सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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मुमुक्षुसंहिता
[ अ० २४ ]
शस्यते त्रिष्वपि सदा व्यायामो दोषनाशनः । मुक्तं विरुद्धसप्यन्तं व्यायामात्र प्रदुष्यति ॥१०६॥ मनुष्यो में रोगों को शान्त करने के लिये अग्नि को प्रदीप्त करना चाहिये । प्राष्टुट, शरद और वसन्त में मली प्रकार स्नेह आदि का सेवन करे । कफ में वसन्त, पित्त में विरेचन, वायु में बस्ति, उत्तम है । तीनों दोषों में व्यायाम का सदा करना दोषनाशक है । खाया हुआ विरोधि भोजन भी व्यायाम के कारण दूषित नहीं होता, दोष नहीं करता ॥१०७-१०६॥
उत्सर्गमैथुनाहारगोधने स्यात्तु तन्मनाः । नेच्छेदोषचयात् प्राज्ञः पीडां वा कायमानसीम् ॥११०॥ अतिक्षोसंप्रयोगाच्च रक्षेदात्मानमात्मवान् । शुल्कासज्जरश्वासकार्यं पाण्डुवामयक्षयाः ॥१११॥ अतिव्यावाज्जायन्ते रोगाश्च क्षेपकादयः । आयुष्मन्तो मन्दजरा वपुर्वर्णबलान्विताः ॥११२॥ स्थिरोपचितमांसाश्च भवन्ति क्षीपु संयताः । त्रिभिर्क्षिभिर्होभिर्वा समीयात् प्रसदां नरः ॥११३॥ सर्वेष्वतुतु, धर्मेषु पक्षात् पक्षाद् ब्रजेद् बुधः । रजस्वलां कामां च मलिनामप्रायां तथा ॥११४॥ वर्णबुद्धां वयोबुद्धां तथा व्याधिप्रपीडिताम् । हीनाङ्गीं गर्भिणीं द्वेष्ट्यां योनिदोषसमन्विताम् ॥११५॥ सगोत्रां गुरुपत्नीं च तथा प्रव्रजितामपि । सन्ध्यापर्वस्वगम्यां च नोपेयात् प्रसदां नरः ॥११६॥ गोसर्गं चार्धरात्रे च तथा मध्यन्दिनेषु च । लज्जासमावहे देशं विवृतेऽशुद्ध एव च ॥११७॥ क्षुधितो व्याधितश्चैव कुव्याचित्तश्च मानवः । वातविष्मूत्रवेगी च पिपासुरतिदुर्बलः ॥११८॥ तिर्यग्योनाबयोनीं च प्राप्नुशुक्रविधारणम् । दुष्टयोनीं विसर्गं तु बलवानपि वज्येत ॥११९॥ रेतसश्चातिमात्रं तु मूर्ध्निवरणमेव च । स्थितावुत्तानमयने विशेषेणैव गहितम् ॥१२०॥ क्रीडायामपि मेधावी हितार्थां परिवज्येत । रजस्वलां प्राप्तवतो नरस्यानियतात्मनः ॥१२१॥ दृष्ट्यायुस्तेजसां हानिरधर्मश्च ततो भवेत् । लिङ्गिनीं गुरुपत्नीं च सगोत्रामथ पर्वसु ॥१२२॥ वृद्धां च सन्ध्ययोश्चापि गच्छतो जीवितक्षयः । गर्भिण्या गर्भपीडा स्याद् व्याधितायां बलक्षयः ॥१२३॥ हीनाङ्गीं मलिन्यां द्वेष्ट्यां कामं वन्ध्यामसंवृते । देशेऽशुद्धे च शुक्रस्य मनसश्च क्षयो भवेत् ॥१२४॥ क्षुधितः कुव्याचित्तश्च मध्याह्ने रुधितोऽबलः । स्थितश्च हानिं शुक्रस्य वायोः कोपं च विन्दति ॥१२५॥ अतिप्रसङ्गाद् भवति शोषः शुक्रक्षयावहः । व्याधितस्य रजा प्लोहि मृत्सुमूर्च्छां च जायते ॥१२६॥
प्रत्युषस्यधर्मात्रे च वातपित्ते प्रकुप्यतः । तिर्यग्योनाबयोनीं च दुष्टयोनीं तथैव च ॥१२७॥ उपदंशस्तथा वायोः कोपः शुक्रस्य च क्षयः । उच्चारिते मूत्रिते च रेतसश्च विधारणे ॥१२८॥ उत्ताने च भवेच्छीघ्रं शुक्रारमर्यास्तु संभवः । सर्वं परिहरैस्समादेतल्लोकद्वयेऽहितम् ॥१२९॥ शुक्रं चोपस्थितं मोहात्र सन्धार्थं कथंचन । मलमूत्र के त्याग, मैथुन, आहार एवं शरीर के शोषन में मनुष्य दत्तचित्त बनकर रहे । बुद्धिमान् मनुष्य दोष के संचय से शारीरिक या मानसिक पीडा को न चाहे । ( इसलिये इन कार्यों में मन लगाये ) । जितेन्द्रिय बनकर अतिस्त्री सेवन से अपने को बचाये । अतिस्त्री सेवन से शूल, कास, ज्वर, श्वास, कृशता, पाण्डुरोग, क्षय, आत्मेव आदि रोग होते हैं । स्त्रियों में संयमी पुरुष दीर्घायु, देर में बुढ़ा होनेवाले, शरीर-बल-वर्ण से युक्त, कठिन स्थिर मांसवाले होते हैं । सब श्रुतुओं में तीन-तीन दिन के अन्तर से स्त्री सेवन करे, परन्तु श्रीमत् श्रुतु में पन्द्रह दिन के अन्तर से बुद्धिमान् स्त्री सेवन करे ।
मैथुन में अयोग्य स्त्री—रजस्वला, मैथुन की अनिच्छावाली, मैली, अप्रिय, अपने वर्ण से ऊँचे वर्ण की, आयु में बड़ी, रोग से पीड़ित, हीन अंगवाली, गर्भवती, द्वेष रखनेवाली, योनि रोग से पीड़ित, समान गोत्रवाली, गुरु की पत्नी, संन्यासिनी स्त्री से सहवास न करे । सन्ध्याकाल में, पर्व समय में (सूर्य ग्रहण आदि के समय), सास, लड़की आदि मैथुन के अयोग्य स्त्री से पुरुष मैथुन न करे । गायों के छुटने के समय ( प्रातःकाल में), आधी रात में, मध्याह्न में, जिस स्थान पर लज्जा अनुभव हो, खुले मैदान में, अशुद्धस्थान पर सहवास न करे । भूल लगी होने पर, रोगी होने पर, विलुब्धमन की अवस्था में मनुष्य मैथुन न करे । वायु-मल-मूत्र का वेग उपस्थित होने पर, प्यास लगी होने पर, अतिनिर्बलता में, तिर्यग् योनि (बकरी आदि में) अयोनि में (मुख आदि में) शुक्र के क्षरण में उपस्थित वेग की, दूषित योनि में शुक्र के त्याग को बलवान् पुरुष भी छोड़ देवे । शुक्र का अतिशय त्याग, झिरने के अग्रभाग का टुकना, खड़े होकर या चित लेटकर शुक्र का त्याग करना बहुत निन्दित है । बुद्धिमान् एवं हित चाहनेवाला मनुष्य क्रीडा में भी शुक्र का त्याग न करे । असंयमी मनुष्य के रजस्वला स्त्री के साथ मैथुन करने पर दृष्टि, आयु और तेज की हानि एवं अधर्म होता है । संन्यासिनी, गुरुपत्नी या समान गोत्रवाली स्त्री के साथ, अथवा पर्व में, वृद्धा के साथ या सन्ध्याकाल में मैथुन करने से जीवन का नाश होता है । गर्भवती के साथ मैथुन करने पर गर्भ को हानि होती है, क्षण के साथ मैथुन करने पर बल का क्षय होता है । हीन अंगोंवाली, मलिन, शत्रुबनी, न चाहनेवाली, वन्ध्या या खुले स्थान पर अथवा मलिनस्थान पर मैथुन करने पर