भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० १२ ]

चीरे । फिर इसमें से मेद निकालकर कासीस और सैन्यव लगाकर गोफणिका या स्थगिका बन्ध बाँध देवे । ब्रण का शोधन हो जाने पर मैनसिल, इडताल, सैन्यानमक और मिलावे से सिद्ध किया तैल बरते । कोई 'आवेध्व्य पट्टेन' का अर्थ— 'बुद्धि को वस्त्र से घेरकर' करते हैं ।

वक्तव्य—कासीस, सैन्यव, सुहागा—आज भी कार्यकल आदि बड़े फोड़ों को साफ करने के लिये देहात में नाई लोग चीर कर भरते हैं । यह प्रायः एक ही दिन करना होता है । इससे गला, सड़ा मांस साफ हो जाता है । यह प्रत्यक्ष की हुई वस्तु है ॥ १५-१७ ॥

मूत्रजां स्वेदयित्वा तु वस्त्रपट्टेन वेष्टयेत् ॥१८॥ सेवन्याः पार्श्वतोऽधस्नाद्धिधेदु ब्रीहिमुखेन तु । अथात्र द्विमुख्यां नाडीं दत्त्वा निस्त्रावयेद्विक् ॥१९॥

मूत्रं, नाडीस्थोदुधुयं स्थगिकावन्धमाचरेत् । शुद्धयायां रोपणं दद्याद्द्वजयेदन्त्रहैनुकीम् ॥२०॥

अप्राप्तफलकोषायां वातबुद्धिकमो हितः । तत्र या वृद्धक्षणस्यां तां दृहेदधन्तुवक्रत्रया ॥२१॥ सम्यङ्सागौर्वरोधार्थं कोशप्राप्तां तु वर्जयेत् ।

त्वच्च भित्त्वाऽङ्गुष्ठमध्यं दृहेच्छ्वाङ्गुष्ठविषयंयात् ॥२२॥ अनेनैव विधानेन वृद्धौ वातकफात्मिके ।

प्रदहेतुं प्रयतः किंतु स्नायुच्छेदोऽधिकस्तयोः ॥२३॥ अङ्गुष्ठोपरि च कर्णान्ते त्यक्त्वा यत्नेन सेवनीम् । व्यत्यासाद्वा सिरां विध्येदन्त्रवृद्धिनिवृत्तये ॥२४॥

मुवजन्म्य बृद्धिं में स्वेदन देकर बृद्धि को पट्टी से लपेटकर, सेवनी के पार्श्व में नीचे की ओर ब्रीहिमुख से वेधन करे । फिर इसमें दो मुखवाली नाडी लगाकर वैद्य सब मूत्र निकाल लेवे । फिर नाडी को निकालकर स्थगिका बन्ध बाँधे । शोधन हो जाने पर रोपण करे । अन्त्र हेतुकीम् (कोश में पहुँची) बृद्धि की चिकित्सा न करे । जो अन्त्र बृद्धि कोष (फलकोष) में न पहुँची हो, उसे वात बृद्धि की चिकित्सा करे । जो अन्त्र बृद्धि वंक्षण में ही स्थित हो (अभी आगे—ईडन्तयरिंग से बाहर न आई हो) उसे अर्द्धन्दुवक्रत्रा (हँसली के आकार की हँसिया) शलाका से जला दे, जिससे कि मार्ग भली प्रकार रुक जाये । जो अन्त्र बृद्धि फल कोष में उत्तर आई हो (फिर वापिस न जाती हो) उसकी चिकित्सा न करे । अन्त्र की विपरीत दशा में (दक्षिण पार्श्व में होने पर वाम में, वाम में होनेपर दक्षिण पार्श्व में) अँगूठे में (पैर के) त्वचा को चीरकर दाह कर्म करे । वातकफजन्म्य बृद्धि में भी इसी विधि से सावधानी के साथ जलाये । किन्तु वातकफजन्म्य बृद्धि में स्नायु को अधिक छेदन करें, योद्धा गहरा जलाये । अन्त्र बृद्धि की शान्ति के लिये—शङ्ख प्रदेश के ऊपर, कान के पार्श्व पर सेवनी को यत्नपूर्वक छोड़ते हुए विरुद्ध पार्श्व में सिरा का वेधन करे ।

वक्तव्य—मूत्र को निकाले—वास्तव में जो पानी निकलता है, उसका रङ्ग और रसायनिक विश्लेषण लगभग मूत्र से निकलता है । इसलिये इसे 'मूत्र' नाम से कहा है, यथा—“सामान्यात् गन्धवर्णयोः रक्तस्य पित्तमाख्यातं मनीषिभिः ॥” बही हेतु यहाँ है । कान का वेधन—पाली के ऊपर के भाग में आज भी गाँवों में ब्रन्ध या बृद्धि को रोकने के लिये करते हैं । एक दो रोशियों को आराम भी देखा है । परन्तु सब में नहीं ॥१८-२४॥

उपदर्शेषु साध्येषु स्निग्धस्विन्नस्य देहिनः । सिरां विध्येन्मैदमध्यं पातयद्वा जलौकसः ॥२५॥ हरेदुभयतश्चापि दोषान्त्यर्थमुच्छिन्नत्वात् । सद्योऽपहतदोषस्य रुकशोफावुपग्राम्यतः ॥२६॥ यदि वा दुर्बलो जनतुर्न वा प्राप्तं विरेचनम् । निरुहेण हरेत्तस्य दोषान्त्यर्थमुच्छिन्नत्वात् ॥२७॥ साध्य उपदर्शों में रोगी को स्नेहन और स्वेदन देकर मेहन के मध्य में सिरा का वेधन करे । अथवा जाँके लगाये । (बहुत दोष या गम्भीर रूप में दोष होने पर वेधन करे, अल्प दोष या दोष के ऊपर होने पर जाँक लगाये) । अत्यन्त बड़े हुए दोषों को वमन और विरेचन से निकाल देवे । दोष के निकल जाने से वेदना और शोफ तुरन्त शान्त हो जाते हैं । यदि दुर्बल होने के कारण रोगी विरेचन के अयोग्य हो तो, उसे निरुद्ध देकर अतिशय बड़े हुए दोषों को निकाले ॥

प्रपौण्डरीकयष्ट्याहृवर्षाभूकुष्ठदारुभिः । सरलागुरुरास्ताभिर्वार्तजं संप्रलेपयेत् ॥२८॥ निचुल्लेरण्डबीजानि यवगोधूमसक्तवः । एतैश्च वातजं स्निग्धैः सुखोष्णैः संप्रलेपयेत् ॥२९॥ प्रपौण्डरीकपूवैश्च द्रव्यैः सेकः प्रगस्यते । वातजन्म्य उपदर्शं में—प्रपौण्डरीक, मुल्लैहटी, पुनर्नवा, कूठ, देवदारु, चीड़ का गोन्द, अगर, रास्ता इनसे लेप करे । वेतूल, एण्ड के बीज, जौ, गेहूँ के सत्तू, इनको वातजन्म्य उपदर्श में तैल मिलाकर सुहाता हुआ गरम लेप करे । प्रपौण्डरीक आदि द्रव्यों से परिषेक करना उत्तम है ॥ २८, २९ ॥ गैरिकाम्बजन्म्यष्ट्याहृसारिवोशीरपद्मकैः ॥३०॥ सचन्दनोत्पलैः स्निग्धैः पैतिकं संप्रलेपयेत् । पद्मोत्पलमुणालैश्च ससर्जार्जुनवेतसैः ॥३१॥ सपिःस्निग्धैः समधुकेः पैतिकं संप्रलेपयेत् । सेचयेच्छ चूतक्षीरशर्करैश्चमधुदकैः ॥३२॥ अथवाऽपि सुशोतेन कषायेण वटादिना । पैतिक उपदर्श में—गेरु, अञ्जन (रसोत), मुल्लैहटी, सारिवा, खस, पद्ममाख, चन्दन, कमल, इनकी घी से स्निग्ध करके लेप करे । कमल, नीला कमल, मुणाल, सर्जरस, अर्जुन, अम्ल वेतस, और मुल्लैहटी इनकी घी