सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० १८ ]
मेदोवृद्ध में स्वेदन करके इसको चीरकर इसका शोधन करे। रक्त बन्द हो जाने पर इसको सी देवे। इसके पीछे हल्दी, घी का घुँवासा, लोध, चन्दनकाष्ठ, मैनसिल, हरताल, इसके चूर्ण को मधु में भली प्रकार मिलाकर व्रण पर रगड़े। शोधन हो जाने पर विद्रधि में कहा करज तैल बरते। क्योंकि दोष के रह जाने पर अबुद्ध फिर से उत्पन्न हो जाते हैं। इसलिये अबुद्धों को सम्पूर्ण रूप में बाहर निकाले। जैसे कि आग सम्पूर्ण नष्ट करती है, उसी प्रकार इनको जड़ समेत नष्ट करे।
वक्तव्य—“प्रत्यिर्महान् मांसभस्वस्वन्तिर्मिदोभवः स्तिग्ध-तमश्चलश्च। विपाक्ष्य चोदधृत्य भिषक् सक्रोशं शस्त्रेण दग्धवा ब्रणवचिकित्सेत्।” चरक० वि० अ० १२-२८।
वि० मन्तव्य—अबुद्ध का थोड़ा भी मूल अवशिष्ट रह जाने पर वह पुनः बढ़ जाता है और वह कभी अच्छा नहीं होता, कुछ दिन में उसी से रोगी की मृत्यु हो जाती है। ॥४१,४२॥ संस्रवेद्य गण्डं पवतोथमादौ नाच्छ्याडन्तिलक्ष्नीषधपत्रभङ्गेः॥
अम्लैः समूत्रैर्विविधैः पयोभि- रुणैः सतैलैः पिशितैश्च विद्वात्र। विस्त्रावयेत् स्विन्नमतन्द्रितश्च
शुद्धं व्रणं चाप्युपनाहयेत् ॥४४॥ शण्णातसीमूलकशिमुक्किण्वप्रियालमज्जातुयुवेत्तिलैस्तु। कालामृताशिप्रुपुनर्तवाकैंगजादिनामाकरहाटकुष्ठैः ॥४५॥ एकैषिका वृक्षकतिलकैश्च सुराम्लपिष्टैरसङ्कृतं प्रदिद्यात्। तैलं पिवेच्चामृतवस्त्रिनिम्ब-
हंसहृष्यवृक्षकपिप्पलीभिः। सिद्धं बलाभ्यां च संदेवदारु हिताय नित्यं गलगण्डरोगे ॥४७॥
वातजन्य गण्ड में वैद्य वातनाशक (एरण्ड आदि) द्रव्यों के पत्तों से नाड़ी द्वारा स्वेद देवे। पिचावृत वायु में कांजी से, कफावृत में मूत्र क्वाथ से, रक्तावृत वायु में मांस के साथ, तैल मिलाकर गरम स्वेदन हो जाने पर बिना आलस्य के विद्वात्र जोड़ आदि से रक्तमोक्षण करे। रक्त हरण से शुद्ध हो जाने पर सन, अलसी, मूली, सुहांजना, किण्व, (सुराबीज), गिलोय, सहजन, पुनर्नवा, आक, गजपिप्पली, मैनफल, कुष्ठ, एकैषिका (पाठा), कुटज, तिलक, इनको सुरा और कांजी में पीसकर बार-बार लेप करे। गिलोय, नीम, हंसराज, कुटज, पिप्पली, बला, देवदारु इनसे सिद्ध किया तेल गलगण्ड रोग में नित्य हितकारी है ॥४३-४७॥
स्वेदोपनाहैः कफसंभवं तु संस्रवेद्य विस्त्रावणमेव कुर्यात्। ततोऽजगन्धातिविषाविशाल्या- विषाणिकाकुष्ठशुकाहृष्याभिः ॥४८॥
पलाशभस्मोदकपषिताभि- दिद्यात् सुगुञ्जाभिरशीतलाभिः। दशार्धसङ्ख्यैर्लैवणैश्च युक्तं
तैलं पिवेन्मागधिकादिसिद्धम् ॥४९॥ प्रच्छर्द्वर्नं मूर्धविरैचनं च धूमश्च वैरैचनिको हितस्तु। पाकक्रमो वाडपि सदा विधेयो वैद्येन पाकङ्कृतयोः कथञ्चित् ॥५०॥
कफजन्य गलगण्ड में स्वेदन और उपनाह करके इसको स्वेद देकर रक्तमोक्षण ही करना चाहिये। फिर अजगन्धा, अतीस, कलिहारी, मेदुाखिगी, कुष्ठ, शुक्रनास, रत्नियां इनको पलाश खारोदक में पीसकर, गरम करके लेप करे। पाँचों नमक के साथ, पिप्पली आदि गण के क्वाथ और कल्क से सिद्ध किया तेल पीये। वमन, शिरोविरैचन, वैरैचनिक धूम, बरतने चाहिये। वात और कफजन्य गलगण्ड के किसी प्रकार पक जाने पर वैद्य को पाक विधि बरतनी चाहिये ॥४८-५०॥
कटुत्रिकक्षीद्रयुताः समूत्रा भक्ष्या यवाज्जानि रसाश्च मौद्रगाः। सश्रुङ्गवेराः सपटोलनिम्बा हित्यैष देया गलगण्डरोगे ॥५१॥
भक्ष्यों (धान्य, कुरमाष आदि) का गोमूत्र में भिगोकर, सुखाकर, जो के बने भक्ष्य, मूँग का रस, इनको तथा त्रिकटु को मधु के साथ खाये। श्रुङ्गवेर परवल, नीम को गलगण्ड रोग में देना उत्तम है ॥५१॥ मेदः समुत्थे तु यथोपदिष्टं विध्येत् सिरां स्तिग्धतनोर्नरस्य। श्यामासुधालोहपुरोषदन्तीरसाञ्जनेश्चापि हितः प्रदेहः ॥५२॥ मूत्रेण वाऽऽलोह्य हिताय सारं प्रातः पिवेत् सालमहीरूहाणाम्। शस्त्रेण वाऽऽपाट्य विदार्य चैन
मेदः समुद्धृत्य हिताय सीन्येत् ॥५३॥ मज्जाज्यमेदोमधुभिर्दहैद्वा दग्धे च सर्पिमेधु चावचार्यम्। कासीसतुत्थे च ततोऽत्र देये चूर्णाकृते रोचनया समेत ॥५४॥ तैलेन चाभ्यज्य हिताय दद्यात् सारोद्भवम् गोमयजं च भस्म। हितश्च नित्यं त्रिफलाकषायो
गाढश्च बन्धो यवभोजनं च ॥५५॥ मेदजन्य गलगण्ड में स्नेहन देकर कही हुई सिरा (ऊरु-सन्धिमें कही) का वेधन करे। निशोथ, चूना, (या सेहण्ड) लोह का मैल (किंड) दन्ती, और रसोत इनका लेप करे। सालसार-दिगण के वृक्षों के सारकल्क को (कषमात्रा में) गोमूत्र में घोलकर