सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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चिकित्सास्थानम्
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विकृता रंगवधकाकणन्ती- काकादनीतापसवृक्षमूलैः ।
आलेपयेत् पिण्डफलाकंभार्गी कारञ्जकाठामदनेत्र विद्वात्र ॥१३॥
कफजन्य ग्रन्थि में वैद्य स्नेहन-स्वेदन के क्रम से वमन, विरेचन, आस्थापन, शिरोविरेचन, रक्तमोक्षण से कफ, पिच, वात दोषों को निकाल देने पर रक्तमोक्षण के उपरान्त स्वेदन करके अंगठे, लोह, पत्थर, बांस के ढण्डे से विम्लापन करे । विकृक्त (वैकङ्गा), अमलतास, रत्ती, काकादनी (कौआटू टी-बायस तिन्दुका), इंगुदी इनकी जड़ से, पिण्डफल (तिकालाखु इल्हण), आक, भार्गी, करंज, काळा (कनुहिखा या काला-नुगारी), मेनफल इनसे कुशल पुरुष लेप करे ॥१२, १३॥
अमर्जनार्तं शमसप्रयान्त- मपकवमेवापहरेद्विदार्थ ।
द्वहेतु स्थिते चास्तुजि सिद्धकर्मा सद्यः क्षतोक्तं च विधिं विद्धयात् ॥१४॥
जो ग्रन्थि मर्म में उत्पन्न न हुई हो, और उपयुक्त विकित्सा से शान्त न होती हो, उसे अपकवावस्था में चीरकर निकाल देवे । कुशल वैद्य इसको जलाये और रक्त के बन्द होने पर सद्यः क्षत में कही विधि को करे ।
वक्तव्य—“संशोधिते स्वेदितमश्मकाष्ठैः सांगुष्ठदण्डैर्विलयेद-पक्वम् । विपाक्ष्य चोदुष्ट्य भिषक् सकोर्ष शस्त्रेण दग्ध्वा व्रण-वचिकित्सेत् । अदग्ध ईषत् परिशेषितश्च, प्रयाति भूयोऽपि शनैर्विदुहिम् । तस्मादशेषः कुष्ठलैः समन्तात् छेद्यो भवेद् वीक्ष्य शरीरदेशान् ॥” चरक चि० अ० ॥१२-१४॥
या मांसकन्धाः कठिना बृहत्स- स्तास्त्रेष योज्यश्च विधिर्विधिज्ञैः ।
श्लेषण वाऽऽपाक्ष्य सुपक्वमाशु प्रक्षालयेत् पथ्यतमैः कषायैः ॥१५॥
संशोधनैस्तं च विशोधयेत् क्षारोत्तरेः क्षौद्रगुडप्रगाढैः ।
गुड्डे च तैलं त्वचचारणीयं विडङ्गपाठारजनीविपक्वम् ॥१६॥
शरीर में जो मांसकन्दी कठिन और बड़ी हो, उनमें भी विधि को जाननेवाला वैद्य यही विधि बरते । भली प्रकार मांसकन्दी को शस्त्र से शीघ्र ही चीरकर, कफोत्थव्रणहर कषायों से धोये । यवक्षार प्रधान मधु, और गुड्ड का लेप करके इन संशोधनों से इसका शोधन करे । शोधन हो जाने पर विडंग, पाठा, इल्हदी से पकाये तैल को लगाता चाहिये ।
वक्तव्य—अमर्जन्य मांसकन्दी में ही शस्त्र से पाटन है । मर्मजन्य ग्रन्थि में औषधियों से दारण करे ॥१५, १६॥
मेदःसमुत्थे तिलकलकदिग्धं
दृक्वोपरिष्टाद् द्विगुणं पटान्तम् ।
हुताशतमैन सुहुः प्रमुञ्च्या ल्लोहेन धौस्नानदहनं हिताय ॥१७॥
प्रलिप्य दार्वामथ लाक्षया वा प्रतमया स्वेदनमस्य कार्यम् ।
निपात्य वा अक्षमपोह मेदो द्वहेतु सुपक्वं त्वथवा विदार्थ ॥१८॥
प्रक्षाल्य मूत्रेण तिलैः सुपिष्टैः सुवर्चिकायैर्हितालमिश्रेः ।
ससैन्यचैः क्षौद्रघृतप्रगाढैः क्षारोत्तरेनमभि प्रशोध्य ॥१९॥
तैलं विद्ध्याद् द्विकरञ्जगुञ्जा- वंशावलेखिदुग्धमृसिद्धम् ।
मेदोजन्य ग्रन्थि में तिलकल का लेप करके, इसके ऊपर दुहरा कण्डा रख देवे । फिर अग्नि में गरम किये लोहे से इसको बार-बार स्पर्श करे, परन्तु त्वचा को जलने न देवे (मेद ही पिघले) । अथवा कङ्कड़ी पर लाख लगाकर इसको गरम करके इससे स्वेदन करे । अथवा शस्त्र से चीरकर मेद को निकालकर जलाये । अच्छी प्रकार पकी हुई को चीरकर गोमूत्र से धोकर, अच्छी प्रकार पिते तिल, सुवर्चिका, यवक्षार, इरताल, सैन्य, मधु और घृत एवं क्षार प्रधान द्रव्यों से इसका शोधन करके, करंज, नाटाकरंज, रत्ती, बांस की छाल, हिंगोट और गोमूत्र में सिद्ध तैल बरते ॥१७-१९॥
जीमूतकैः कोशवतीफलैश्च दन्तीद्रवन्तीत्रिवृत्तासु चैव ॥२०॥
सर्पिः कृतं हन्त्यपचीं प्रवृद्धां द्विधा प्रवृत्तं तदुदारवीयम् ।
निर्गुण्डजातीवरिहिष्ठयुक्तं जीमूतकं माक्षिकसैन्यवाळ्यम् ॥२१॥
अभिप्रतप्तं वमनं प्रगाढं दुष्टापचीपूतममादिशन्ति ।
कैटर्ब्यभिम्बीकरवीरसिद्धं तैलं हितं मूर्धोविरेचनं च ॥२२॥
शाखोटकस्य स्वरसेन सिद्धं तैलं हितं नत्यविरेचनेषु ।
मधुकसारश्च हितोऽवपीडे फलानि शिप्रोः खरमञ्जरेर्वा ॥२३॥
जीमूतक (देवदाली), कोशातकीफल (कडुवी तुम्बी), दन्ती, द्रवन्ती (मोगलई एरण्ड) और निशोध (इनकी जड़) इनसे सिद्ध किया घी बड़ी हुई अपची को दोनों मार्गों से (वमन विरेचनसे) दोषों का हरण करके नष्ट करता है । यह घृत उत्कृष्ट शक्ति का है । निर्गुण्डि (सम्भाळ), चमेली, बरिहिष्ठ (बालक), जीमूतक (देवदाली), मधु और सैन्य प्रचुर मात्रा में मिलाकर गरम करके दिया हुआ वह वमन, (बड़ी मात्रा में) दुष्ट अपचियों में