सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 517, कुल 872 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १८१ ]
चिकित्सास्थानम्
४६१
पित्तायुद्ध में—स्वेदन, उपनाह, ये कोमल रूप में करे, अर्थात् द्रवस्वेद देवे, काकोल्यादि मृदु द्रव्यों से बन्धन करे, इनको दूध और अम्ल में पीसकर बहुत गरम न बाँधे विरेचन भी मृदु ही देवे । गूळर, सागौन, गाजवाँ इनके पत्तों से अर्बुद को रगड़कर इस पर राल, प्रियंगु, लाल चन्दन, लोथ, अंजन (सुरमा) और मुलेहठी इनको चूर्ण करके मधु में मिलाकर बहुत बार लेप करे । रक्त निकालकर अमलतास, गाजवाँ, कटफल और काली निशोथ इनका लेप लगाये । काली निशोथ, गिरिहा (श्वेतस्थन्द), अंजन की (नीलाञ्जनिका का शरदः ऋतु का फल) इनके क्वाथ में और द्राक्षारस में तथा सतलिका (यवतिका) के रस में मुलेहठी के कल्क से सिद्ध किया घृत पित्तायुद्ध रोगी और पित्तोदरी पीये ॥३२-३४॥
शुद्धस्थ जन्तोः कफजेऽर्बुदे तु रक्तोऽवसक्तिं तु ततोऽर्बुदं तत् । द्रव्याणि यान्यूर्ध्वमधश्च दोषान् हरन्ति तैः कल्ककृतैः प्रदिद्यात् ॥३५॥ कपोतपारावतविड्विभिश्चैः सकार्त्थनीलैः शुक्लाङ्गुल्लास्थैः । मूत्रैस्तु काकादनिमूलभिश्चैः क्षारप्रदिग्धैरथ वा प्रदिद्यात् ॥३६॥
वमन से शुद्ध हुए कफायुद्ध रोगी का रक्त ( अलाबु से ) निकालकर अर्बुद पर अपची में कहे ऊर्ध्व और अधः मार्ग (वमन-विरेचन) से दोषों को निकालनेवाले द्रव्यों के कल्क से (जीमूतक, घोषवती, दन्ती, द्रवन्ती, त्रिवृत आदि ), लेप करे । कृत्तूर की बीट, पारावत की बीट, काँसी की स्याही, शुक् (प्रन्यपण), कलिहारी, काकादनी का मूल इनको मूत्र में पीसकर लेप करे । अथवा क्षार में मिलाकर लेप करे । ( अथवा कृत्तूर की बीट आदि को क्षारोदक में मिलाकर लेप करे ) ।
वि० मन्तव्य—कांस्थनील—काँसा के पात्र में मण्डा (गो का तक) डालकर धूप में घर दिया जाता है २-३-५ ७ दिन में वह नीलवर्ण का होकर सूख जाता है । इसको "जंगाल" कहते हैं । यह "तृत्तिया" का ही एक प्रकार है और उसीके समान लेखन होता है, परन्तु उससे कुछ मृदु होता है । काँसा, ताम्र एवं यशद का मिश्रण है ॥३५,३६॥
निष्पावपिण्याककुलथकल्कैः मार्सप्रगादैर्दधिमस्तुयुक्तैः । लेपं विद्ध्यात् क्रमयो यथाऽत्र मूर्च्छन्ति मुखन्तथ्य मक्षिकाश्च ॥३७॥ अल्पावशिष्टे क्रमिभक्षिते च लिखेततोऽग्निं विद्धीत पश्चात् ।
यदल्पमूलं त्रपुताम्रसीस- पट्टैः समावेष्ट्य तदायसैर्वा ॥३८॥ क्षारानिगच्छाण्यसक्रुद्धिदध्यात् प्राणानहिंसन् भिषगप्रमत्तः । आस्फोतजातीकरवीरपत्रैः
कपायमिष्टं ब्रणशोधनार्थम् ॥३९॥ शुद्धे च तैलं विद्धीत भागीर्विड्वन्नपाठात्रिफलाविपक्म । यहच्छया चोपगतानि पाकं पाकक्रमेणोपचरेद्विधिः ॥४०॥
सेम, खली (या तिलकल्क), कुलथी इनका कल्क, मांस, दही, मस्तु इनको अच्छी तरह मिलाकर अर्बुद पर लेप करे । इस लेप से खोंचकर मखिल्याँ इस अर्बुद पर गिरेंगी और वहाँ अण्डे और कृमि उत्पन्न हो जायेंगे । कीड़े जब इस अर्बुद को खा जायें, थोड़ा बचें, तब इसका लेखन करके अग्नि से इसको जलाये । जिस अर्बुद का मूल छोटा हो, उसे रॉगा, ताम्र, सीसा, या लोहा इनके पतरे से चारों ओर से घेरकर इस अर्बुद पर क्षार, अग्नि या शस्त्र कर्म बार-बार वैद्य सावधानी से करे, परन्तु प्राणों को नुकसान न होने देवें । साखि, चमेली, कनेर इनके पत्तों का क्वाथ ब्रण के धोने के लिये उत्तम है । ब्रण के शुद्ध हो जाने पर भागी, विडंग, पाठा, त्रिफला से पकाया तेल बरते । जो अर्बुद अचानक चोट आदि के कारण पक जायें उनमें विधि को जाननेवाला वैद्य पाक की चिकित्सा बरते ।
वि० मन्तव्य—यद्यपि कफज अर्बुद पकता नहीं है, परन्तु "न रोगोऽप्येकदोषजः" के अनुसार, अथवा यों ही पक जाय तो अर्बुद पर पच्छ लगाकर लेप करके उस पर मक्षिका बैठने दो और प्रतीक्षा करो कि कोई किरौनी मक्षिका (पड़ाब में इस मक्षिका को "हाई" कहते हैं ) आकर बैठे । यह हरे वर्ण की होती है, इसे बैठने दो, यह श्वेत-श्वेत बहुत ही सूक्ष्म अण्डे देती है, २४ या २६ घण्टा में कृमि प्रत्यक्ष हो जाते हैं । इन कृमियों को चरकरंहिता वि० स्था० अ० ७ में—जन्तुमातर-श्रेति । ११ । अर्थात् जन्तुमाता कहा है—जन्तु है माता जिनकी । कृमि मक्षित ब्रण का रोपण बहुत ही शीघ्र हो जाता है । इनके विनाश का उपाय है—तृत्तिया के द्रव से अथवा तुलसीपत्र के द्रव से प्रक्षालन ॥३७-४०॥
मेदोर्बुदं स्विन्नमथो विदार्थं विशोध्य सीन्येद्गतारक्तमाशु । ततो हरिद्रागृहधूमरोधपत्तङ्गचूर्णैः समनःशिलालैः ॥४१॥ व्रणं प्रतिम्राह्य मधुप्रगाढैः करञ्जतैलं विद्धीत शुद्धे । सशेषदोषाणि हि योऽर्बुदानि करोति तस्याशु पुनर्भवन्ति ॥ तस्मादशेषाणि समुद्धरेतु हन्तुः सशेषाणि यथा हि बहिः ।