भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० १७ ]

सुराष्ट्रा (फिटकरी या गेरु), और सैन्य इन्को मिलाकर भर देवे । इसको धोने के लिये करंज, नोम, चमेली, बहेड़ा, पीलु, इनका स्वरस बरतना चाहिये । सुवर्चिका (हुलहुल), सैन्य, चित्रक, दन्ती, तालीनल (मूसली मूल), आक, चिरचिते का बीज, इनसे गोमूत्र में तैल सिद्ध ब्रण में लगावे ॥२३-२५॥

नाडीं तु शल्यप्रभवां विदुर्ग्यं निर्हृत्य शल्यं प्रविशोध्य मार्गम् ।

संशोधयेत् श्लोद्गुतप्रगाढै- स्तिलैस्ततो रोपणमाशु कुर्यात् ॥२६॥

कुम्भीकखर्जूरकपित्तबिल्व- वतस्पनौनां च शलादुवर्गैः ।

क्त्वा कषायं विपचेत् तैल- मावाप्य मुस्तासरलाप्रियङ्गः ॥२७॥

सुगन्धिकामोचरसाद्विपुणं रोधं विदध्यादपि धातकीं च । एतेन शल्यप्रभवा तु नाडी

रोहेद् ब्रणो वा सुखमाशु चैव ॥२८॥

शल्यजन्य नाडी का चार कर उसमें से शल्य को निकाल कर मार्ग का शोधन करके (साफ करके), तिलों को मधु और गुत की प्रचुर मात्रा में मिलाकर इसका शोधन करे । शोधन होने के उपरान्त इसका रोपण करना चाहिये । कुम्भीक (स्थलकुम्भी), खर्जूर, कैथ, बिल्व, और बरगद, पीपल, पिलखन, गुलूर, पारसपीपल इनके कच्चे छोटे फल, इनका क्वाथ बनाकर इसमें मुस्ता, सरलकाष्ठ, प्रियंगु, उत्पल, सारिवा, सिम्बल का गोद, नाग केसर, लोथ, धाय के फूल इनके कल्क से तैल सिद्ध करे । यह तैल शल्यजन्य नाडी को और ब्रण को जल्दी ही सुखपूर्वक भर देता है ॥२६-२८॥

कृगदुर्वलभीरूणां नाडीं ममार्शिता च या । क्षारसूत्रेण तां छिन्त्याक्षु तु गस्त्रेण बुद्धिमान् ॥२९॥

एषण्या गतिमन्विष्य क्षारसूत्रानुसारिणीम् । सूचीं निदध्याद् गत्यन्ते तथोज्रम्याशु निर्हरेत् ॥३०॥

सूत्रस्यान्तं समानीय गाढं बन्धं समाचरेत् । ततः क्षारवलं वीक्ष्य सूत्रमन्यत् प्रवेशयेत् ॥३१॥

क्षाराकं मतिमान् वैद्यो यावन्न छिद्यते गतिः । भगन्दरेऽप्येष विधिः कार्या वैद्येन जानता ॥३२॥

अर्बुदादिषु चोक्षिष्य मूले सूत्रं निधापयेत् । सूचीभिर्यवक्त्राभिराचिन्तान् वा समन्ततः ॥

मूले सूत्रेण बन्धीयान्छिन्नं चोपचरेद् ब्रणम् ॥३३॥

कृष, दुर्वल और इरपोक पुरुषों की नाडी को या जो नाडी मर्म में आश्रित हो, उसको शस्त्र से बुद्धिमान् वैद्य न काटे, अपितु क्षार सूत्र से काटे । इसके लिये एषण्या से गति (मार्ग) को दृढ़कर—क्षारसूत्र के साथ साथ सूई को ले जाकर, गति (मार्ग) के दूसरे सिरे पर ऊँचा उठाकर इसको बाहर निकाल

ले । वहाँ पर क्षार सूत्र के सिरे को लाकर कसकर बाँध देवे । फिर क्षार बल को देखकर (यदि क्षार बल कम हो गया हो तो) दूसरा क्षार सूत्र बदल देवे । इस प्रकार बुद्धिमान् वैद्य तक क्षार सूत्र बदले, जब तक कि गति कट न जाये । जाननेवाले वैद्य को चाहिये कि भगन्दर आदि में भी यही विधि वरते । अर्बुद आदि में इनको ऊँचा उठाकर (संदश से खींचकर) जड़ में क्षारसूत्र बाँधे । अथवा जो के समान टेढ़े मुखवाली सूइयों से चारों ओर से इन अर्बुदादि को घेरकर-जड़ में क्षार सूत्र से बाँध देवे । इनके कट जाने पर ब्रण की चिकित्सा करे ।

वक्तव्य-क्षारसूत्र-क्षार में भिगोया सूत्र । अथवा-हल्दी, आक का दूध और थोर के दूध में भली प्रकार भिगोया सूत्र । आजकल घांड़े का बाल भी मस्सों को बाँधने में वरतते हैं । सूइयों को जड़ में डालने का विधान विशाल मूलवाले अर्बुद आदि में हैं । इसमें अर्बुद के कई टुकड़े कर लेते हैं ॥२६-३३॥

या द्विप्रणीयेऽभिहितास्तु वर्त्य- स्ताः सर्वनाडीषु भिषग्विदध्यात् । घोण्टाफलत्वरुवणानि लाक्षा- पूगोफलं चालवर्णं च पत्रम् ॥३४॥ स्तुह्यर्कदुग्धेन तु कल्क एष वर्तीकृतो हन्त्यचिरेण नाडीः ।

विभीतकाश्रियवटप्रवाला हरेणुकागच्छिन्विजीमस्य ॥३५॥ वाराहिकन्दक्ष तथा प्रदेयो नाडीषु तैलेन च मिश्रयित्वा ॥३६॥

धत्तरजं मदनकोद्रवजं च बीजं कोशातकी अकुनसा भुगभोजिनी च । अङ्गोटवीजकुसुमं गतिषु प्रयोज्यं लाक्षोदकाहृतमलासु विकृत्य चूर्णम् ॥३७॥

तथा च गोमांसमसीं हिताय कोष्ठाश्रितस्यादरतो दिग्भन्ति । वर्तीकृतं माक्षिकसंप्रयुक्तं नाडीष्वनमुक्तं लवणोत्तमं वा ॥३८॥ दुष्टव्रणे यद्विहितं च तैलं तत् सर्वनाडीषु भिषग्विदध्यात् ।

चूर्णांकुरैरथ विमिश्रितमेभिरेव तैलं प्रयुक्तमचिरेण गतिं निहन्ति ॥३९॥ एष्वेव मूत्रसहितेषु विधाय तैलं तत् साधितं गतिमपोहति समरात्रात् । पिण्डोतकस्य तु वराहविभात्रितस्य

मलेषु कन्दशकलेषु च सौवहेषु ॥४०॥ तैलं कृतं गतिमपोहति शीघ्रमेतत् कन्देषु चामरवरायुधसाहयेषु । भक्ष्यात्कार्कमरिचैलवणोत्तमेन सिद्धं विडङ्गरजनीद्रयचित्रकैश्च ॥४१॥