भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुभक्तसंहिता

[ अ० १८

उत्तम कहा जाता है। वकायन, कन्दूरी, कनेर इनके कल्क से सिद्ध किया तैल (द्रव स्थान में जल) शिरो विरेचन में उत्तम है। शालोटक के स्वरस में सिद्ध किया तैल नस्य विरेचन में उत्तम है। महुआ का सार, शोभांजन के फळ या चिरचिते के फलों को गरम पानी से पीसकर अवपीड़न नस्य देना चाहिये ॥ ग्रन्थीनसर्मप्रभवानपक्वा-

तुदधृत्य चाग्निं विदधीत पश्चात् ।

क्षारेण वाडपि प्रतिसारयेत्

संखिल्य श्लोणे यथोपदेशम् ॥२४॥

सर्मस्थान से अतिरिक्त स्थानों में उत्पन्न अपक्व ग्रन्थियों को निकाल देना चाहिये। अथवा क्षार से इनका प्रतिसारण करे-घिसे। कहे अनुसार शब्द से लेखन करके क्षार से घिसे ॥

पार्णि प्रति द्वे दश चाङ्कुलानि

भित्वेन्द्रवस्ति परिवर्ज्य धीमान् ।

विदायं मत्स्याण्डनिभानि वैद्यो

निष्कृष्य जालान्यनलं विदध्यात् ॥२५॥

आ गुल्फकर्णात् सुमितस्य जन्तो-

स्तस्याष्टभागं खुदकाद्विभज्य ।

घोणजुर्वेधः सुरराजबस्ते-

द्विंवाक्षिमात्रं त्वपरे वदन्ति ॥२६॥

पार्णि (एड़ी) से लेकर पिण्डली में बारह अंगुल मापकर वहाँपर इन्द्रवस्ति सर्म को बचाकर वैद्य चौरा देवे। इस स्थान पर मछली के अण्डे के समान (आपस में जुड़े), जो जाल (शिरोओं का गुच्छा) हो उसे निकालकर जला देवे। दूसरे आचार्य कहते हैं कि-गुल्फ के कर्णभाग से लेकर घुटने तक माप करके, उस माप का आठवाँ भाग खुड़ (गैर और जंघा की संधि) स्थान से छोड़कर इन्द्रवस्ति सर्म को नेत्र के बराबर (दो अंगुल) बचाते हुए नासिका के समान सीधा वेधन करना चाहिये।

वक्तव्य—इन्द्रवस्ति सर्म-जंघा के मध्य में हैं, यथा-त्रयो-दशांगुले पार्णि प्रति कालान्तरासुहृत्। इन्द्रवस्तिरघुक्खावी मांसगोडधोङ्कुले भवेत् ॥ इन्द्रवस्ति यद्यपि आधा अंगुल है, तथापि यहाँ दो अंगुल बचाने को कहा है। भोजन—

“वातपित्तकफाष्ट्रदामेदश्चापि समाचितम् ।

जंघयोः कण्डरां प्राप्य मत्स्याण्डसहशान् बहून् ॥

कुर्वन्ति ग्रन्थीन् यस्तेभ्यः पुनः प्रकृपितोऽनिलः ।

दोषेस्तेरुर्वयो वक्षःकक्षामन्यागलाश्रितः ॥

नानाप्रकारान् कुरुते ग्रन्थीन् सा त्वपची मता ।

व्याभिश्रदोषोलसां तु कुच्छुत्वाघ्यां विनिर्दिशेत्” ॥२५, २६॥

मणिबन्धोपरिष्टाद्धा कुर्पद्रेखात्रयं भिषक् ।

अङ्कुल्यन्तरितं सम्यगपचोत्तां निवृत्तये ॥२७॥

अथवा मणिबन्ध (कलई) के ऊपर वैद्य तीन रेखायें एक एक अंगुली के अन्तर से, अपचियों की निवृत्ति के लिये करे। (कक्षा, कूर्प, सन्धिगत अपचियों में बाहु में कर्म करे) ॥२७॥ चूर्णस्य काले प्रचलाककाकगोधादिकूर्पमप्रभावं मसीं तु। दद्याच्च तैलेन सहैङ्कुदीनां यद्वद्वयते स्त्रीपदिनां च तैलम् ॥ विरेचनं धूमसुपाददीत भवेच्च नित्यं यवमुदभोजी ।

रोपण काल में—मोर, कौवा, गोह, साँप, कछुआ इनकी मसी (राख क्षार) को हिंगोट के तैल के साथ देवे। वैद्यनिक धूम का प्रयोग करे। नित्य प्रति जो और मूंग का भोजन करे।

कर्कारुक्कैवारुक्कनारिकेलप्रियाळपञ्चाङ्कुलबीजचूर्णः ॥२८॥

वातातुर्द क्षीरघृतान्मुसिद्धैरुष्णैः सतैलैरपनाह्येतु ।

कुर्वाच्च मुख्यान्युपनाहनानि सिद्धैश्च मांसैरथ वेसवारैः ॥

स्वेदं विदध्यात् कुशलस्तु नाड्या

श्रृङ्गेण रक्तं बहुशो हरेरुच ।

वातघ्ननिर्युहपयोम्लभागैः

सिद्धं शताख्यं त्रिवृतं पिबेद्वा ॥३१॥

कर्कारु (कूम्भाण्ड), एर्वाक्क (ककड़ी), नारियल, चिरौंजा, एरण्ड इनके बीजों के चूर्ण से दूध और घृत के साथ सिद्ध करके रक्तपित्त का अनुबन्ध होने पर वातातुर्द पर उपनाह करे। शुद्ध वातातुर्द में तैल युक्त गरम गरम उपनाह करे। मांस एवं वेसवार से सिद्ध किये मुख्य उपनाह (साल्वण आदि) बरते। कुशल वैद्य नाड़ी से स्वेद करे, और श्रृङ्ग से बार-बार रक्त मोक्षण करे। देवदारु आदि वातघ्न द्रव्यों के क्वाथ दूध और कांजी में तैल का शतपाक करके पीये। अथवा घृत, तैल, वसा इस त्रिवृत स्नेह को पूर्वोक्त वातहर द्रव्यों के क्वाथ, दूध, कांजी में सिद्ध करके पीये।

वक्तव्य—शतधा पाक—तैल का एक बार पाक करके फिर इसी तरह एक सौ बार करे। इत्थहण की मान्यता है कि शतधापतानक विधि से (चि० अ० ५। १८) करे ॥२८-३१॥

स्वेदोपनाहा सूदस्तु कार्याः

पित्तातुर्दे कायविरेचनं च ।

विधुष्य चोदुम्बरशकगोजी-

पत्रैर्भृशं क्षौद्रयुतैः प्रलिम्पेत् ॥३२॥

श्लक्ष्णीकृतैः सज्जरसप्रियङ्कु-

पत्तङ्गरोध्राञ्जनयष्टिकाहैः ।

विस्वाज्य चारग्वधगोजिसोमाः

श्यामा च योज्याः कुशलेन लेपे ॥३३॥

श्यामागिरिद्वाञ्जनकीरसेषु

द्राक्षासरे समल्लिकारसे च ।

घृतं पिबेत् क्लीतकसंप्रसिद्धं

पित्तातुर्दो तज्जठरो च जनतुः ॥३४॥