सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० १८ ]
प्रमृतिभिः ब्रणः प्रकिलद्यते ॥” उ० त० अ० ६५।११। दूध, उरद आदि के खिलाने से ब्रण पकता है, इसलिये ब्रणरोगी को दूध नहीं देवे ॥४५-४७॥
इति श्रीसुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने विसर्पनाडीस्तन-रोगचिकित्सितं नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥१७॥
अष्टादशोऽध्यायः
अथवा ग्रन्थ्यपच्यवृंदगलगण्डचिकित्सितं व्याख्यास्यामः। यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
अव इसके आगे ग्रन्थि-अपची-अवृंद गलगण्ड चिकित्सा का व्याख्यान करेंगे—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥
ग्रन्थिव्याथामेषु भिषग्विदध्या-
च्छोफक्रियां विस्तरशो विधिज्ञः।
रत्नेद्रुल्लं चापि नरस्य नित्यं
तद्रक्षितं व्याधिबलं निहन्ति ॥३॥
अपक्व ग्रन्थियों में विधि को जाननेवाला वैद्य शोफ चिकित्सा (अपतर्पण से लेकर विरेचन पर्यन्त) को प्रधानतया करे। रोगी के बल की सदा रक्षा करता रहे, रक्षा किया हुआ रोगी का बल रोग के बल को (रोग की तीव्रता को) कम करता है ॥३॥
तैलं पिबेत् सपिरथो द्रव्यं वा
दन्त्वा वसां वा त्रिवृत्तं विदध्यात्।
अपेहिवातादशमूलसिद्धं
वैद्यरुचतुःस्नेहमथो द्रव्यं वा ॥४॥
रोगी, तैल को पीये, या घी को पीये, या इन दोनों को मिलाकर पीये। अथवा इन दोनों में वसा मिलाकर पीये। अथवा इन दोनों में वसा मिलाकर त्रैवृत्त के रूप में इन स्नेहों को पीये। प्रसारिणी और दशमूल से सिद्ध किया तैल, घी या दोनों या चारों स्नेह (घी, तैल, वसा, मर्जा) को पीये।
वक्तव्य—गयी की मान्यता है कि वातजन्य ग्रन्थि में—वातहर क्वाथ सिद्ध तैल पीये। पित्त-मैपित्तहर क्वाथ सिद्ध घृत पीये। कफ में कफहर क्वाथ सिद्ध तैल पीये। संसर्ग-सन्निपात में दो-तीन या चार स्नेहादि से सिद्ध स्नेह पीये ॥४॥
हिंसाऽथ रोहिण्यमृताऽथ भागी
इयोनाकबिल्वगुरुकृष्णगन्धाः।
गोजो च पिष्टा सह तालपञ्चा
ग्रन्थौ विधेयोऽनिलजे प्रलेपः ॥५॥
स्वेदोपनाहान् विविधांश्च कुर्वा-
त्तथा प्रसिद्धान्परार्थ लेपान्।
विदार्थं वा पक्वमपोहा पूर्यं
प्रक्षाल्य बिल्वार्कनरेन्द्रतीयैः ॥६॥
तिलैः सपञ्चाङ्गुलपत्रमिश्रः
संशोधयेत् सेन्धवसंप्रयुक्तैः।
शुद्धं ब्रणं वाऽप्युपरोपयेत्तु
तल्लेन रास्तासरलान्वितेन ॥७॥
बिडङ्ग्यष्टीमधुकाभूताभिः
सिद्धेन वा क्षीरसमन्वितेन।
वातजन्य ग्रन्थि में—झण्टी, कुटकी, गिलोय, भागी, श्योनाक, बिल्व, अगुरु, शोभांजन, गाजवां और मूसली इनको पीसकर लेप करे। इन पर स्वेदन और उगनाह करे। नाना प्रकार के प्रसिद्ध दूसरे लेपों को (मिश्रकोक मातुलुंगादि) लगाये। पकने पर ग्रन्थि को चीरकर पूर्य को निकालकर बिल्व, अमलतास इनके क्वाथ से धोकर तिल, एरण्ड के पत्ते और सेन्धव इनका लेप करके ब्रण का शोधन करे। ब्रण का शोधन नहीं जाने पर रास्ता-सरल गोन्द से मिश्रित तैल से ब्रण को भरे। अथवा—वायविडंग, मुलेहटी, गिलोय और दूध से सिद्ध तैल से ब्रण का रोषण करे ॥५-७॥
जलौकसः पित्तकृते हितास्तु
क्षीरोदकाभ्यां पारपेचनं च ॥८॥
काकोलिर्गर्भस्य च गीतलानि
पिबेत् कषायणि सशर्कराणि।
द्राक्षारसेनेतुरसेन वाऽपि
चूर्णं पिबेद्यापि हररीतकीनाम् ॥९॥
मधुकजम्बुजुनवेतसानां
स्वनिभः प्रदेहानवचारयेत।
सशर्करैर्वा तृणशून्यकन्दै-
दिहादभीदणं मुचुकुन्दजैर्वा ॥१०॥
विदार्थं वा पक्वमपोहा पूर्यं
धावेत् कषायेण वनस्पतीनाम्।
तिलैः सयष्टीमधुकैर्विशोध्य
सर्पिः प्रयोज्यं मधुरैर्विपक्वम् ॥११॥
पित्तजन्य ग्रन्थियों में जौक का लगाना और दूध और जल से परिषेचन करना उत्तम है। काकोल्यादिगण के शीतल कषायों में शर्करा मिलाकर पीये। हरड के चूर्ण को द्राक्षारस से या गन्ने के रस के साथ पीये। महुआ, जामुन, अर्जुन और अम्लवेतस इनकी छालों से लेप करे। केवडे की शर्करा में मिलाकर उससे या मुचुकुन्द (मुचुलुन्द) से लेप बार-बार करे। पक जाने पर ग्रन्थि को चीरकर, सब पूर्य निकालकर बरगद, पीपल, गूलर इनके कषायों से इसे धोये। तिल, मुलेहटी के लेप से ब्रण का शोधन करके, काकोल्यादि वर्ग में सिद्ध घृत का उपयोग करे ॥८-११॥
हतेषु दोषेषु यथांनुपूर्या
ग्रन्थौ भिषक् श्लेषसमुत्थिते तु।
स्विम्रस्य विम्लापनमेव कुर्वा-
दकुष्ठलोहोपलवेषुदण्डैः ॥१२॥