भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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४६ पाददार्यां सिरां विद्ध्वा स्वेद्‌भ्यङ्गौ भयोजयेत ।१९ मधच्छिष्टवसामज्जसजेचणेषृतैः कृतः । यवाहनैरिकोग्मिश्रः पाद ख्ेपः प्रशस्यते ॥२०॥।

पाददारी में स्नेहन ओर स्वेदन करके सिरा का वेधन

करे । मोम, वसा, मजा, राक, जौखार ओर गेरू इनके चूण

को घी में मिलाकर बनाये लेप पैर पर लगाये ॥१६,२०॥

पदौ सिक्त्वाऽऽरनाटेन ल्नं द्यटसे हितम्‌ ।

कृल्कीछतेरनिस्बतिर्काशीसालैः ससेन्धवेः ।२१॥

लाक्षारसोऽमया वाऽपि कायं स्याद्रक्तमोक्षणम्‌ ।

सिद्ध' रसे कण्टकायास्तैरं वा साषेपं हितम्‌ ॥२२॥ कासीसरोचनश्जिकाचणेव प्रतिसारणम्‌ ।

अलस रोग मे पेरों पर कांजी से परिषेक करके नीम, तिल, कासीसः हड़ताल, सेन्धव इनको पीकर लेप करना उत्तम है ।

अथवा खाक्षारख (महावर) ओर हरड़ का टेप करे । रक्त मोश्चण

करे ] कण्टकारी के स्वरस मे सिद्ध किया-सरसों का तेल उत्तम

है । कासीस, इल्दी, मेनसिल इनके चूणं से मटन श्रेष्ठ है ॥ उ्छृत्य दश्वा स्नेहेन जयत _कद्रसंज्ञकम्‌ ॥२३॥

कद्र (आटन) को शखर से काटकर अग्निसे गरम किये

ते से जलाना चाहिये । (तेढ सूक मार्गान॒खारि है । यथा-

“८अग्निसंतप्तो हि स्नेहः सृष्मसिरानुसारित्वाद्‌ त्वगादीननुप्रवि-

श्या दहति सुश्रुत सूजन अ० ११।१५) ॥२३॥

इन्द्रसुप्ते सिरां मूष्नि स्निग्ध विन्नस्य मोक्षयेत । कर्कः समरिवेदिंद्याच्छिखाकासीसतुस्थकैः ॥(२४॥ ङुटन्नटादारकल्केर्योपनं वा प्रज्ञस्यते। ` ्रच्छयिताऽवगाढं वा ाञ्खाकल्केयुदुमंहुः ॥२५॥ ठेपयदुपञान्त्यथं छयादवाऽपि रसायनम्‌ । माखतौकरवीराग्निनक्तमाङविपाचितम्‌ ॥२६॥ तैखमभ्यञ्जने शस्तमिन्द्रप्रापहं परम्‌ ।

इन्द्रलुप्त मे रोगी का स्नेह ओर स्वेदन करके चिर में शिरा का मोक्चण करे । मरिच, मेनि, कासीस ओर तुत्थ का लेप करे । कुट्ट (तगर), देवदार इनके कल्क से लेप करना उत्तम हे । अथवा गहरे रूप मे पाठने लगाकर रत्ती के

कल्को से बार-बार लेप करे । अथवा रोग की शान्तिके लिपि

रसायन विधि का पालन करे | चमेटी, कनेर, चित्रक, करंज से सिद्ध क्रिया तेल अभ्यंग मे उत्तम दै, सर्वथा इन्द्रलुप्त नाशक हे ॥२४-२६॥ दः

र अरूषिकां हते रक्ते =सेचयेन्निम्बवारिणा ॥२५॥ दिद्यात-सन्धवयुक्तेन वाजिविष्ठारसेन तु। | हरितारनिशानिम्बकल्केवा सपटोरजे;॥२८॥ नीलोतले . यष्टीनीलोतरेरण्डमाकंवेवा ्ररेपयत | ृरुपापदं तेढम्य्ञे च भ्रस्यते । `

सुश्चतखंहिता |

ग प्व व

अश अरंषिका में रक्त निकार्कर नीम के पानी से ९०

करे । घोडे की लीद के रख में सेन्धव मिश्रं उ परिषेक

[+ ५३ पसे करे । हरिता, इल्दी, नीम ओर पटोल इनके कलक स

भ करे । अथवा मुरहठी, नीला कमल, एरण्ड ओर मागर ते तः करे । इन्द्रलुप्त नाशक तेर का अभ्यंग उत्तम है ||२७ २८।

॥ सिरां दारुणके विद्ध्वा स्निग्ध खिन्नस्य मूधनि।२९ अवपीडं शिरोवस्तिमभ्यङ्घं च प्रयोजयेत ।

क्षालने कोद्रवतृणक्षारतोयं प्रजस्यते ॥३०॥

दारण रोग में रोगी को स्नेहन स्वेदन देकर शिर पर सिरा का वेधन करे । अवपीड, नस्य, शिरोबस्ति ओर अभ्यंग करे |

धोने के लिये कोदा के तिनको का क्षार जरु उत्तम है २६.३५

उपरिष्टात प्रवद्यामि विधि पञितिनाशनम्‌ | पठित रोग कौ चिकित्सा आगे मिश्रकोक्त चिकित्सा (२५

वे अध्याय) में कर्हूगा |

मसूरिकायां कुष्ठऽ्नरेपनादिक्रिया हिता ॥३१॥

पित्तररेष्मविसर्पांक्ता क्रिया वा संभ्र्स्यते ।

मसूरिका में कुष्ठ नाशक लेपन आदि क्रिया हितकारी है।

अथवा विखपं में की पित्त, कफ नाराक चिकित्सा उत्तम र॥

जतुमणि समु्छृत्य मषक तिकाटकम्‌ ॥३२॥ क्षारेण प्रदहययुक्स्या व हिना वा खनेः शनैः।

जतुमणि, तिककालक ओर मषक को मली प्रकार काटकर युक्तिपूवंक क्षार से या अग्नि से धीरे धीरे जछाये ॥३२॥ - न्यच्छे व्यङ्ग सिरामोक्षो नीलिकायां च स्यते ॥३३॥

यथान्यायं यथाभ्यासं खङव्यादिसिराम्यधः। षा दिद्यार्वचं धिषा क्षीरिणां क्षीरसंयुतम्‌ ॥२४॥

वङातिवछ्यष्स्याह्वरज नीवा प्ररेपनम्‌ ।

पयस्यागुरुकाीयलेपनं वा सगेरिकम्‌ ॥३५॥ ्षोद्राञ्ययुक्तया छिम्पेदष्या शूकरस्य च ।

कपित्थराजाद नयोः कल्क" वा.हितमुच्यते ॥३६॥ न्यच्छ, व्यंग ओर नीलिका मे सिरा मोक्षण उत्तम है।

यह सिरा वेध, जैसा योग्य हो, एवं जेखा अभ्यास मे आया ह,

उस प्रकारसे ललाट आदि की सिराका वेध करे। पिर

समुद्र फेन भादि से धिसकर, बरगद आदि क्षीरि धृष की

छार को दुघ के साथ पीसकर लेप करे। अथवा बरा अति.

बला, मुलेदठी, दल्दी इनका खेप करे। या विदारी, अगर, |

कालीयक ओर गेरू इनका क्प करे। शकर की दष धिखकर मधु ओर घी में मिलाकर केप करे । अथवा के

खिरनी का कल्क उत्तम कहा जाता ह ॥३२-२६॥

यौवने पिडकास्वेष विशषाच्छदनं हितम्‌ । ठेपनं च वचारोधसेन्धबेः सषेपान्वितेः ॥२५॥

ङुस्तुम्बुरुव चारोध्रङुष्ठेवी ठेपनं हितम । , `