भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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सप्दशोऽप्यायः

अथातो विसपेनाडीस्तनरोगचिकित्सितं व्याख्यास्यामः । यथोवाच भगवान्‌ धन्वन्तरिः ।॥२॥

अब इसके आगे विसूप-नाडी-स्त्रतरोग- चिकित्खा का

व्याख्यान करेगे- जेसा किं भगवान्‌ धन्वन्तरि ने कदा था।१.२॥

साध्या विसपाखय आदितो ये ध

न सन्निपातक्षतजो हि साध्या । प्रथम तीन वीसपं (बातज, पित्तज,. कफजन्य) . साध्य ह ।

सन्निपातजन्य ओर क्षतजन्थ ये दो वीसपं असाध्य हँ ( इन्द

वीखपं कष्टसाध्य हँ ) ॥ साध्येषु तत्पथ्यगणेर्विदध्याद्‌- घृतानि सेकाश्च तथोपदेहान्‌ ।३॥

खाध्य वीसर्पो मे वातादि दोषों के अपने अपने गणां

(वातादि दोषहर गरणो) से धृत सिद्ध करके, या इन गर्णो से

परिषिक, उपदेह (लेप) आदि कर ॥३॥ मुस्ताशताह्वाुरदारुङुषठ- वाराहिङृस्तुम्बुरुकृष्णगन्धाः |

वातात्मके चोष्णगणाः प्रयोज्याः

सेकेषु टेपषु तथा शतेषु ॥४॥ यत्‌ पच्चमूढ खदु कण्टकाल्य- ्‌

` मल्पं महच्चाप्यथ वर्छिजं च । तच्चोपयोऽ्यं भिषजा भ्रदेहे <

सेके घते चापि तथेव तेे ॥५॥

मोया, सफ, देवदास, कुष्ट, वाराही, धनिया, शोभांजनः, उष्णगण ( मद्रदाग्यांदि ओर पिप्यल्यादि ) इनको वातजन्य

वीसप मे परिषेकः, ठेप ओर घृत मे बरतना चादिये । इसके

खिवाय, कण्टकपंचमूढ, बृहत्पंचमूर, ठधुपंचमूक ओर वल्ठिज

पचमूक इनको वेय लेप मे, पथिकं, घृतम ओर तेल मे ब्रते |[४५॥ कसेरुशङ्गाटकपुद्मग॒नद्राः सरवलाः सोतपख्कदेमाश्च । वश्चान्तराः पित्तकृते विसपं

ख्पा विधेयाः सताः सुजीताः ॥६॥ हीवेरलामजञ्जकचन्द्रनानि ` सोतोजयुक्तामणिगेरिकाश्च । क्षीरेण पिष्टाः सघृताः सुशीता

0 लेपाः प्रयोञ्यास्तनवः सुखाय ॥५॥ परपो मधुकं पयस्या

| म॒न्जिष्ठिका पद्यकचन्दनं च । सुगन्धिका १६ सुखाय रेपः

४] विसप भिषजा प्रयोज्यः |}६॥

न्यग्रोधवगेः परिषेचनं न्च

` ,.„ पूत च यात्‌ स्वरसेन तस्य ।

सरकररिषधरसेश्च सेकान्‌ ॥९॥

सुश्रतसंहितो

॥ 1 थ

६ भण १ कसेर, सिंघाड़ा, कमल, इत्कट, शेषा, कम कीचड़, इनको धी में मिलाकर अतिशय शीतर करके स व्यवधान से पित्तजन्य वसप मँ लेप करना चाहिये | ति खस, चन्दन, खोतांजन, मुक्ता, मणि, गेरू, इनको र पीसकर घी के साथ अतिशय शीतर लेप-पतले करने प्र सुख दायक दोते ह । पौण्डरीक, सुरदटी, विदारी, मंजीठ प्राव चन्दन, सुगन्धिमूल, इनका रेप॒ पित्तज वीसपं प सुख ड लिये बरतना चाहिये । वरगद्‌ आदि क्षीरी इक्षो से परिषिचन करे । बरगद आदि के स्वरससे धृत सिद्ध करकेल्प करे शीतल दूध से ओर ईख के रस से परिषेक करना चाहिये | वक्तव्य--वस््रान्तराः-वस्र के ऊपर ठगाकर व्रण प्र लगा अथवा त्रण पर पतला वस्र रखकर लेप करे जिससे उतारे सुगमता रहे । तनुख्ेप-“श्छचणशुष्कधनो लेपश्चन्दनस्याि

दाहकृत्‌ । त्वग्गतस्योष्मणो रोधात्‌ शीतछृच्चान्यथाऽगुरोः |"

चरक । इसलिये पतला लेप करे ।॥६-६॥

घृतस्य गोरीमधुकार विन्द रोधाम्बुराजादनगेरिकेषु

तथाषभे पद्मकसारिवासु काकोलिभिदाङ्खयुदोप्षु |

सचन्दनायां मधुशकरयायां द्राक्षास्थिराप्रहिनिशताहयासु । कल्कोचरतासरुदकमत्र दत्तवा

न्यभ्रोधवगेस्य तथा स्थिरादेः ॥११॥

गणस्य (बिट्वादिकपच्चमल्या-

श्चतुगेणं क्षीरमथापि तद्वत्‌ ।

प्रस्थं विपक्रं परिषेचतेन | पत्तीनिहन्यात्त्‌ विसपेनाडोः ॥१२॥

विस्फोटदुष्ट्रणशीषेरोगान्‌

पाकं तथाऽऽस्य्य निहन्ति पानात्‌ ¦

ग्रहादिंते शोषिणि चापिबठे घतं हि गोयदिकमेतदिष्टम्‌ ॥५॥. , गोर्थादिषृत--यृत एकं प्रस्थ, कल्क द्रव्य ल्द ह!

कमल, लोध, वालक, खिरनी, गेरू, ऋषमक्र; प्ल, धा

काकोली, मेदा, कुमुद, नीला कमठ, चन्दन मधु ।

द्राक्षा, याल्पर्णी, पर्निपर्णी, सौफ; क्वाथ द्रव्य ्ुग्रोधा त

का क्वाथ, ब्रहरपंचमूक का क्वाथ ओर गाय का द नड धृत पाकं करे । इस धृत के परिषेक से पित्तज (द पुव. ` शान्त होती दै । विस्फोट दुष्ट रण्‌, शीषैरोग (शिरोरोग) तग

पाक इसके पान से नष्टहोताहै। गुद से पीतः ध # बालक मे भ यह्‌ गौर्यादिधृत का है ॥१०-१२॥ अजाऽधगन्धा सरा सकाढा > सैकेविका चाप्यथवाऽजश्ङ्गी ।

गोमूत्तपिष्टो विहितः प्रदेहो . स्म्‌ ॥१॥ ।

` हन्याद्विस्रप कज सुख