसे आसव, अरिष्ट, अयस्कृति लेह बनाये। जो से बने मध्यों को खाये। प्रियंगु आदि या शृंगाटक आदि के कषाय में सिद्ध यवाग् इसे पीने को देवे तथा कषाय पीने को देवे ॥१०॥
महाधनमहिताहारमौषधद्वेषिणमौषधर वा पाठाभया-चित्रकप्रगाढमन्तपमाक्षिकमन्मयतममासवं पाययेत्, अंगारशूलयोपदर्श वा माध्वीकमभीक्षण, क्षौद्रकपित्थमरिचानु-विद्वान्नि चार्मै पानभोजनान्युपहरेत्, उष्ट्राश्चतरखरपुरी-षचूर्णानि चार्मै दद्यादशनेषु; हिकुसैन्धवयुक्तैषैः साषपैश्च रागैर्भाजयेत्; अवरुद्वान्नि चार्मै पानभोज-नान्युपहरेद्दसगन्धवन्ति च; प्रबुद्धमेहास्तु न्यायामनि-युद्धक्रोडागजतुरगरथपदातिचर्यापक्रमणान्यसोपाखे वा सेवेत् ॥११॥
बड़े भारी ऐश्वर्यवाला मनुष्य, या राजा जो कि अहिता-हार हो, और औषधियों से द्वेष करता हो, उसे पाठा, हरङ्ग, चित्रक की प्रचुर मात्रा एवं अतिशय मधु मिलाकर प्रियंगु आदि गण का कोई आसव पिलाये। अंगारों पर सेके हुए मांस के साथ माध्वीक मद्य बार-बार देवे। खान, पान में मधु, कैथ, मरिच मिलाकर देवे। भोजनों में ऊँट, खन्चर, गधा की लीढ़ का चूर्ण मिलाकर देवे। हींग और सैन्धव मिले यूषों से तथा सरसों राई रागों (रायता आदि) के साथ भोजन देवे। जो विरोधी न हों, ऐसे खान, पान, रस एवं गन्धयुक्त (रुचि पैदा करने के लिये) इसको देवे। बड़े हुए प्रमेहवाले रोगी व्यायाम, कुश्ती आदि खेल, घोड़े-हाथी या रथ की सवारों, पैदल मुसाफिरी-धूमना-फिरना, अस्त्र (शास्त्र विहित धनुष),