सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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युवावस्था में पिड़काओं मे विशेषकर वमन करना उत्तम
ई । वच, लोध्, सैन्धव. ओर, सरसों से लेप करना उत्तम दै ।
अथवा धनिर्याँ, वच, लोध, ओर कुष्ठ का ठेप उत्तम है ॥३७॥
पदरिमनीकण्टके रोगे छदेयेन्निम्बवारिणा ॥२८॥।
तेव सिद्धं सक्षोद्रं सर्पिःपानं प्रदापयेत् ।
निम्बारग्बधयोः कस्को हितसुत्सादने भवेत् ॥३<॥
पदिमिनी कण्ट्क रोग में रोगीको नीम के पानी से वमन
कराये । नीम के क्राथ सेसिद्ध क्यिषीको मधु के साथ पिलाना उत्तम दै । उबयन म नीम ओर अमल्ताख के पत्तो का कल्क उत्तम हे ॥३८,३६॥ परिवृत्ति घृताभ्यक्ता सुस्विन्नायुपनाहयेत् ।
ततोऽभ्यञ्य शनेश्चमे चानयेत् पीडयेन्मणिम् ॥४०॥ प्रविष्टे च मणौ चमं स्वेदयेदुपनाहनेः ।
त्रिरा पच्चरात्रं बा वातघ्नः सार्बणादिभिः ।॥४१॥ द्द्याद्रातहरान् बस्तीन् स्तिग्धान्यन्नानि भोजयेत् ।
वपाटिकां जयेदेवं यथादोषं चिकित्सकः ॥४२॥
परिवत्तिका सें स्वेदन भटी प्रकार करके घी से स्निग्ध कृरके माष देवे । तव घी से अभ्यङ्ग करके मणि को दबाते हुये चमं
को आगे लये | मणि के अन्दर धुख जाने पर चमं पर उपना- हनो से ( अल्सी आदि से ) मृदु स्वेद करे । यह स्वेद वातनाशक साल्वण आदि द्रव्योंसे तीनया पांचदिन दोषकी विकल्पना से करना चादिए । वातनाशक बस्तियां देवे । स्निग्ध
अन्नं को खिखाये । चिकित्छक दोषानुसार इसी विधि से अवपाटिका को चिकित्सा करे ॥४०-४२॥
निरुद्धभ्रकशे नाडीं खोहीमुभयतोमुखीम् । दारवीं वा जतुकृतां घृताभ्यक्ता प्रवेशयेत् ॥४३॥ परिषेके वसामञ्जाशिज्चुमारवराहयोः।
चक्रतेखं तथा योऽयं वातश्नद्रम्यखंयुतम् ॥४४॥ यहात् यहात् स्थूरतरां सम्यङ्नाडी प्रवेशयत् । स्रोतो विवधयेदेवं स्निग्धमन्नं च भोजयेत् ॥४५॥
भिचा वा सेवनीं मुक्त्वा स्यःक्षतवदाचरेत् ।
सन्निरुद्धगुदं रोगं बल्मीकं वदहिरोदिणीम् ॥४६॥
प्रत्याख्याय यथायोगं चि कित्सितमथाचरेत्। विसर्पोक्तन विधिना साधयेदग्निरोहिणीम् ॥४७॥
` सन्निरुद्धगुदे योऽया निरुद्धभकशक्रिया ।
निरुद्ध प्रकश रोग मे--दोनों ओर मुखवाटी हे की नगाड़ीकोया लकड़ी अथवा लाख से बनाई नाड़ीकोषौसे
सिनिग्ध करफे अन्द्र प्रविष्ट करे। परिषेक मे शिशुमार सुभर को वसा ओर मजा बरते। अथवा वातनाशक द्रव्यो से
मिला कलह का ताजा तेल बरते । तीन तीन दिन के उपरन्त नाडी प्रविष्ट करता जाये । इस प्रकार से स्रोत को
चोडा करे, ओर रोगी को स्निग्ध अन्न दे। अथवा सेवनी
यचाकर शखर से चीरकर सयः क्षत विधि से चिकित्सा करे। ।
चिित्सास्थानम् ४६8
सन्निसद्धः गुद, वल्मीक ओर अग्नि रोहिणी को असाध्य
कहकर यथायोग्य चिकिस्छा करे 1 अग्नि रोदिणी की चिकित्सा
विसर्पोक्त विधि से करे । सन्निरुद्ध गुद रोग में निरुद्ध प्रकश की चिकित्सा करे।
वि० मन्तव्य- मित्वा वा सेवनीं मुक्त्वा सदयः क्चतवद्-
चरेत् । अथात्-मणि पर आनेवाखी रहनेवाटी त्वचा को कार
देवे जेसे मुसलमान शसुन्नतः करते ह । सुन्नत भीसेवनी को
बचाकर दी की जाती हे ॥४३-४७॥।
शखेणोस्छृरय वल्मीकं क्षाराग्निभ्यां प्रसाधयेत् ॥४८॥ विधानेनाबदोक्तन शोधयित्वा च रोपयत्।
वस्मीकं तु भवेद्यस्य नातिचृद्धमममेजम् ॥४९॥ तन्न संशोधनं कृतवा ओणिं मोक्चयदू भिषक. ।
कुरुत्थिकाया मूलैश्च गुड्च्या ख्वणेन च ॥५०॥ आरेवतस्य मूलेश्च दन्तीमूठेस्तथेव च ।
सयामामूलैः सपर्यैः शक्तुमिश्ैः ्रङेपयेत ॥५१॥ सुसिनग्धेश्च सुखोष्णैश्च भिषक. तमुपनाहयेत.। पक्वं वा तद्विजानीयाद् गतीः सवा यथाक्रमम् ॥५२॥
अभिज्ञाय ततश्छित्त्वा प्रद देन्मतिमान् भिषक ।
संशोध्य दुष्ट्मासानि क्षारेण प्रतिसारयत. ॥५३॥ व्रणं विशुद्धं विज्ञाय रोपयन्मतिमान् भिषक. ।
सुमना अन्थयश्चेव भल्लातकमनःशिङे ॥५४॥
कारानुसारी सूच्मेखा चन्दनागुरुणी तथा । एरौः सिद्धं निम्बं वल्मीके रोपणं हितम् ॥५५॥ पाणिपादोपरिष्टातत छिद्रेबेहुभिराबरतम् ।
वरमीकं यत् सओोफं स्याद्वञ्य तत्तु विजानता ॥५६॥
वल्मीक को शखर से काटकर क्षार ओर अग्नि से जलाय ।
अबष्दोक्तः विधि से शोधन करके रोपण करं। जिस रोगी मे = वल्मीक बहत बड़ा न हो तथा ममे स्थान पर न उयन्न हो,
उसमें संशोधन करके वैद्य रक्त मोक्षण करे । फिर कुर्त्थी को
जड़, गिलोय, नमक, आरेवत का मूर, जमा गोटे की जङ्
निशोथ का मूल, तिल कल्क इनको सत्तु मे मिलाकर लेप करे ।
वल्मीक पर अतिशय स्निग्ध एवं स॒हाते हये गरम् द्रव्यो से वेद्य
उपनाह करे | बल्मीक को पका हआ जानकर वेद्य नाड़ी जरण
की सम्पूणं विधि बरते। इसमे इसको कारक्र वुद्धिमान्
नै जला देवे । दूषित माषो का शोधन करके क्षार से रणड,
रण को शुद्ध हंआ जानकर वैद्य रोपण करे । रोपण के लियि-
चमेली के डोडे, भिलावा, मेनखिङ, कालानुखारी, छोटी इला-
य॒ची, चन्दन, अग, इनसे सिदध किया नीम का सख वस्मीक
मर उत्तम रोपण है! दाथपेरों पर बहुत हिद्रोबाखा वल्मीक
हो, तथा जिसमें सूजन भी हो, उसे जाननेवाला वै छोड़ देः
उखकी चिकित्खा न करे । =