सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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चिकित्सास्थानम्
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कालानुसार्यगुरुचोचगुज्जा- रास्तावचागीतशिवेन्द्रपण्यः ।
पालिन्दमुखातमहीकदम्बा
हिता विसर्पणु कफात्मकेषु ॥१४॥
अजगन्धा (इक्षु), अश्वगन्धा, सरला (त्रिदुल या सरल-काष्ठ), काला (कालानुसारिवा या कासमर्द—इल्हण), एकै-बिका (शतावरी), अज्यशृङ्गी (कर्कटशृंगी या मैद्वासिगी), इनका गोमूत्र में किया प्रत्येक कफजन्य वीसर्प को शीघ्र नष्ट कर देता है। कालानुसारिवा, अगरू, दाहचोनी, रत्ती वेल की जड़, रास्ता, वच, शीतशिव (शतपुष्पा भेद-इल्हण, कपूर या कन्दन) इन्द्रवाकूनी, पालिन्दी, (निशोथ), मुज्जात, भूकदम्ब, ये कफजन्य वीसर्प में हितकारी हैं ॥१४॥
गणस्तु योज्यो वरुणप्रवृत्तः
क्रियासु सर्वासु विचक्षणेन ।
संशोधनं शोणिनमोक्षणं च
श्रेष्ठं विसर्पणु चिकित्सितं हि ॥१५॥
सर्वांश्च पक्वान् परिशोध्य धीमान्
व्रणक्रमेणापचरेद्यथोक्तम् ।
वरुणादिगण का प्रयोग कुशल वैद्य सब क्रियाओं में करे। संशोधन, रक्तमोक्षण, ये सब वीसर्पों में उत्तम चिकित्सा है। सब विसर्पों में पाक होने पर इनका शोधन करके बुद्धिमान् वैद्य यथोक्त विधि से व्रण चिकित्सा करे।
वक्तव्य—विसर्प में रक्तमोक्षण का महत्त्व—“यानोहोक्तानि कर्माणि विसर्पानि निवृत्तये । एकतस्तानि सर्वाणि रक्तमोक्षण-मेकतः । विसर्पों न ह्यसंस्थुष्टो रक्तपित्तन जायते ॥” चरक-वि० अ० २१।१४१ । विसर्प में जाँच से रक्तमोक्षण करवाना उत्तम है। अलाबु और सींगी का उपयोग ठीक तरह से नहीं हो सकता ॥१६॥
नाडी त्रित्वे प्रभवान् न सिध्ये-
च्छेपाश्चतस्तः खलु यत्नसाध्याः ॥१७॥
तत्रानिलोत्थासुपनाह्य पूर्व-
मशेषतः पूयगतिं बिदार्य ।
तिलैरपामार्गफलैश्च पिष्टा
ससैन्यवैर्बन्धनमत्र कुर्यात् ॥१८॥
प्रशालने चापि सदा व्रणस्य
योज्यं महद्यत् खलुपञ्चमूलम् ।
हिंसा हरिद्रां कदुकां बलां च
गोजिह्विकां चापि सविल्वमूलाम् ॥१९॥
संहृत्य तैलं विपचेद् व्रणस्य
संशोधनं पूरणरोपणं च ।
सन्निपात जन्य नाड़ी अच्छी नहीं होती शेष चार चार नाड़ियों यत्नपूर्वक साध्य हैं, इनमें वातजन्य नाड़ी में सबसे प्रथम उपनाह करके, सम्पूर्ण रूप में पूय के मार्ग को चीरकर
इसमें तिल, चिरचिते के बीज, सैन्यव इन को पीसकर बाँध देवे। व्रण को धोने के लिये सदा ही वृहत्संमूल के क्वाथ का उपयोग करना चाहिये। क्षिण्डी, हल्दी, कुटकी, बला, गजवाँ और विल्व मूल इनको लाकर इनसे तैल सिद्ध करे। यह तैल व्रण का शोधन करनेवाला और व्रण को भरनेवाला एवं रोहण करनेवाला है। (यहाँ पर तैल पाक में जल तैल से चार गुणा मिलाना चाहिये-अनुत्के द्रवकार्यं तु सर्वत्र सलिलं स्मृतम्) ॥
पित्तात्मिकां प्रागुपनाह्य धीमान्-
त्कारिकाभिः सपयोघृताभिः ॥२०॥
निपात्य अक्षं तिलनागदन्ती-
यध्याह्विकल्केः परिपूरयेत्ताम् ।
प्रशालने चापि ससोमनिम्बः
निशा प्रयोव्या कुशलेन नित्यम् ॥२१॥
पित्तजन्य नाड़ी में बुद्धिमान् मनुष्य उत्कारिका (लपसी)
एवं दूध और घी से प्रथम उपनाह करके—इसमें शस्त्र से चीरा देवे। पीछे से तिल, नागदन्ती (दन्ती), और मुल्लैहटी के कल्क से इसको भर देवे। इस नाड़ी के धोने के लिये सोम (विट्टु खैर) नीम और हल्दी, इनका क्वाथ कुशल वैद्य नित्य बरते। (सोम का अर्थ कटफल जैजट ने किया है) ॥२०, २१॥
श्यामात्रिभण्डोत्रिकलासु सिद्धं
हरिद्रयो रोधकवृक्षयोश्च ।
घृतं सदुर्ध्वं व्रणतर्पणेन
हन्त्याद् गतिं कोष्ठगात्सपि या स्यात् ॥२२॥
काली निशोथ, निशोथ, त्रिफला, हल्दी, दाहहल्दी, लोघ, कुटज, इनके साथ दूध में सिद्ध किया घृत व्रण मे भरने से कोष्ठ में स्थित नाड़ी को भी नष्ट करता है ॥२२॥
नाडीं कफोत्थासुपनाह्य सम्यक्
कुलुत्थसिद्धार्थकशकुकिण्वैः ।
मुद्भूक्तामेध्य गतिं विदित्वा
निपातयेच्छ्वक्षमशेषकारी ॥२३॥
दद्याद् व्रणे निम्बतिलान् सदन्तोन्
सुराष्ट्रजासैन्यवसंप्रयुक्तान् ।
प्रशालने चापि करञ्जनिम्ब-
जात्यक्षपीलुस्वरसाः प्रयोव्याः ॥२४॥
सुवर्चिकासैन्यवचित्रकेषु
निकुम्भतालौनलरूपिकासु ।
फलेष्वपामार्गभवेषु चैव
कुर्यात् समुत्रेषु हिताय तैलम् ॥२५॥
कफजन्य नाड़ी में कुलुत्थी, सरसों, सतु, और किण्व इनसे भली प्रकार उपनाह करके, इसे कोमल बना ले। फिर ऐषणी से इसके मार्ग को जानकर—सम्पूर्णरूप में शस्त्र से इसको चीर देवे। व्रण में नीम के पत्ते, तिल, दन्ती (जमालगोटा की जड़),