सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ११ ]
जाती है । कोष्ठ के क्रमियों को नष्ट करती है । कास, श्वास, कृमि, कुष्ठ, प्रतिश्याय, अरोचक, अविपाक, उदावर्त्त को नष्ट करती है ।
वक्तव्य—आठ महारोग-प्रमेह, अर्श, कुष्ठ आदि हैं ॥११॥
मदनफलमज्जकुटजजीमूतकेद्वबाकुधामार्गवत्रिवृत्तत्रिकुटकसर्पपलवणानि महाशुक्ष्मीरमूत्रयोरन्यतरेण पिष्णु-डुष्टमात्रां वर्त्ति कृत्वोदरिण आनाहे तैलवर्णभ्यक्तगुदस्यैकां द्वे तिस्त्रो वा पायो निदध्यात, एषाऽऽन्ताहवर्त्ति-क्रिया वातमूत्रपुरीषोदावर्त्ताधमानानाहेषु विधेया ॥१२॥
मैनफल की मज्जा, कुटज, देवदाली, कटुमुम्भी, कडुई, तुरई, त्रिकुट, सरसों, नमक, इनको थोर के दूध या गोमूत्र में पीसकर अंगूठे के बराबर (यब के आकार की, बीच से मोटी, किनारों से पतली) वर्त्ति बनाकर उदर रोगी को आनाह होने पर, गुदा में तैल और नमक लगाकर एक या दो वर्त्ति या तीन वर्त्ति गुदा में रक्खे । यह आनाहवर्त्ति क्रिया वायु-मूत्रमल के उदावर्त्त एवं आध्मान, आनाह में वरतनी चाहिये ।
“फलश्यामादिभिः कुष्ठकुष्णालवणसर्षपैः ।
धूम्रमाषवचाकिष्वक्षारचूर्णगुडैः कृताम् ॥
करांगुष्ठनिर्भां वर्त्ति यवमध्यां निधापयेत् ।
स्वम्यक्तस्विन्नगात्रस्य तैलत्कां स्नेहिते गुदे ॥” च०
वि० मन्तव्य—इस वर्त्ति को गुदा में प्रविष्ट करने से गुदवलिमें से गति होकर वायु अनुलोम हो जाता है और पुरीष एवं मूत्र की प्रवृत्ति हो जाती है, अपान वायु खुलता है । इसके अभाव में शतुन की, ग्लेसरीन की अथवा अन्य प्रकार की बत्ती दे दी जाती है ॥१३॥
प्लोहोदरिणः स्निग्धस्विन्नस्य दध्ना मुक्तवतो वाम-बाहौ कूर्पराभ्यन्तरतः सिरां विध्येत, विमर्दयेच्च पाणिना प्लीहान् रुधिरस्यन्दर्नाथः; ततः संशुद्धदेहं समुद्रमुत्तिका-क्षारं पयसा पाययेत्, हिङ्गुसौवर्चिकं, वा क्षीरेण, स्तुतेन पलाशक्षारेण वा यवक्षारं किंशुकक्षारोदकेन वा बहुगः स्तुतेन यवक्षारं, पारिजातकेन्दुरकापासार्गक्षारं वा, तैल-संस्पृष्टं शाभाञ्जनकयूवं पिप्पलीसैन्धवचित्रकयुक्तं, पूति-करञ्जक्षारं वाऽम्लस्तुवं विडलवणपिप्पलीप्रगाढम् ॥१४॥
प्लोहोदर रोगी का स्नेहन, स्वेदन देकर दही से भांजन खिलाकर वामवाहू में कोहनी के अन्दर की ओर खिरा का बेधन करे । रक्त का बहाव करने के लिये हाथ से प्लीहा को मले । फिर वमन, विरेचन से शरीर का शोधन करके सपुत्र की सिप्पी का क्षार दूध से पिलाये । या दूध से हींग और सौवर्चल को, नितारे पलाशक्षार यवक्षार या बहुत बार नितारे ढाक के क्षारोदक से यवक्षार को पिलाये । अथवा पारिजात (हारसिंगार) तालमखाना, चिरचिटा का क्षार पिलाये । सुहांजन के यूष में तैल मिलाकर, पिप्पली, सैन्धव, चित्रक डालकर पिलाये । लताकरंज के क्षार को शतावर खट्टी कांजी में घोल-
कर, छान ले, इसमें विडलवण और पिप्पली प्रचुर मात्रा में मिलाकर पिलाये (पलाशक्षार से ढाक की छाल का, किंशुकक्षार से—ढाक के फूलों का क्षार लेना ) ॥१४॥
पिप्पलीपिप्पलीमूलचव्यचित्रकशुङ्गवेरयवक्षारसैन्ध-वानां पाल्ठिका भागाः, घृतप्रस्थं तत्तूर्यं च क्षीरं तदैकध्वं विपाचयेत्, एतत् षट्पलकं नाम सर्पिः प्लोहाग्निसङ्गु-न्मोदरोदावर्त्तश्चयुष्पाण्डुरोगकासश्वासप्रतिश्यायोर्ध्ववात-विषमञ्जरानपहन्ति । मन्दाग्निवां हिङ्गवादिकं चूर्णमु-पयुञ्जीत ॥१५॥
पिप्पली, पिप्पलीमूल, सैन्ध, चित्रक, सौंठ, यवक्षार, सैन्धव प्रत्येक एक पल, घी एक प्रस्थ, दूध भी एक प्रस्थ, इन सबको एक साथ मिलाकर घृत सिद्ध करे । यह षट्पलक नामक घृत, प्लीहा, अग्निमांध्य, गुरुम, उदर, उदावर्त्त, श्वयशु, पाण्डुरोग, कास, श्वास, प्रतिश्याय, ऊर्ध्ववात, विषमञ्जर को नष्ट करता है । मन्दाग्निवालों के लिये हिङ्गवादि चूर्ण बरते ।
चरक में—सैन्धव का पाठ नहीं है, यथा—पिप्पलीपिप्पलीमूलचव्यचित्रकनागरेः । पलिकैः सयवक्षारैः घृतप्रस्थं विपाचयेत् ॥१५॥ यकृद्वाह्येऽप्येष एव क्रियाविभागः । विशेषतस्तु दक्षिणबाहौ सिराण्यधः ॥१५॥
मणिबन्धं सङ्कन्तान्मय वामाङ्गुष्ठसमीरिताम् । दद्वेत सिरां शरेणाशु प्लीहो वैद्यः प्रशान्तयेत् ॥१६॥ यकृद्वाह्यं रोगं में भी यही चिकित्सा है, केवल सिरावैध दक्षिण बाहु में करे ।
वैध प्लीहा की शान्ति के लिये—कलई को थोड़ा सा झुका कर (मोड़कर) वाम अंगुष्ठ की ओर जाती हुई सिरा को, अग्नि में लाल किये शर (बाण) से जलाये ॥१५, १६॥
बद्धगुदे परिस्त्राविणि च स्निग्धस्विन्नस्याभ्यक्तस्यापो नाभेवामंतश्चतुरङ्गुलमपहाय रोमराज्या उदरं पाटयित्वा चतुरङ्गुलप्रमाणमन्त्राणि निष्कृष्य निरीद्व्य बद्धगुदस्यान्त्रप्रतिरोधकरमस्मान् बालं वाऽपोह्य मलजातं वा ततो मधुसर्पिर्भ्यांमस्यज्यान्त्राणि यथास्थानं स्थापयित्वा बालं व्रणमुदरस्य सीन्येत । परिस्त्राविण्यप्येवमेव शल्यमुद्भुत्यान्त्रसावान् संशोध्य, तच्छिद्रमन्त्रं समाधाया कालपिपीठिकाभिर्दशयेत्, दष्टे च तासां कायान्तपहरेन्न शिरांसि, ततः पूर्ववत् सीन्येत संधानं च यथोक्तं कारयेत्, यद्यीमधुकमिश्रया च कृष्णमूदाऽवलिप्य बन्धेनोपचरेत्, ततो निवा-तमागारं प्रवेश्याचारिकमुपदिशेत्, वासयेच्छ्वैत्तैलद्रोण्यां सर्पिद्रोण्यां वा पयोवृत्तिमिति ॥१७॥
बद्धगुद उदर में तथा परिस्त्रावि उदर में रोगी को स्नेहन और स्वेदन देकर, नाभि के नीचे अग्न्यग करके नाभि के वाम वार्श्व में रोमराजी से चार अंगुल बचाकर, चार अंगुल उदर को चीरकर, आँतों को