भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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मुमुक्षुसंहिता

[ अ० १२ ]

उपाख्य—(शाल्व नियम वर्जित धनुष) का उपयोग करे ।

वक्तव्य—धर्मशास्त्रों में—आर्य संस्कृति में इसीलिये तीर्थ यात्रा-तीर्थ दर्शन का महत्त्व है । मनुष्य साल भर में एक बार बह्रीनाथ पैदल जब जायेगा, वहाँ के मुनिधान्य, वृणधान्य खायेगा, परिश्रम करेगा, वह नीरोगी रहेगा, यह इस देश की दृष्टि से सोचना है ।

वि० मन्तव्य—अन्नोपास्त्रे-अन्न-धनुष का चढ़ाना खींचना, आदि अभ्यास तथा उपाख्य-गुलेह, देला फेंकना आदि अभ्यास । व्यायाम आदि सब प्रमेह-पीडितों के लिये लाभदायक हैं । क्रीड़ा-कबड्डी आदि दौड़-धुपवाली क्रीड़ा । इन सबका तात्पर्य है कि प्रमेह रोगी घोर परिश्रम करता रहे यह सब हेतुविपरीत चिकित्सा है ॥११॥

अधनस्त्वबान्धवो वा पादत्राणातपत्रविरहितो भैदयाशौ ग्रामेकरात्रवासो मुनिरिव संयतात्मा योजनशतमधिकं वा गच्छेत्, महाधनो वा श्यामाकनीवारवृत्तिरामलककपित्थतिन्दुकारसन्तकफलाहारो मृगः सह वसेत्, तन्मन्त्रशकृद्धश्चः सततमनुब्रजेदगाः, ब्राह्मणो वा शिलोच्छवृत्तिभूत्वा ब्राह्मण्यमुद्भूरेत्, कृषेत् सततमितरः खनेद्वा कूपम्, कृशं तु सततं रक्षेत् ॥१२॥

जो मनुष्य गरीब हो, कोई परिचारक, भाई—मित्र न हो, उसे चाहिये कि जूता और छाता छोड़कर, नंगे सिर और नंगे पैर ही मिखावृत्ति (मधुकरी) पर जीवन निर्वाह करते हुए, एक ग्राम में (एक स्थान में) एक बसेरा करके, मुनि के साथ इन्द्रियों को वश में रखकर, एक सौ योजन या इससे भी अधिक चले । अथवा जो ऐश्वर्य शाली हो, वह सांक्कनीवार पर रहकर आंबला, कैथ, तिन्दुक, अश्मन्तक (सिरहटा) के फलों का आहार करते हुए मृगों के साथ (जंगल में) रहे । मूत्र, गोबर को खाते हुए निरन्तर गायों के पीछे चले (गायों के मूत्र पीने और गोबर को खाये) । अथवा यदि वह ब्राह्मण हो-शिला एवं उच्छवृत्ति पर रहकर ब्रह्मरथ का उद्धार करे । ब्राह्मण से दूसरा मनुष्य हल चलाये या कुएँ को खोदे । कृश व्यक्ति की सदा रक्षा करे—उससे मेहनत न कराये ।

वक्तव्य—काटते हुए गेहूँ आदि की भूमि पर गिरे रहने से बचे अन्य को उठाना शिलवृत्ति-चावल की कणियों (जो कि पछोड़ कर अलग निकाल ली जाती है) पर रहना उच्छवृत्ति है ।

व्यायामयोगेर्विधिः प्रगाढैः

उद्दर्शनैः स्नानजलावसेके ।

सेव्यत्वगोलाऽगुरुचन्दनाद्यैः

विलेपनैश्चाशु न सन्ति मेधाः ॥

क्लेदश्च मेदश्च कफप्रवृद्धौ

प्रमेहहेतुः प्रसमीक्ष्य तस्मात् ।

वैद्येन पूर्व कफपित्तजेणु

मेहेणु कार्याण्यपतर्पयानि ॥

चरक० चि० अ० ६ ।

वि० मन्तव्य—ब्रह्मरथमुद्भूरेत् के स्थान में—“ब्रह्मरथमुपधारयेत् पठेत् सततम्, इतरः खनेद् वा कूपम्” पाठान्तर है । इसका अर्थ है—ब्राह्मण ब्रह्मरथ अर्थात् वेद का उपधारण-पठन-पाठन करे निरन्तर—सर्बदा । इतरः अर्थात् ब्राह्मणेतर्-अन्य शूद्र कूप को खोदे, तालाब बावड़ी खोदे । इन सबका तात्पर्य है कि प्रमेह रोगी घोर परिश्रम किया करे । देखा जाता है कि घोर परिश्रम करनेवाले प्रायः प्रमेह से पीड़ित नहीं होते ॥१२॥

भवति चात्र—

अधनो वैद्यसन्देगादेवं कुर्वन्नतन्द्रितः ।

संवत्सरादन्तराद्वा प्रमेहात् प्रतिमुच्यते ॥१३॥

इस विषय में श्लोक है—निर्धन मनुष्य वैद्य के उपदेशानुसार-बिना आलस्य के इस प्रकार से बरते । इस प्रकार करने पर एक साल में या बीच में ही प्रमेह रोग से मुक्त हो जाता है ॥

इति श्रीमुमुक्षुसंहितायां चिकित्सास्थाने प्रमेहचिकित्सितं नामैकादशोऽध्यायः ॥१३॥

द्वादशोऽध्यायः

अथातः प्रमेहपिडकाचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥१४॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

अब इसके आगे प्रमेह पिडका चिकित्सा का व्याख्यान करेंगे—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥१४॥

शराविकाद्या नव पिडकाः प्रागुक्ताः प्राणवतोऽस्यास्त्वङ्गांसंप्राप्ता मृद्योऽरुपरुजः क्षिप्रपाकभेदिन्यश्च साध्याः ॥१५॥

शराविका आदि नौ पिडकायें पहले कह दी हैं । इनमें—बलवान् (सत्त्ववान् धैर्यशाली) पुरुष में, छोटी होने से, स्त्रवा और मांस में ही स्थिर रहने पर, कोमल एवं थोड़ी पीड़ावाली, तथा जल्दी पकनेवाली एवं फूटनेवाली पिडकायें साध्य होती हैं ।

वक्तव्य—ये पिडकायें प्रमेह के बिना भी होती हैं । यथा—“बिना प्रमेहमप्येता जायन्ते दुष्टमेदसः । तावच्छेता न लक्ष्यन्ते यावद्वास्तुपग्रिहाः ॥ जायन्ते तावतिबलाः प्रभूतश्लेष्ममेदसाश्च ॥ वि० मन्तव्य—नि० स्थान अ० ६ में—१० पिडका