सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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ते स्निग्ध करके पै्तिक उपदंश मेँ लेप करे । घी, दुष, शकरा
= श्ब॑त, गन्ने का रसः _ शहद् का ज इनसे परिषेक करे | भब बरगद आदि क्षीरि बृक्षो के अति शीतर कषाय से
पिक करं ॥२३०-२२॥ .
साढाश्चकणोजकणेधवत्वग्भिः कफोप्थि तम् ॥३३॥।
युरापि्टाभिरुष्णाभिः सकेखाभिः प्रङेपयेत् ।
रजन्यतिविषामुस्तासुरसासुरदारुभिः ॥२४॥
सपत्रपाठापत्तररथ वा संप्ररेपयेत् ।
सुरसारग्बधायोश्च काथाभ्यां परिषेचयेत् ॥३५॥
कफजन्य उपदंश मे- साल, अश्वकणे, अजकणं,. धव
इनकी छाल को सुरा से पीसकर तेर मिलाकर गरम करके ठेष
करे । अथवा हस्दी, अतीख; मुस्ता, त॒लसी, देव दारू, तमालघ्न पाडा, पत्तर (मची) इनसे ल्प करे । सारखादिगण
अथ्वा आरुवधादिगण के क्वाथ से परिषेक करे ॥२२-२५॥
एवं संञोधनारेपसेकशोणितमोक्षणेः । -
प्रतिककुयीत् क्रियायोगे प्राक्स्थानोक्तर्हितेरपि ॥२६॥
न याति च यथा पाकर प्रयतेत तथा भिषक् ।
विदग्धेस्त॒ सिरास्नायुस्व्सिः क्षीयते ध्वजः ॥३७॥
लखेणोपचरेच्चापि पाकमागतमाञ्च वे ।
तद्ाऽपोह्य तिः सर्पि्षौद्रयुक्तः प्ररेपयेत् ॥३८॥
करवीरस्य पत्राणि जात्यारग्बधयोस्तथा ।
रक्षाख्ने प्रयोज्यानि वैजयन्त्यकयोरपि ॥२९॥
इस प्रकार संशोधन, लेप, परिषेक रक्तमोक्षण, आदि चिकि
सखा तथा सूत्रस्थान मे के एवं मिश्रकोक्त विधि से आम
। उपदंश की ` चिकित्सा करे । जिस प्रकार पके नहीं वेय रेखा
यूल करे । क्योंकि पकं जाने पर सिरा-स्नायु टवचा ओर
। मांस के सड़ने से मेहन क्षीण हो जाता है । पक जाने पर तुरन्त
शत्र चिकित्ा करे । फिर पूय को हटाकर घी ओर मधु में
मिय तिलो से केप करे । कनेर चभेली, अमता के पत्त,
वैजयन्ती (अरणी बश्च) ओर आक इनके पत्तों का कषाय धोने कैल्यि बरते ॥३६-३६॥
सौरा गेरिकं तुत्थं पुष्पकासीससेन्धवम् ।
रोधं रसाञ्जनं दावं ह रितारं मनः जिम् ॥४०॥
` हरेणुकेडे च तथा सृदमचणोनि कारयेत् ।
तच्चणे' क्षौ द्रसंयुक्तमुपदंशेषु पूजितम् ॥४१॥
सरार (फिटकरी), गेरू, तस्थ, पुष्पांजन (जस्त का पा)
४ सेन्धव, कोष, रसँ त, दारहल्दी, हरताल, मेनसिरु,
४५ का, इलायची, इनका सूघम चूण बनाकर इस चूण को
। मष म मिलाकर उपदंशों मे बरते ॥४०,४१॥ ` जम्ब्वाम्रसुमनानिम्बश्ेतकास्बोजिपर्खवाः ।
शल्खंकोबदरीबिल्वपटारातिनिशसव चः ॥४२॥ क्षीरिणां च त्वचो योज्याः क्वाथे तिष्छढया सह् ।
| तन क्वाथेन नियतं वृण रक्षाख्येद् भिषच्छ्॥४३॥
चिकित्सास्थानम् ४६५
अस्मिन्नेव कषाय तु तें धोरो विपाचयेव ।
गोजी विडङ्कयष्टीमिः सवेगन्धेश्च संयुतम् ॥ ४४ ॥
एतत् सर्वोपदंशेषु श्रषठं रोपणमिष्यते ।
जामुन, आम, चमेटी, नीम, श्वेत (रवैतस्यन्द, या कोयर),
काम्बोजिका (कूविका या माधपर्णी); इनके पत्ते, शल्लकी
(सल), बेर, विल्व, ढाक, तिनिश (सादन), इनकी छाठ,
वरगद् आदि क्षीरी इक्षो की छाल, इनका क्वाथ करके जिसमें
त्रिफला क्वाथ मिखाकर इस क्वाथसे वेय प्रतिदिन वरण को
धोये | इसी क्वाथ मे धीर वे तैल सिद्ध करे । इस तैर्मे
गाज्वाँ, बायविडंग, सुरहडी, ओर एलादिगण-सवगन्ध द्रव्यं
को मिलाय | यह तेढ सव उपदंश मे रोपण के व्यि श्रेष्ट दै।
वक्तव्य--यर्हां पर गाजवां आदि का कल्क तेर सिद्ध होने ` पर मिकाना है । दूसरे आचा्थं ते सिद्ध करने मेँ कषाय के
साथ डाठ्ते है ॥४२-४५॥।
स्वर्जिका तुत्थकासीसं शेखेयं च रसाञ्जनम् ॥४५॥ मनःशिासमेश्चणे' ब्रणवीसपेनाशनम् ।
गुन्द्र दर्वा कृतं भस्म हरितारं मनःशिखा ॥४६॥ उपदंशविष्षपणामेतच्छान्तिकरं परम् । माकंवख्िरखा दन्ती ताम्रचणेमयोरजः ॥४७॥ उपदंशं निदन्त्येष बृक्षमिन्द्राशनियेथा ।
सर्जश्चार, तत्थ, काखीस, शेरेय (शिला-पुष्प) रसत ओर
मैनसिल इनको समान भाग मे लेकर वणं करे । यह चूण
उपदंश व्रण जन्य वीसपं को नष्ट करता है । रान्द्रा (पडा)
को जलाकर भस्म करे । इस भस्म मे मेनसिरु भौर हरता
मिय । उपदंश जन्य बीसपा को शान्त करने मँ यह भेट हे ।
भांगरा, त्रिफला, दन्ती (जमाल गोरा); ताम्र को भस्म, यह
चृणं उपदंश को एेसे नष्ट कर देता है जेसे कि विजछी वृक्ष
को नष्ट करती है ॥४५-४७॥ । |
उपदंशद्रयेऽप्येतां प्रत्यास्यायाचरेत क्रियाम् ।४६॥
तयोरेव च या योग्या वीचय दोषबलाबलम् । `
उपदंशे विशेषेण णु मूयसिदोषजे ४९
रक्तजन्य ओर सन्निपातजन्य -उपदंशो मे कारण को
समानता होने पर-इन दोनों को असाध्य कहकर चिकित्सा
कृरे । इनमे दोष के बर ओर अबल का विचार करके, जो
योग्थ चिकित्सा हो, उसे वातादि दोष के अनुसार करे! ४८१४६
दष्टत्रणविधि कुयात् कथितं मेहनं त्यजेत ।
जग्ग्वोष्ठेनाग्निवर्णेन पञ्चाच्छेषं दहेद्, भिषक् ।५.०।
सम्यग्दग्ध च विज्ञाय मधुसपिः भ्योजयेत्। शुद्ध च रोपणं दद्यात् कल्कं तेर दितं च यत् ॥५९।
सन्निपातजन्य उपदंश मे विशेष चिकिर्षा को सुनो इसमे `.