भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

पृष्ठ 522, कुल 872 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 522

४६६

सुश्रुतसंहिता

[ अ० ११ ]

न करे । जितना मेहन सङ्ग गया हो, उसे काटकर पीछे से अग्न में लाल किये जगन्बोध शस्त्र से बचे हुए मेहन के अग्र भाग पर अग्नि कर्म करे । भली प्रकार दाह हुआ जानकर मधु और घृत लगाये । शौघन होने पर उससे रोपण करे, इसके लिये जो कल्क तैल हितकारी हो ॥५०,५१॥

स्नेहस्वेदोपपन्ने तु श्लीपदेऽनिलजे भिषक् ।

कृत्वा गुल्फोपरि सिरां विध्येत्तु चतुरङ्गुले ॥५२॥

समाप्यायितदेहं च बस्तिभिः ससुपाचयेत् ।

मासमेरण्डजं तैलं पिवेन्मूत्रेण संयुतम् ॥५३॥

पयसौदनमहनीयात्रागरकवधितेन च ।

त्रैवृतं चोपयुङ्क्नीत शस्तो दाहस्तथाऽग्निना ॥५४॥

वातजन्य श्लीपद में वैद्य स्नेहन और स्वेदन करके गुल्फ से चार अंगुल ऊपर में सिरा का वेधन करे । रक्त निकालने के उपरान्त शरीर के स्वस्थ-प्रकृत रूप में आ जाने पर रोगी को निरुहवस्ति देवे । मास तक एरण्ड तैल को गोमूत्र के साथ पीये । सौठ ( एक कर्ष ) के कषाय से सिद्ध किये दूध के साथ चावल खाये । व्यातव्याधि में कहे वैद्युत् स्नेह को बरते । अग्नि आदि से दाह उत्तम है ।

वक्तव्य—बनारस के गायघाट पर मैंने एक रोगी देखा था । आयु २२ वर्ष की थी, उसके बायें पैर में श्लीपद था । उसने वहाँ एक मनुष्य से दाह करवाया था । दाह के निशान उसके पैर में थे । दाह करवाये तीन साल हो चुके, जब मैंने देखा था । उसने कहा कि दाह करवाने से अब श्लीपद नहीं बढ़ता । वह रोगी साधारण मजदूर था ॥५२-५४॥

गुल्फस्याधः सिरां विध्येच्छ्लोपदे पित्तसंभवे ।

पित्तघ्नीं च क्रियां कुर्यात् पित्तावृद्विसर्पवत् ॥५५॥

पित्तजन्य श्लीपद में गुल्फ से नीचे सिरा का वेधन करे । पित्तावृद् और पित्तविसर्प की भांति पित्तनाशक चिकित्सा करे ॥५५॥

सिरां सुविदितां विध्येदङ्गुष्ठे श्लैष्मिके भिषक् ।

मधुयुक्तानि चाभीक्षणं कषायानि पिवेन्तरः ॥५६॥

पिवेद्वाऽप्यभयाकल्कं मूत्रेणान्यतमेन च ।

कटुकाममतां शृण्ठीं विडङ्गं दारुं चित्रकम् ॥५७॥

हितं वा लेपने नित्यं भद्रदारु सचित्रकम् ।

विडङ्गमरिचाकर्षेणु नागरे चित्रकेऽथवा ॥५८॥

भद्रदार्विलुकाख्ये च सर्वेषु लवणेषु च ।

तैलं पक्वं पिवेद्वाऽपि यवान्न् च हितं सदा ॥५९॥

पिवेत् सर्वपतैलं वा श्लीपदानां निवृत्तये ।

पूतीकरञ्जपत्राणां रसं वाऽपि यथावलम् ॥६०॥

अनेनैव विधानेन पुत्रञ्जीवकजं रसम् ।

प्रयुञ्जीत भिषक् प्राज्ञः कालसात्त्वविभागवित् ॥६१॥

केवुकानन्दनिर्यासं लवणं त्वथ पाकिमम् ।

रसं दन्त्राऽथ पूर्वोक्तं पयमेतद् भिषजितम् ॥६२॥

कफजन्य श्लीपद में वैद्य अंगुष्ठ में—भली प्रकार जानी सिरा का क्षिप्र मर्म के चार अंगुल ऊपर में वेधन करे । मनुष्य मधु मिश्रित कफ नाशक कषायों को बार-बार पीये । आठों मूत्रों में से किसी एक मूत्र से हरङ्ग के कल्क को पीये । कुटकी, गिलोय, सौठ वायविडंग, देवदारु, चित्रक, इनका नित्यप्रति लेप करे । वायविडंग, मरिच, आक, सौठ चित्रक, अथवा देवदारु, एलवालुक और पांचों नमक इनमें सिद्ध किया तैल पीये और जो का भोजन करना उत्तम है । श्लीपद रोगों की शान्ति के लिये खरसों का तैल पीये । अग्नि-बल की अपेक्षा से नाटाकरंज पत्तों का स्वरस पीये । करंज की विधि से ही काल, सात्त्व्य को समझनेवाला बुद्धिमान् वैद्य जिया-पोते के पत्तों का स्वरस पिलाये । केवुक कन्द का निर्यास (स्वरस), विडलवण, इनमें जियापोते का स्वरस या करंज का स्वरस मिलाकर यह औषध रोगी पीये ॥६२॥

काकादनीं काकाजङ्गां बृहतीं कण्टकारिकाम् ।

कदम्बपुष्पीं मन्दारीं लम्बां शुक्नसां तथा ॥६३॥

दग्ध्वा मूत्रेण तद्भस्मं स्नावयेत् क्षारकल्पवत् ।

तत्र दद्यात् प्रतीवापं काकोदुम्बरिकारसम् ॥६४॥

मदनाच्छ फलात् क्वाथं शुकाख्यस्वरसं तथा ।

एष क्षारस्तु पानीयः श्लीपदं हन्ति सेवितः ॥६५॥

अपचीं गलगण्डं च ग्रहणीदोषमेव च ।

भक्तस्थानगनं चैव हन्यात् सर्वविपाणि च ॥६६॥

काकादनी ( कालाहिंसा-डल्हन, वायसतिन्दु ), काकजंघा, बड़ीकटेरी, छोटीकटेरी, कदम्बपुष्पी, मन्दारी, लम्बा (कुड़ें तुम्बी), शुक्नसा इनको जलाकर गोमूत्र में घोलकर क्षारकल्पना विधि से नितार लेवे । इसमें कठगूलर का रस, मेनफल का क्वाथ, शुक्नसा का स्वरस प्रतिवार रूप में मिलायें । यह पानीय क्षार पीने पर श्लीपद, अपची, गलगण्ड, ग्रहणीरोग, भोजन के अजीर्ण को और सब विषों को नष्ट करता है ॥६३-६६॥

एष्वेव तैलं संसिद्धं नस्याभ्यङ्गेषु पूजितम् ।

एतानेवामयान् हन्ति ये च दुष्टव्रणां नृणाम् ॥६७॥

काकादनी आदि के क्वाथ में और कठगूलर के स्वरस, मेनफल के क्वाथ और शुक्नसा स्वरस ( ये क्वाथ के समान ) में सिद्ध किया तैल नस्य और अभ्यंग में श्रेष्ठ है । यह तैल मी उपयुक्त रोगों को एवं दुष्ट व्रणों को नष्ट करता है ॥६७॥

द्रवन्ती त्रिवृतां दन्तीं नीलीं श्यामां तथैव च ।

समलां अङ्गिनीं चैव दग्ध्वा मूत्रेण गालयेत् ॥६८॥

दद्याच्छ त्रिफलाक्वाथमेव क्षारस्तु साधितः ।

अधो गच्छति पीतस्तु पूर्वश्चाप्याशिषः समा ॥६९॥