सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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चिकित्सास्थानम्
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सन्ध्ययोरनौप्राशितो नातीतकालं हीनमतिमात्रं (नोद्धृत- स्नेहं) चेति ॥६८॥
शिर को नीचा करके न सोये। दूटे हुए पात्र में भोजन न करे, पात्र के बिना (हाथ में लेकर) भोजन न करे। चूल्हू में लेकर पानी न पीये। समय पर हितकारी, थोड़ा, स्निग्ध, मधुरबहुल, वैद्य से देखे हुए आहार को खाये। ग्राम-गण (गाँव मिलकर जो अन्न पकाते हैं), वैश्या, पणिक (वैश्यों से दूसरे जो सूद कार्य करते) हैं, शत्रु, सत्र (यज्ञ), शठ, पतित (नीच) के भोजन का न खाये। शेष मनुष्यों का भी रूप-रस गन्ध-स्पर्श-शब्द-मन से अनिच्छित भोजन को न खाये। दूसरे भी इच्छित रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, शब्द, मनवाले, भोजन जो मिलाकर बनाये गये हों, उनको भी न खाये। इन्हीं गुणों का भोजन मक्खी, बाल से युक्त होने पर न खाये। हाथ पैर बिना धोये भोजन न करे। मूत्र और मल के वेग से पीड़ित होने पर भोजन न करे। सन्ध्या- काल में भोजन न करे। किसीकी दया से मिला (आश्रित बनकर) भोजन न करे। समय बीतने पर भोजन न करे, मात्रा से कम या मात्रा में अधिक भोजन न करे। (स्नेहवाली जिस वस्तु से स्नेह निकाल लिया गया हो उसको न खाये)।
वि० मन्तव्य—ग्रामभोजन-जिसमें गाँव भर का साक्षा हो, गण भोजन-समुदाय-बहुतों का साक्षा भोजन, डल्लन के कथनानुसार रथकार एवं चारण जातिवालों का भोजन। पणिक भोजन-होटल बासा, तन्दूर आदि से खरीदा गया। न अनुपा- श्रितः—आसनरहितः न भुञ्जीत-अर्थात् आसन पर बैठकर खाना चाहिये। सम्भूय दत्तानि-मिलित्वा यावत् दत्तानि भोज- नानि परिहरेत, सम्भ्रमदत्तानि-(पाठान्तर है)—सर्वाणि च स्वरया दत्तानि परिहरेत-(डल्लन) अर्थात्-अनेकों जनों द्वारा मिलकर दिये गये अथवा धबराहट—उद्देश के साथ दिये गये, भोजनों का परिस्थान करे। ऐसे भोजन सन्दिग्ध होते हैं, अनिष्ट के लिये या उपहास के लिये हो सकते हैं ॥६८॥
न भुञ्जीतोद्धृतस्नेहं तदं पृथुपितं पयः। न नक्तं दधिं भुञ्जीत न चाण्यघृतशर्करम् ॥६९॥ नामुद्गगृष्णं नाक्षौद्रं नोष्णं नामलकैर्विना। अन्यथा जनयेत् कुष्ठविसर्पादीन् गदान् बहुम् ॥ नास्मानमुदके पश्येन्न नग्नः प्रविशेञ्जलम् ॥१००॥
जिस दूध में से स्नेह (चिकनाई) निकाल लिया हो, जो दूध फट गया हो, या जो बासी हो, उस दूध को न पीये। रात्रि में दही न खाये। घी और शर्करा के बिना, मूँग के यूप के बिना, मधु के बिना, उष्णवस्तु (सोठ आदि) के बिना, आँवलों के बिना रात्रि में दही न खाये। अन्यथा दही कुष्ठ, वीसर्प आदि बहुत से रोगों को उत्पन्न करता है। अपनी परछाई जल में न देखे, और नंगा होकर जल में न घुसे ॥१००॥
द्युतमद्यातिसेवाप्रतिभूत्वसाक्षिवसमाह्वानगोष्ठीवादि- त्राणि न सेवेत, स्रजं छत्रोपानहौ कनकमतीतवाससि न चान्यैर्धृतानि धारयेत्, ब्राह्मणमर्गिन गां च नोच्छिष्टः रघुश्रेते ॥१०१॥
जुआ, मद्य का अतिसेवन, प्रतिभू (जमानती), साक्षी होना, समाह्वान (अप्रासंगिक बोलना), गपशप करना, गाना-बजाना न करे। माला, छाता, जूता, स्वर्ण, पुराने-जीर्ण वस्त्र, या दूसरों से धारण किये-इनको न धारण करे। जूटी अवस्था में ब्राह्मण गाय या अग्नि का स्पर्श न करे।
वि० मन्तव्य—समाह्वान-किसीके बुलाने पर जूआ खेलना, अथवा प्राणियों—गो आदि या पत्नी, भगिनी आदि को दाव पर लगाकर जूआ खेलना। गोष्ठी वादिव्र—सभा में या सभा- सद की भाँति सभा में सम्मिलित होकर मुद्गम आदि बाजे बजाना ॥१०१॥
भवन्ति चात्र—
यस्मिन् यस्मिन्नुतो ये ये दोषाः कृष्यन्ति देहिनाम्।
तेषु तेषु प्रदातव्या रसास्ते ते विज्ञानता ॥१०२॥
वर्षासु न पिबेतोयं पिबेच्छरदि मात्रया।
वर्षासु चतुरो मासान् मात्राबहुदुर्कं पिबेत् ॥१०३॥
उष्ण हेमे वसन्ते च कामं ग्रीष्मे तु शीतलम्।
हेमन्ते च वसन्ते च सोम्वरिष्टो पिबेन्नरः ॥१०४॥
श्रुतशीतं पयो ग्रीष्मे प्रावृट्काले रसं पिबेत्।
यूपं वर्षति, तस्यान्ते प्रपिबेच्छीतलं जलम् ॥१०५॥
स्वस्थ एवमतोऽन्यस्तु दोषाहारगतातुगः।
स्नेहं सैन्धवचूर्णं पिप्पलीभिश्च संयुतम् ॥१०६॥
पिबेदग्निविवृद्धयर्थं न च वेगान् विधारयेत्।
कहा भी है—जिस जिस ऋतु में मनुष्यों के जो-जो दोष कृषित होते हैं, उन-उन ऋतुओं में वे-वे रस जाननेवाला वैद्य देवे। वर्षा ऋतु में पानी न पीये (बहुत थोड़ा पीये)। शरतऋतु में मात्रा से (थोड़े परिमाण में) पीये। वर्षा के चारों मासों (आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन) में मात्रा से पानी पीये। शीत और वसन्त ऋतु में गरम पानी, इच्छानुसार—उष्ण अथवा शीत, ग्रीष्म में शीतल जल पीये। ग्रीष्म ऋतु में गरम करके ठण्डा दूध पीये, प्रावृट्काल में मांस रस पीये। वर्षा में मूँग आदि का यूप पीये। वर्षा के अन्त में शीतल जल पीये, स्वस्थ मनुष्य इस प्रकार करे। रोगी मनुष्य दोष और आहार के अनुसार पीये। अग्नि को बढ़ाने के लिए स्नेह को सैन्धवचूर्ण और पिप्पली के साथ मिलाकर खाये। (इसी से षट्पलघुत हम देते हैं)। उपस्थित वेगों को न रोके ॥१०२-१०६॥
अग्निदीप्तिकरं नृणां रोगाणां शमनं प्रति ॥१०७॥
प्रावृट्शरद्दसन्तेषु सन्ध्यक स्नेहादिमाचरेत्।
कृषे प्रच्छर्वनं पिचं विरेको बस्तिरीणं ॥१०८॥